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‘सारंडा से खदेड़ा, बंगाल में दबोचा’: IG ऑपरेशंस ने बताई 1 करोड़ के इनामी असीम की इनसाइड स्टोरी

रांची से नवीन शर्मा की रिपोर्ट

रांची : 1 करोड़ रुपये के इनामी माओवादी और सेंट्रल कमिटी (CC) सदस्य असीम मंडल उर्फ ‘तिमिर’ की गिरफ्तारी सिर्फ एक दिन के मेहनत का नतीजा नहीं था, बल्कि यह महीनों चले एक हाइ-प्रोफाइल रूट-ट्रैकिंग और घेराबंदी का परिणाम था. झारखंड पुलिस के आईजी (ऑपरेशंस) नरेंद्र कुमार सिंह (Narendra Kumar Singh) ने नया विचार के प्रतिनिधि से खास बातचीत में इस पूरे ऑपरेशन और पुलिस की रणनीतियों का खुलासा किया. आईजी ऑपरेशंस नरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि पुलिस ने असीम मंडल के खिलाफ सबसे बड़ा अभियान सारंडा के घने जंगलों से शुरू किया था. ये इलाका कभी माओवादियों का ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो मुख्यालय का ट्रेनिंग सेंटर और सेंट्रल कमांड हुआ करता था. जब पुलिस ने सारंडा में अपनी पकड़ मजबूत की, तो असीम मंडल वहां से भाग निकला.

पुलिस का दबाव बढ़ा तो असीम ने दलमा के पहाड़ी इलाकों में ली पनाह

आईजी ऑपरेशंस नरेंद्र कुमार सिंह (Narendra Kumar Singh) आगे कहते हैं कि पुलिस की विशेष टीमों ने असीम मंडल का पीछा करते हुए कोल्हान, बोड़ाम और फिर सरायकेला, खूंटी व चाईबासा के कुचाई थाना क्षेत्र तक उसे लगातार खदेड़ा. इसके बाद जब वह दलमा (जमशेदपुर) के पहाड़ी इलाकों में पनाह ली, तो झारखंड जगुआर (JJ) और कोबरा (CoBRA) की टीमों ने निरंतर सर्च ऑपरेशन चलाए. जमशेदपुर पुलिस ने हर गांव-देहात में उसके पोस्टर लगाए, उसके साथियों के परिजनों से संपर्क साधा और फोन सर्विलांस का दायरा बढ़ाया. झारखंड पुलिस के चौतरफा दबाव के कारण वेस्ट मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) का मूल निवासी असीम मंडल अंततः झारखंड छोड़कर बंगाल भागने को मजबूर हुआ, जहां झारखंड और बंगाल पुलिस के संयुक्त ऑपरेशन में उसे दबोच लिया गया.

पुलिस का अगला टारगेट कौन

आईजी ऑपरेशंस ने स्पष्ट किया कि असीम मंडल की गिरफ्तारी के बाद अब राज्य में कोई बड़ा या कुख्यात नक्सली संगठन सक्रिय नहीं है. झारखंड में नक्सलवाद अब आखिरी सांसे गिन रहा है. हालांकि पुलिस का अगला फोकस भगोड़ों की तरह घूम रहे इन 3 नक्सलियों पर है. जिसमें राजू भुइयां जो नेतरहाट-लातेहार क्षेत्र में सक्रिय है. इसके अलावा मनोहर गंझू जो कि चतरा और नीतीश गया-डुमरिया, औरंगाबाद और पलामू के सीमावर्ती क्षेत्र में सक्रिय है. पुलिस की टीम का पूरा ध्यान अब इन्हीं तीन लोगों जल्द से जल्द पकड़ने पर केंद्रित है.

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पुलिस की रणनीति थी बेहद आक्रमक

ऑपरेशन की सफलता के पीछे पुलिस की एक बेहद आक्रामक रणनीति रही. पुलिस ने उन पुरानी एंबुश जगहों पर 2 से 3 दिनों तक खुद कैंप स्थापित कर दिए, जहां कभी नक्सली पुलिस पर घात लगाकर हमला करते थे. इस रणनीति से जंगलों के भीतर नक्सलियों को मिलने वाली राशन की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई और उनके सामने खाने के लाल पड़ गए. साथ ही, नक्सलियों के समर्थकों (sympathizers) को चिह्नित कर जेल भेजा गया.

1 करोड़ का इनामी और ‘थिंक टैंक’ था असीम मंडल

किशन दा के हटने के बाद असीम मंडल माओवादी संगठन में सेकंड-इन-कमांड और नक्सलियों का मुख्य ‘थिंक टैंक’ (रणनीतिकार) बन चुका था. पूर्व सांसद सुनील महतो की सनसनीखेज हत्या और कई पुलिस जवानों की शहादत के मामलों में वह मुख्य आरोपी था. अकेले झारखंड में उसके खिलाफ 55 से अधिक मामले दर्ज थे, जबकि छत्तीसगढ़, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में भी दर्जनों आपराधिक केस दर्ज थे.

687 लूटे गए हथियार बरामद, 381 नक्सलियों का सरेंडर

आईजी नरेंद्र कुमार सिंह ने (Narendra Kumar Singh) बताया कि झारखंड पुलिस अभियानों के दौरान अब तक नक्सलियों द्वारा पुलिस से लूटे गए कुल 687 आधुनिक हथियार बरामद कर चुकी है, जिनमें AK-47, इंसास (INSAS), .303 राइफल और पिस्तौल शामिल हैं. जबकि राज्य गठन से अब तक 381 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. इनमें से 124 नक्सली हजारीबाग स्थित ओपन जेल में रह रहे हैं, जहां उनके पहचान पत्र और बैंक खाते खुलवाए गए हैं. प्रशासन की 14-बिंदु पुनर्वास नीति (Rehabilitation Policy) के तहत सरेंडर करने वालों को एकमुश्त राशि, हथियार जमा करने पर अतिरिक्त प्रोत्साहन, जमीन, बच्चों की शिक्षा, बैंक से ऋण और मुफ्त कानूनी सहायता दी जाती है. इस नीति का लगभग 70% लाभ आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों तक पहुंच चुका है.

असीम मंडल को जल्द रिमांड पर लेगी झारखंड पुलिस

ऑपरेशन आईजी नरेंद्र कुमार सिंह (Narendra Kumar Singh) ने नया विचार से बातचीत में यह भी बताया कि बहुत जल्द झारखंड पुलिस असीम मंडल की रिमांड मांगेगी. फिलहाल वो पश्चिम बंगाल पुलिस की गिरफ्त में है. उसका नाम घाटशिला में 11 जवान शहीद हुए थे उसमें भी था. हालांकि उनकी गिरफ्तारी से पहले ही उसके गिरोह में शामिल रहे सचिन, मीता, बुलू और पुष्पा उर्फ शकुंतला जैसे कई कुख्यात नक्सली पहले ही मुख्यधारा में लौटकर सरेंडर कर चुके हैं. जिन लोगों ने सरेंडर नहीं किया था वह भी पुलिस को हाथों दबोच लिए गए थे. असीम की गिरफ्तारी के बाद उसके ग्रुप में शामिल रहे मंगल महतो और मालती मुर्मू ही बचे थे. उनकी गिरफ्तारी भी कुछ दिन पहले ही हो गई.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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