खास बातें
Inspiring Story: कहते हैं कि दुनिया में सबसे बड़ा दर्द भूख का होता है. जिसने इसे बचपन में झेला हो, वह दूसरों को भूखा नहीं देख सकता. पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्धमान जिले के कटवा (Katwa) स्टेशन पर हर दिन दिखने वाली एक स्त्री की कहानी पूरे देश के लिए मिसाल है. स्त्री का नाम है काजुली विश्वास (Kajuli Biswas). उन्हें स्थानीय लोग सम्मान से बंगाल की ‘अन्नपूर्णा’ (Annapurna) के नाम से बुलाते हैं. स्त्री से मसीहा बनने का काजुली का सफर आसान नहीं था. इसके लिए उन्हें अपने सुहाग और गृहस्थ जीवन का त्याग करना पड़ा.
बेसहारा और गरीब की मदद की मन में थी तड़प
साधारण गृह वधू के रूप में जीवन बिताने वाली काजुली के मन में हमेशा से गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करने की तड़प थी. एक दिन उन्होंने बिना किसी संस्था, बिना किसी फंड या बाहरी मदद के संकल्प लिया कि वह अपने स्तर पर स्टेशन और सड़कों पर रहने वाले भूखे लोगों के लिए भोजन बनायेंगी.
पति ने रख दी शर्त – घर को चुनो या भिखारियों को
उन्होंने अपनी इच्छा के बारे में अपने परिवार और पति को बताया, तो उन्हें सहयोग तो नहीं मिला, एक बेहद कठिन और दर्दनाक विकल्प का सामना करना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट्स और ‘द बेटर इंडिया’ के अनुसार, उनके पति ने उनसे कहा- या तो मेरे साथ रहकर अपनी गृहस्थी संभालो, या फिर सड़क के उन भूखे लोगों को खाना खिलाओ.
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काजुली ने छोड़ दिया घर-परिवार
काजुली के सामने अंधेरा छा गया. एक तरफ उनका बसा-बसाया घर था और दूसरी तरफ तड़पते हुए बेसहारा लोग. काजुली ने रोते हुए भी साहस दिखाया और अपने पति और परिवार की बजाय भूखों को चुना. उन्होंने इंसानियत की खातिर अपना घर छोड़ दिया.
Inspiring Story: सोने की बालियां बेचकर शुरू की ‘रसोई’
घर छोड़ने के बाद काजुली के पास पैसे नहीं थे, लेकिन हौसला था. उन्होंने सबसे पहले अपने कानों की सोने की बालियां (Earrings) बेचीं. उन पैसों से राशन खरीदकर कटवा स्टेशन के पास बेसहारा, बुजुर्गों और अनाथ बच्चों के लिए खाना पकाना शुरू किया. शुरुआत में लोग उन्हें कौतूहल से देखते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी नि:स्वार्थ सेवा ने सबका दिल जीत लिया.
आज काजुली विश्वास हर दिन बिना नागा लगभग 100 से अधिक असहाय लोगों के लिए ताजा, पौष्टिक भोजन पकाती हैं और उन्हें आदरपूर्वक परोसती हैं. उनकी इस रसोई में न केवल भोजन, बल्कि मां की ममता और प्यार भी परोसा जाता है. यही वजह है कि स्टेशन पर भीख मांगने वाले और लावारिस लोग उन्हें ‘मां’ कहकर पुकारते हैं.
समाज से मिल रहा है समर्थन, जगायी मानवता की अलख
काजुली विश्वास की यह नि:स्वार्थ कहानी जैसे-जैसे सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों के जरिये लोगों तक पहुंची, समाज का नजरिया भी बदलने लगा. खुद बेघर होकर दूसरों का सहारा बनने वाली इस स्त्री की मदद के लिए अब कई स्थानीय लोग और राहगीर भी स्वेच्छा से राशन और आर्थिक मदद दे रहे हैं. काजुली की कहानी साबित करती है कि वास्तविक सफलता और जीवन की सार्थकता भौतिक धन-दौलत या आलीशान महलों में नहीं, बल्कि किसी भूखे के चेहरे पर आने वाली तृप्ति की मुस्कान में छिपी है.
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