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सिमडेगा की सातवीं शताब्दी की विरासत को संवारने की कयावद शुरू

सिमडेगा. सिमडेगा जिले के गुप्त कालीन सातवीं शताब्दी से जुड़े प्राचीन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धरोहर स्थलों को उनकी पुरानी विरासत लौटाने की कवायद शुरू कर दी गयी है. जिला प्रशासन की यह नयी पहल है. जिले में कई ऐसे स्थल मौजूद हैं, जहां आज भी सातवीं शताब्दी और उससे भी पुराने कालखंड के ऐतिहासिक चिह्न मिलते हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं. प्रशासन की इस पहल से जिले की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किये जाने की उम्मीद जगी है. इससे आने वाली पीढ़ियां सिमडेगा के गौरवशाली इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान से परिचित हो सकेंगी.

बीरू में मौजूद हैं सातवीं शताब्दी की निशानियां

बीरू क्षेत्र में सातवीं शताब्दी से जुड़े कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष पाये जाते हैं. यहां स्थित सूर्य मंदिर का इतिहास सातवीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है. इसके अलावा बीरू में सतघरवा नामक एक छोटा घरनुमा ढांचा भी आज तक देखा जा सकता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह संरचना भूमिगत रूप से फैली हुई है, जिसमें वर्तमान में केवल ऊपरी सतह का एक तल्ला दिखायी देता है. बताया जाता है कि इसके नीचे छह तल्ले और एक सुरंग भी मौजूद है.

कुड़रूम में सातवीं शताब्दी की दुर्लभ पत्थर प्रतिमाएं सुरक्षित

सिमडेगा प्रखंड के कुड़रूम गांव में प्राचीन धार्मिक व कलात्मक समृद्धि को दर्शाने वाली कई दुर्लभ पत्थर प्रतिमाएं आज भी सुरक्षित अवस्था में मौजूद हैं. ये प्रतिमाएं सातवीं शताब्दी की बतायी जाती हैं, जो उस समय की उन्नत शिल्पकला और उत्कृष्ट कारीगरी का प्रमाण हैं. यहां शिवलिंग, नंदी, मां दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और भगवान विष्णु समेत अन्य देवी-देवताओं की पत्थर से निर्मित मूर्तियां देखी जा सकती हैं. इन प्रतिमाओं पर की गयी सूक्ष्म नक्काशी, भाव-भंगिमाएं और शिल्प सौंदर्य उस काल के कलाकारों की उच्च कला दक्षता को दर्शाती हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि ये प्रतिमाएं कभी यहां स्थापित एक भव्य मंदिर और धार्मिक परिसर का हिस्सा रही होंगी, जो समय के साथ संरक्षण के अभाव में क्षतिग्रस्त हो गयी.

डीसी ने इन स्थलों का किया निरीक्षण

इन ऐतिहासिक व पौराणिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से जिले की उपायुक्त कंचन सिंह ने कुड़रूम और बीरू का भ्रमण कर स्थलों का बारीकी से निरीक्षण किया. उन्होंने संबंधित पदाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हुए पुरातत्व विभाग को इसकी जानकारी देने और संरक्षण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया. साथ ही इन स्थलों पर विकास कार्य कराने और ऐतिहासिक धरोहरों का दस्तावेजीकरण सुनिश्चित करने की बात कही.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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