भितिहरवा गांधी आश्रम: पश्चिम चंपारण के भितिहरवा गांव में खड़ी एक पुरानी कुटिया आज भी उस दौर की कहानी सुनाती है, जब अंग्रेजी हुकूमत के सामने एक ऐसा आंदोलन खड़ा हुआ था, जिसके पास न हथियार थे और न सेना. हथियार था सत्य और रास्ता था अहिंसा. 1917 में महात्मा गांधी के चंपारण आगमन ने नील किसानों की पीड़ा को देश के सामने रखा. लेकिन भितिहरवा में गांधी का मिशन सिर्फ अंग्रेजी सत्ता के विरोध तक सीमित नहीं रहा. यहां शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता की मुहिम भी शुरू हुई.
राजकुमार शुक्ल की जिद से चंपारण पहुंचे गांधी
नील की जबरन खेती से परेशान किसान अपनी आवाज उठाना चाहते थे. चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल लगातार महात्मा गांधी से यहां आने का आग्रह करते रहे. आखिरकार गांधी चंपारण पहुंचे. 27 अप्रैल 1917 को वे नरकटियागंज आए और अमोलवा में रात बितायी.
इसके बाद गांव-गांव जाकर किसानों की शिकायतें सुनने और उनकी स्थिति समझने का सिलसिला शुरू हुआ. गांधी ने महसूस किया कि किसानों की परेशानी केवल नील की खेती तक सीमित नहीं है. अशिक्षा, गंदगी और सामाजिक पिछड़ापन भी ग्रामीणों की मुश्किलों की बड़ी वजह थे.
भितिहरवा में खुली पाठशाला
अंग्रेजी हुकूमत को शायद लगा था कि कुटिया को जला देने से गांधी की गतिविधियों पर असर पड़ेगा. लेकिन ग्रामीण पीछे नहीं हटे. उन्होंने मिलकर कुटिया को फिर खड़ा किया. गांधी ने भी इसके निर्माण में श्रमदान किया. आज यही स्थान भितिहरवा आश्रम के प्रमुख स्मारकों में शामिल है.
जांता, मेज और घंटी में सुरक्षित है इतिहास
चंपारण सत्याग्रह ने गांधी को हिंदुस्तानीय स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में ला दिया. वहीं भितिहरवा ने इस आंदोलन को एक अलग आयाम दिया. यहां संघर्ष केवल अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ नहीं था, बल्कि अशिक्षा, गंदगी और सामाजिक पिछड़ेपन के खिलाफ भी था.
आज भितिहरवा आश्रम गांधी सर्किट का महत्वपूर्ण हिस्सा है. दूर-दूर से लोग उस कुटिया को देखने पहुंचते हैं, जहां कभी गांधी ने चंपारण के किसानों के साथ खड़े होकर बदलाव की नींव रखी थी. 1917 की वह छोटी सी कुटिया आज 109 साल बाद भी सत्य, अहिंसा और सामाजिक परिवर्तन की कहानी कह रही है.
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