सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने विपक्षी नेताओं को मिलने का समय देने से इनकार कर दिया. सीजेआई सूर्यकांत ने 11 अक्टूबर को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि विपक्षी नेताओं की ओर से उठाए गए मुद्दे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हैं. ऐसे मामलों पर प्रशासनिक स्तर पर बैठक करना उचित नहीं होगा. उन्होंने कहा कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता है और लंबित मामलों पर इस तरह की बैठक करना स्थापित न्यायिक मर्यादाओं के अनुकूल नहीं होगा. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या नेतृत्वक दलों के प्रतिनिधियों से CJI की मुलाकात के लिए कोई तय प्रोटोकॉल है? क्या न्यायिक व्यवस्था या चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर नेताओं को मुख्य न्यायाधीश से मिलना चाहिए या इन मामलों को संसद और अदालत के जरिए उठाना उचित होगा? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता ने अपनी राय रखी है. {“type”:”faq”,”question”:”सवाल 1: हिंदुस्तान के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्वक दलों से मिलने का क्या प्रोटोकॉल है?”,”answer”:”जवाब: संविधान के अनुच्छेद 50 में न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग रखने की व्यवस्था की गई है. शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में केशवानंद हिंदुस्तानी मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में भी मान्यता दी थी. तत्कालीन यूपीए प्रशासन में विधि मंत्री रहे वीरप्पा मोइली ने 2010 में न्यायिक मानकों और जवाबदेही से संबंधित विधेयक पेश किया था, लेकिन यह संसद से पारित नहीं हो सका.nnइस विधेयक में सुप्रीम कोर्ट की ओर से 1997 में अपनाए गए फुल कोर्ट के प्रस्ताव का उल्लेख था. इसका उद्देश्य न्यायाधीशों के आचरण और न्यायिक स्वतंत्रता से जुड़े मानकों को स्पष्ट करना था. न्यायपालिका की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए न्यायाधीशों को नेतृत्वक गतिविधियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए. ऐसे में नेतृत्वक दलों के नेताओं से मुलाकात के मामले में भी न्यायिक निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा का ध्यान रखना जरूरी है.”}{“type”:”faq”,”question”:”सवाल 2: विपक्ष के नेता न्यायिक सुनवाई के बजाय प्रशासनिक बैठक पर जोर क्यों दे रहे हैं?”,”answer”:”जवाब: संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्राप्त है. किसी नेतृत्वक नेता को केवल अपने पद के कारण कोई विशेष कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता. यदि किसी नेता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है.nnन्यायपालिका या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए. यदि किसी कानून में बदलाव की जरूरत है, तो विपक्षी दल संसद में बहस के जरिए यह मांग उठा सकते हैं. ऐसे मामलों में मुख्य न्यायाधीश से प्रशासनिक स्तर पर मुलाकात करने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया और विधायी व्यवस्था के माध्यम से समाधान तलाशना अधिक उचित होगा.”}{“type”:”faq”,”question”:”सवाल 3: क्या पहले भी CJI या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नेतृत्वक प्रतिनिधियों से मुलाकात को लेकर विवाद हुआ है?”,”answer”:”जवाब: हाल ही में ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़ी समिति के सदस्यों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच बैठक को लेकर भी विवाद सामने आया था. इस समिति की अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कर रहे हैं.nnइस मुद्दे पर विवाद की आशंका को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के फुल कोर्ट ने समिति के सदस्यों से मुलाकात नहीं करने का फैसला किया था. इसकी एक वजह यह भी बताई गई कि भविष्य में इस विषय से जुड़ा कोई मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने सुनवाई के लिए आ सकता है. ऐसी स्थिति में न्यायाधीशों की निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना महत्वपूर्ण हो जाता है.”}{“type”:”faq”,”question”:”सवाल 4: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इस पर क्या कहना है?”,”answer”:”जवाब: संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया और चयन समिति की संरचना को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है.nnसंसद ने वर्ष 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून पारित किया था. इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं. इस व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को शामिल नहीं किया गया है.nnचयन प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी कानूनी विवाद उठा है. ऐसे संवेदनशील मामलों में न्यायपालिका और नेतृत्वक संस्थाओं के बीच स्पष्ट सीमाएं बनाए रखना जरूरी है. खासकर तब, जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे मुद्दे अदालत के विचाराधीन हों.”}{“type”:”faq”,”question”:”सवाल 5: क्या ऐसी मुलाकातें संविधान के मूलभूत ढांचे पर आघात मानी जा सकती हैं?”,”answer”:”जवाब: न्यायाधीशों के परिजनों को प्रशासनी पैनल में शामिल किए जाने जैसे मुद्दों पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे माहौल में सत्ता पक्ष या विपक्ष के नेताओं की न्यायाधीशों से मुलाकात को लेकर भी निष्पक्षता और न्यायिक स्वतंत्रता से संबंधित चिंताएं पैदा हो सकती हैं.nnकेशवानंद हिंदुस्तानी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के मूलभूत ढांचे के सिद्धांत को स्थापित किया था. न्यायपालिका की स्वतंत्रता इसी संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यदि नेतृत्वक मामलों में न्यायाधीशों पर किसी तरह का अनुचित दबाव बनाने की कोशिश होती है, तो इसे न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत मर्यादा के लिए चिंता का विषय माना जा सकता है.nnविपक्षी दल संविधान और कानून के शासन की बात करते हैं. ऐसे में उन्हें भी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए. नेतृत्वक विवादों के समाधान के लिए मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात पर दबाव बनाने के बजाय संसद, अदालत और अन्य संवैधानिक मंचों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.”} ये भी पढ़ें: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सारी याचिकाएं मंजूर, 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई The post CJI ने राहुल गांधी-खरगे को मिलने का समय क्यों नहीं दिया? जानें क्या है प्रोटोकॉल appeared first on Naya Vichar.