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October 25, 2026

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हूतियों के निशाने पर सऊदी के एयरपोर्ट और तेल ठिकाने, मक्का समेत 4 शहरों में अलर्ट; 2 मिसाइलें मार गिराईं

Saudi Arabia Attack: सऊदी अरब में एक बार फिर हूती विद्रोहियों की धमकियों और हमलों ने तनाव बढ़ा दिया है. राजधानी रियाद के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से लेकर तेल रिफाइनरियों और सैन्य ठिकानों तक को निशाना बनाने का दावा किया गया है. हूतियों ने एयरलाइंस और यात्रियों को रियाद एयरपोर्ट का इस्तेमाल नहीं करने की चेतावनी दी है. इसी बीच मक्का समेत चार इलाकों में संभावित हवाई हमले का अलर्ट जारी करना पड़ा. रियाद एयरपोर्ट को बताया सैन्य निशाना, एयरलाइंस को चेतावनी हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने सऊदी अरब के कई महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले का दावा किया है. उनके मुताबिक, रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट और यानबू में सऊदी अरामको के प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया. सरी ने कहा कि उनके संगठन ने राबिघ तेल रिफाइनरी और ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन पर भी हमला किया. इसके अलावा दम्माम के किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट, नजरान एयरपोर्ट और खामिस मुशैत एयरबेस को निशाना बनाने का दावा किया गया है. हूतियों ने रियाद एयरपोर्ट को सैन्य निशाना बताते हुए एयरलाइंस, कर्मचारियों और यात्रियों को वहां से उड़ानें संचालित नहीं करने की चेतावनी दी है. मक्का, जेद्दा समेत चार इलाकों में अलर्ट से बढ़ी चिंता हूतियों की धमकियों के बीच शनिवार (24 अक्टूबर) को सऊदी अरब के नागरिक सुरक्षा विभाग ने मक्का, जेद्दा, यानबू और ताइफ में संभावित हवाई खतरे का आपात अलर्ट जारी किया. प्रशासन ने लोगों को सुरक्षा निर्देशों का पालन करने और भीड़ जुटाने से बचने की सलाह दी. लोगों से घटनाओं की तस्वीरें और वीडियो नहीं बनाने को भी कहा गया. हालांकि, कुछ समय बाद अधिकारियों ने चारों इलाकों में तत्काल खतरा खत्म होने की जानकारी दी. ताइफ और यानबू की ओर दागीं मिसाइलें, सऊदी ने हवा में किया नष्ट इस बीच सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने दो बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने की जानकारी दी है. गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी के मुताबिक, हूतियों ने ताइफ और यानबू की ओर मिसाइलें दागी थीं. सऊदी वायु रक्षा प्रणाली ने दोनों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही रोककर नष्ट कर दिया. मिसाइलों के मलबे के कुछ टुकड़े मक्का, जेद्दा, ताइफ और राबिघ के क्षेत्रों में गिरने की भी जानकारी सामने आई है. अमेरिका ने भी बढ़ाई सतर्कता, UAE के यात्रियों को चेतावनी सऊदी अरब में बढ़ते तनाव का असर पड़ोसी देशों की सुरक्षा चिंताओं पर भी दिखाई दे रहा है. अमेरिका ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी अपडेट की है. अमेरिका ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से संभावित सशस्त्र हमलों का खतरा बढ़ने की चेतावनी दी है. हालांकि, UAE के लिए यात्रा सलाह का स्तर पहले की तरह लेवल-3 यानी यात्रा पर दोबारा विचार करें पर रखा गया है. Also Read: Explained: फ्रांस में स्कूलों से सड़कों तक क्यों भड़का गुस्सा? महंगाई, बेरोजगारी और येलो वेस्ट आंदोलन से क्या है कनेक्शन The post हूतियों के निशाने पर सऊदी के एयरपोर्ट और तेल ठिकाने, मक्का समेत 4 शहरों में अलर्ट; 2 मिसाइलें मार गिराईं appeared first on Naya Vichar.

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Explained: फ्रांस में स्कूलों से सड़कों तक क्यों भड़का गुस्सा? महंगाई, बेरोजगारी और येलो वेस्ट आंदोलन से क्या है कनेक्शन

France Protests: फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ विरोध अब महंगाई, बढ़ते खर्च और प्रशासन की नीतियों के खिलाफ बड़े आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है. शनिवार, 24 अक्टूबर को राजधानी पेरिस में करीब 1.10 लाख लोग सड़कों पर उतरे. प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछार की. हालात को देखते हुए फ्रांस में करीब 70 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई. प्रदर्शनकारियों की मांगों में स्कूलों के लिए अधिक फंड, शिक्षकों की नियुक्ति, बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं और जीवनयापन की बढ़ती लागत से राहत शामिल हैं. पिछले सप्ताह हुए प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर लूटपाट, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई थीं. इस बार प्रशासन ने प्रदर्शन के मार्ग पर पाबंदियां लगाईं, जबकि कई शहरों में रैलियों पर रोक भी लगाई गई. सवाल है कि आखिर फ्रांस में छात्रों की मांगों से शुरू हुआ विरोध व्यापक जनआंदोलन में कैसे बदलने लगा? महंगाई और ईंधन की कीमतों का इससे क्या संबंध है? क्या मौजूदा प्रदर्शन 2018 के येलो वेस्ट आंदोलन की वापसी का संकेत हैं? और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रशासन के सामने इससे क्या चुनौती खड़ी हो रही है? कैसे शुरू हुआ फ्रांस में छात्रों का आंदोलन? फ्रांस में मौजूदा विरोध की शुरुआत सितंबर 2026 में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को लेकर हुई. पेरिस के दक्षिण-पूर्वी इलाके में स्थित एक हाई स्कूल में शिक्षकों की कमी और पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधनों की समस्या ने छात्रों को विरोध के लिए प्रेरित किया. धीरे-धीरे दूसरे स्कूलों के छात्र भी इससे जुड़ने लगे. छात्रों का कहना है कि कई विषयों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं. कुछ स्कूलों में कक्षाओं में छात्रों की संख्या ज्यादा है, जबकि इमारतों और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी चिंता का विषय है. छात्र बेहतर स्कूल भवन, अधिक शिक्षक और विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं. इस विरोध को शिक्षकों और ट्रेड यूनियनों का भी समर्थन मिलने लगा. यूनियनों ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी मांगों के साथ वेतन और पेंशन में सुधार का मुद्दा भी उठाया. इस तरह आंदोलन का दायरा स्कूलों की समस्याओं से आगे बढ़कर सार्वजनिक सेवाओं और आर्थिक परेशानियों तक पहुंच गया. अब इसमें अलग-अलग वर्गों के लोग अपनी मांगों के साथ शामिल हो रहे हैं. प्रदर्शन के दौरान हिंसा क्यों बनी बड़ी चुनौती? फ्रांस में विरोध के साथ कानून-व्यवस्था का सवाल भी गंभीर हो गया है. पिछले सप्ताह कई शहरों में दुकानों में लूटपाट, गाड़ियों में आगजनी और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों पर हमलों की घटनाएं सामने आई थीं. इन घटनाओं के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी. शनिवार, 24 अक्टूबर को पेरिस में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और पानी की बौछार की. अधिकारियों ने प्रदर्शन के लिए तय मार्ग पर पाबंदियां लगाईं. गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के अनुसार, देशभर में करीब 70 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई. सुरक्षा के लिए हेलीकॉप्टर, बख्तरबंद वाहन और पानी की बौछार करने वाले वाहन भी तैयार रखे गए. पिछले सप्ताह हुई हिंसा के कारण कई दुकानदारों और कारोबारियों में चिंता है. पेरिस के प्रमुख संग्रहालयों में से कुछ बंद रहे, जबकि आर्ट बेसल मेले के आयोजकों ने सप्ताहांत के कार्यक्रम रद्द कर दिए. दूसरी ओर, ट्रेड यूनियनों ने प्रदर्शन पर लगाई गई पाबंदियों की आलोचना की है. उनका कहना है कि इस तरह के प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं. फ्रांस के दूसरे शहरों में भी क्यों बढ़ रही है हलचल? विरोध केवल पेरिस तक सीमित नहीं है. फ्रांस के कई दूसरे शहरों में भी प्रदर्शन और सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है. कुछ जगहों पर स्थानीय प्रशासन ने रैलियों पर रोक लगाई, जबकि कुछ शहरों में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया. फ्रांसीसी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, लिमोज में सिटी हॉल में आगजनी के मामले में दो संदिग्धों के खिलाफ औपचारिक जांच शुरू की गई है. उन्हें मुकदमे तक हिरासत में रखा गया है. जांच में एक प्रशासनी अधिकारी की हत्या के प्रयास का मामला भी शामिल है. इन घटनाओं से पता चलता है कि आंदोलन के साथ सार्वजनिक संपत्ति और सुरक्षा से जुड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं. हालांकि, अलग-अलग शहरों में विरोध की वजहें और उसका स्वरूप एक जैसा नहीं है. यही वजह है कि फ्रांस प्रशासन को केवल राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने से आगे बढ़कर देश के अलग-अलग हिस्सों में उठ रही शिकायतों पर भी ध्यान देना होगा. मैक्रों प्रशासन के सामने कितनी बड़ी चुनौती? फ्रांस में मौजूदा विरोध राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रशासन के लिए नेतृत्वक और प्रशासनिक चुनौती है. शिक्षा व्यवस्था, सार्वजनिक सेवाओं और महंगाई से जुड़े मुद्दे अलग-अलग वर्गों को प्रभावित करते हैं. अगर इन मुद्दों पर नाराजगी बनी रहती है, तो प्रशासन के लिए आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर हल करना मुश्किल होगा. प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह छात्रों और शिक्षकों की मांगों पर ठोस कदम उठाए और आम लोगों को बढ़ते खर्च से राहत देने के उपाय करे. केवल घोषणाओं से स्थिति में सुधार नहीं होगा. लोगों को स्कूलों में बेहतर सुविधाएं, पर्याप्त शिक्षक और आर्थिक समस्याओं के समाधान के रूप में बदलाव दिखाई देना भी जरूरी है. साथ ही, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि विरोध के दौरान हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई हो. लेकिन सुरक्षा के नाम पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार प्रभावित होने से भी नेतृत्वक तनाव बढ़ सकता है. नेतृत्वक दृष्टि से यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि फ्रांस में अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. जनता की नाराजगी, प्रशासन की प्रतिक्रिया और विरोध का आगे का स्वरूप चुनावी बहस को प्रभावित कर सकते हैं. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा आंदोलन का चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ेगा. फिलहाल इतना स्पष्ट है कि शिक्षा व्यवस्था से शुरू हुआ विरोध अब कई आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को अपने साथ जोड़ रहा है. क्या फ्रांस का आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है? मौजूदा घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि फ्रांस में विरोध का दायरा केवल स्कूलों की समस्याओं तक

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DU, JNU में छात्रसंघ चुनाव तो जामिया में क्यों नहीं? जानें क्या है लिंगदोह कमेटी की सिफारिश

Jamia Student Union Election: दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग को लेकर छात्रों का प्रदर्शन जारी है. 12 अक्टूबर 2026 से शुरू हुआ यह आंदोलन अब भूख हड़ताल तक पहुंच गया है. छात्र विश्वविद्यालय में चुनी हुई छात्रसंघ व्यवस्था बहाल करने की मांग कर रहे हैं. कुछ छात्र भूख हड़ताल पर भी बैठे हैं. इस बीच, विश्वविद्यालय प्रशासन ने 21 अक्टूबर को छात्रसंघ का संविधान तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाने का फैसला लिया. कमेटी को जामिया में 2006 में छात्रसंघ भंग होने की परिस्थितियों, अदालत के आदेशों, लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों और विश्वविद्यालय के नियमों की समीक्षा करनी है. छात्रों की मांग है कि चुनाव की तारीख घोषित की जाए. वहीं, विश्वविद्यालय पहले छात्रसंघ के संविधान और इससे जुड़े नियमों पर काम कर रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में छात्रसंघ चुनाव होते हैं, तो जामिया में चुनाव क्यों नहीं हो रहे हैं? इसके साथ ही लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों पर विवाद क्या है और सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा? जामिया में करीब 20 साल से छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं हुए? जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव 2005 में हुए थे. इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ भंग कर दिया. उस समय छात्रसंघ के अध्यक्ष और विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर के बीच हॉस्टल में सीटों के आवंटन को लेकर विवाद हुआ था. इसके अलावा कैंपस में हिंसा और पढ़ाई में बाधा से जुड़ी घटनाओं का भी जिक्र सामने आया. इसके बाद से विश्वविद्यालय में चुना हुआ केंद्रीय छात्रसंघ बहाल नहीं हो सका. बाद के वर्षों में छात्रों ने कई बार चुनाव बहाल करने की मांग की. विश्वविद्यालय में विभागों और विषयों के स्तर पर छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था रही, लेकिन इससे पूरे विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करने वाला चुना हुआ छात्रसंघ नहीं बनता. इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में भी याचिका दाखिल की गई थी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 दिसंबर 2022 को हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया था. विश्वविद्यालय ने अदालत में कहा था कि छात्रसंघ भंग हो चुका है और उस समय चुनाव कराने का सवाल नहीं उठता. हालांकि, अदालत के आदेश का अर्थ यह नहीं था कि विश्वविद्यालय भविष्य में चुनाव करा ही नहीं सकता. अब विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ का संविधान तैयार करने के लिए कमेटी बनाई है. लेकिन छात्र इस प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव का स्पष्ट कार्यक्रम घोषित करने की मांग कर रहे हैं. यही मौजूदा विवाद की बड़ी वजह है. DU और JNU में कैसे होते हैं छात्रसंघ चुनाव? दिल्ली यूनिवर्सिटी और JNU में छात्रसंघ चुनाव होते हैं, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में चुनाव की प्रक्रिया अलग है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) के चुनाव होते हैं. इसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे पदों के लिए मतदान कराया जाता है. DU के अलग-अलग कॉलेजों में भी छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्थाएं होती हैं. वहीं, JNU में छात्रसंघ चुनाव के जरिए विश्वविद्यालय के केंद्रीय छात्रसंघ के पदाधिकारी चुने जाते हैं. यहां भी छात्र अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं और विभिन्न छात्र संगठन चुनाव में हिस्सा लेते हैं. दोनों विश्वविद्यालयों में चुनाव के लिए नियम और प्रक्रिया तय हैं. जामिया में स्थिति अलग है, क्योंकि वहां 2006 में छात्रसंघ भंग होने के बाद से चुनाव बहाल नहीं हुए. अब विश्वविद्यालय को छात्रसंघ का संविधान और चुनाव कराने की व्यवस्था तैयार करनी है. क्या है लिंगदोह कमेटी और इसकी सिफारिशें? लिंगदोह कमेटी का गठन छात्रसंघ चुनावों में पैसे और बाहुबल के इस्तेमाल, हिंसा और नेतृत्वक दखल जैसी समस्याओं को कम करने के लिए किया गया था. इसकी अध्यक्षता पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे. एम. लिंगदोह ने की थी. कमेटी ने 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2006 को इसकी सिफारिशों को स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव कराने के लिए उनका पालन करने का निर्देश दिया था. कमेटी का मकसद छात्रसंघ चुनाव बंद कराना नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित और निष्पक्ष बनाना था. इसकी प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं: उम्र सीमा: स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए चुनाव लड़ने की उम्र सामान्य तौर पर 17 से 22 साल और स्नातकोत्तर स्तर के लिए 24 से 25 साल तय की गई. उपस्थिति: उम्मीदवार के लिए कम से कम 75 प्रतिशत कक्षाओं में उपस्थिति की शर्त रखी गई. चुनाव खर्च: उम्मीदवार के चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा 5,000 रुपये तय की गई. चुनाव लड़ने के अवसर: छात्रसंघ के पदाधिकारी के पद के लिए एक बार और कार्यकारिणी सदस्य के पद के लिए दो बार चुनाव लड़ने का अवसर निर्धारित किया गया. अनुशासन और आपराधिक मामले: उम्मीदवारों को अनुशासन और आपराधिक मामलों से जुड़े नियमों का पालन करना होता है. चुनावी आचार: चुनाव के दौरान धनबल, बाहुबल और अनुचित प्रभाव को रोकने के लिए नियम तय किए गए हैं. इन सिफारिशों का मकसद यह है कि चुनाव में पैसे और ताकत के बजाय विद्यार्थियों के मुद्दों को महत्व मिले. हालांकि, किसी उम्मीदवार की पात्रता तय करते समय संबंधित नियमों और लागू आदेशों को देखना जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को चुनौती क्यों दी गई? लिंगदोह कमेटी की कुछ सिफारिशों पर कानूनी सवाल भी उठाए गए हैं. फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर केंद्र प्रशासन, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था, जिसमें छात्रसंघ चुनाव लड़ने के अवसरों की सीमा तय करने वाली लिंगदोह कमेटी की सिफारिश को चुनौती दी गई थी. यह नियम छात्रसंघ के पदाधिकारी के पद के लिए एक बार और कार्यकारिणी सदस्य के पद के लिए दो बार चुनाव लड़ने के अवसर से संबंधित है. याचिकाकर्ताओं ने इस नियम को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया था. सुप्रीम कोर्ट की ओर से जवाब मांगे जाने का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने इस नियम को रद्द कर दिया है. यह एक खास सिफारिश को चुनौती देने वाला मामला है. जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग याचिका खारिज की थी, जिसमें देशभर के विश्वविद्यालयों में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने की मांग की गई थी. यह मामला 2024 की याचिका से

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खतरे में TV इंडस्ट्री! सास-बहू के घिसे-पिटे ड्रामे छोड़ AI बहुओं पर आया दर्शकों का दिल, एक साल में 6,200 करोड़ घटी कमाई

पटना की रोहिणी को कभी टीवी सीरियल की चलती-फिरती डायरी कहा जा सकता था. कौन-सा शो किस चैनल पर आता है, किस किरदार की शादी हुई, किसकी मौत हुई और कौन-सा कलाकार किस रोल में है, सब उन्हें जुबानी याद रहता था. शाम होते ही टीवी के सामने बैठना उनकी रोज की आदत थी. लेकिन अब कहानी बदल गई है. रोहिणी की नजर टीवी से हटकर फेसबुक पर टिकने लगी है. यहां उन्हें छोटे-छोटे वीडियो सीरियल मिलते हैं. इनमें AI से बने किरदार भी हैं, जो उन्हें असली कलाकारों से ज्यादा दिलचस्प लगते हैं. किसी कहानी का एक हिस्सा खत्म होता है, तो वह अगला देखने लगती हैं. यह सिर्फ मनोरंजन का जरिया बदलने की बात नहीं है. सवाल यह भी है कि क्या टीवी के लंबे और एक जैसी कहानी वाले सीरियल अब दर्शकों को पहले की तरह बांध नहीं पा रहे हैं? इसी बीच FICCI-EY की रिपोर्ट में सामने आया है कि 2025 में हिंदुस्तानीय टीवी इंडस्ट्री की कमाई घटकर 61,700 करोड़ रुपये रह गई. यानी एक साल में 6,200 करोड़ रुपये कम. हालांकि, इस गिरावट को सीधे AI वीडियो से जोड़ने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन दर्शकों के सामने अब मनोरंजन के कई नए विकल्प जरूर हैं. रिमोट के लिए होती थी लड़ाई, अब मोबाइल पर मिल रहा मनोरंजन रांची की 35 साल की पूजा का उदाहरण भी कुछ ऐसा ही है. पहले रात के खाने के बाद उनका पसंदीदा सीरियल देखने का समय तय रहता था. घर में रिमोट को लेकर बहस तक हो जाती थी. लेकिन अब फेसबुक और यूट्यूब पर कुछ मिनट के वीडियो में ही उन्हें पूरी कहानी या उसका दिलचस्प हिस्सा देखने को मिल जाता है. मुजफ्फरपुर की 28 साल की नेहा को सोशल मीडिया पर प्रेम कहानियां और पारिवारिक ड्रामा पसंद हैं. AI से तैयार कुछ किरदार इतने असली दिखाई देते हैं कि पहली नजर में फर्क करना मुश्किल हो सकता है. वहीं, जमशेदपुर की 42 साल की सीमा का उदाहरण थोड़ा अलग है. उनके घर में टीवी अब भी चलता है, लेकिन उनका ध्यान अक्सर मोबाइल पर रहता है. पूजा, नेहा और सीमा के ये उदाहरण फिलहाल काल्पनिक हैं. हालांकि, इनके जरिए दर्शकों की बदलती आदत से जुड़े तीन सवाल सामने आते हैं. क्या लोग अब तय समय पर सीरियल नहीं देखना चाहते? क्या उन्हें छोटे एपिसोड ज्यादा पसंद आने लगे हैं? और क्या टीवी चलते रहने के बावजूद दर्शकों का ध्यान मोबाइल पर बंट रहा है? सोशल मीडिया पर AI किरदार, क्या अब बड़े स्टार्स की जरूरत नहीं? फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर छोटे वीडियो सीरियल और माइक्रो ड्रामा का चलन बढ़ रहा है. इनमें प्यार, धोखा, बदला, सास-बहू की लड़ाई और परिवार की कहानियां दिखाई जाती हैं. कुछ वीडियो AI की मदद से तैयार किए जाते हैं. इनमें किरदार, उनकी आवाज और कई बार पूरा माहौल डिजिटल तरीके से बनाया जा सकता है. हालांकि, हर माइक्रो ड्रामा AI से नहीं बनता. इस नए फॉर्मेट की खास बात है कि दर्शक जब चाहें, जहां चाहें कहानी देख सकते हैं. उन्हें किसी शो के टीवी पर आने का इंतजार नहीं करना पड़ता. छोटे एपिसोड और तेजी से बदलती कहानी दर्शकों को अगला वीडियो देखने के लिए उत्सुक रख सकती है. क्या घिसे-पिटे टीवी सीरियल का फॉर्मूला अब कमजोर पड़ रहा है? सालों से टीवी पर कई सीरियल एक जैसे फॉर्मूले पर चलते रहे हैं. कभी सास-बहू की लड़ाई, कभी घर में साजिश, कभी शादी टूटना और कभी मर चुके किरदार का वापस लौट आना. कई बार एक कहानी महीनों तक खिंचती रहती है. अब दर्शकों के पास विकल्प हैं. अगर कोई कहानी पसंद नहीं आती, तो वे तुरंत दूसरी कहानी देखने लगते हैं. यही बात टीवी चैनलों के लिए चुनौती बन सकती है. हालांकि, टीवी की कमाई घटने का मतलब यह नहीं कि दर्शक सिर्फ घिसी-पिटी कहानियों से ऊबकर जा रहे हैं. विज्ञापन बाजार, सब्सक्रिप्शन की कीमत और डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती पहुंच जैसे कई कारण इस बदलाव के पीछे हैं. क्या AI सीरियल टीवी का भविष्य बदल देंगे? AI की मदद से वीडियो बनाना पहले के मुकाबले आसान हो रहा है. इसके लिए हर बार बड़े सेट, महंगे कैमरे और कलाकारों की लंबी शूटिंग की जरूरत नहीं पड़ती. इससे कम बजट में भी नई कहानियां तैयार करने के रास्ते खुल रहे हैं. लेकिन फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है, जिससे यह साबित हो कि AI सीरियल की वजह से ही टीवी इंडस्ट्री की कमाई में 6,200 करोड़ रुपये की गिरावट आई. फिर भी रोहिणी जैसे दर्शकों की बदलती पसंद एक दिलचस्प सवाल खड़ा करती है. क्या आने वाले समय में दर्शकों को किसी बड़े टीवी स्टार के चेहरे से ज्यादा कहानी और उसे देखने की सुविधा आकर्षित करेगी? टीवी अभी खत्म नहीं हो रहा है. लेकिन अब उसे सिर्फ दूसरे चैनलों से नहीं, बल्कि दर्शकों की जेब में रखे मोबाइल से भी मुकाबला करना पड़ रहा है. ये भी पढ़ें: पहले राम, फिर दशरथ और बीच में बन गए थे भोजपुरी एक्टर, फिल्म थी ‘देवर भाभी’… को-स्टार ने बताया सेट पर कैसे थे अरुण गोविल The post खतरे में TV इंडस्ट्री! सास-बहू के घिसे-पिटे ड्रामे छोड़ AI बहुओं पर आया दर्शकों का दिल, एक साल में 6,200 करोड़ घटी कमाई appeared first on Naya Vichar.

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आलिया भट्ट जैसी सुपरस्टार बेटी, महेश भट्ट जैसा पति, फिर भी सोनी राजदान के हिस्से क्यों आया स्ट्रगल?

बॉलीवुड में जब किसी एक्ट्रेस का नाम आता है, तो अक्सर उसकी फिल्मों, कामयाबी और निजी जिंदगी की चर्चा होती है. लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी हैं, जिनकी अपनी पहचान उनके परिवार के बड़े नामों के पीछे छिप जाती है. सोनी राजदान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वह महेश भट्ट की पत्नी हैं, आलिया भट्ट और शाहीन भट्ट की मां हैं. उनके परिवार में शोहरत की कोई कमी नहीं है. इसके बावजूद सोनी राजदान को अपने करियर में उस तरह की कामयाबी और लगातार काम नहीं मिला, जिसकी उम्मीद एक कलाकार करता है. 25 अक्टूबर को सोनी राजदान अपना जन्मदिन मनाती हैं. इस मौके पर उनकी जिंदगी का एक ऐसा पहलू चर्चा के लायक है, जिसके बारे में उन्होंने खुद खुलकर बात की है. यह कहानी सिर्फ एक मशहूर फिल्मी परिवार की स्त्री की नहीं, बल्कि उस एक्ट्रेस की भी है, जिसने शादी के बाद काम कम होने, अपनी पहचान पीछे छूटने और लंबे समय तक अच्छे किरदारों का इंतजार करने जैसी मुश्किलों का सामना किया. थिएटर से शुरू हुआ सफर, फिल्मों में बनाई अपनी जगह सोनी राजदान का जन्म 25 अक्टूबर 1956 को इंग्लैंड के बर्मिंघम में हुआ था. उनके पिता नरेंद्र नाथ राजदान कश्मीरी पंडित थे, जबकि उनकी मां जर्मन मूल की थीं. हालांकि, सोनी का बचपन और उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा हिंदुस्तान में बीता. महेश भट्ट के साथ सोनी राजदान सोचिए, एक स्त्री जिसने अपनी मेहनत से एक्टिंग की दुनिया में जगह बनाई हो, उसे सिर्फ शादी की वजह से काम की जरूरत से बाहर मान लिया जाए, तो यह कितना निराश करने वाला होगा. सोनी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. यहां दिलचस्प बात यह है कि उनके पति खुद फिल्म इंडस्ट्री का जाना-पहचाना नाम थे. इसके बावजूद शादी के बाद उनकी अपनी पहचान मजबूत होने के बजाय काम के मौके कम होने लगे. सोनी ने इस मुश्किल दौर के बारे में बात करते हुए यह भी बताया कि उस समय फिल्म इंडस्ट्री में शादी और मां बनने के बाद स्त्रीओं को काम देने का नजरिया आज से काफी अलग था. उनके मुताबिक, शादी के बाद उन्हें अपने करियर के लिए एक अलग लड़ाई लड़नी पड़ी. जब पति की फिल्मों में भी मिलने लगे छोटे किरदार महेश भट्ट फिल्म इंडस्ट्री के सफल निर्देशकों में गिने जाते हैं. उन्होंने ‘अर्थ’, ‘सारांश’, ‘डैडी’, ‘आशिकी’ और ‘सड़क’ जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई. लेकिन सोनी राजदान के लिए पति का फिल्ममेकर होना भी लगातार काम मिलने की गारंटी नहीं बन सका. पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सोनी ने बताया था कि शादी के बाद उन्हें फिल्मों में ज्यादा काम नहीं मिल रहा था. इस दौरान वह महेश भट्ट की कुछ फिल्मों में छोटे किरदारों में नजर आईं. इनमें ‘डैडी’, ‘सड़क’, ‘सर’ और ‘गुमराह’ जैसी फिल्में शामिल थीं. महेश भट्ट की फिल्मों में काम मिलने के बावजूद सोनी को उन मौकों का इंतजार था, जिनमें उन्हें अपनी एक्टिंग दिखाने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके. वह सिर्फ किसी बड़े निर्देशक की पत्नी के तौर पर पर्दे पर नजर नहीं आना चाहती थीं. उनकी चाहत थी कि लोग उनके काम को देखें और उन्हें एक एक्टर के रूप में पहचानें. यह उनके करियर का ऐसा दौर था, जब परिवार में फिल्मी दुनिया से जुड़ाव होने के बावजूद उन्हें अपने लिए मौके तलाशने पड़ रहे थे. ‘बुनियाद’ ने बदली किस्मत, टीवी से फिर मिली पहचान जब फिल्मों में काम के मौके कम हुए, तब सोनी राजदान ने टेलीविजन का रुख किया. साल 1986 में वह दूरदर्शन के लोकप्रिय सीरियल ‘बुनियाद’ में नजर आईं. इस सीरियल का निर्देशन रमेश सिप्पी और ज्योति स्वरूप ने किया था. ‘बुनियाद’ ने सोनी को दर्शकों के बीच पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. टेलीविजन पर काम मिलने से उन्हें लगातार एक्टिंग करने का मौका मिला. इसके बाद वह फिल्मों में भी अच्छे किरदारों के साथ नजर आईं. सोनी ने अलग-अलग फिल्मों में काम करते हुए यह दिखाया कि उनकी ताकत सिर्फ किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं है. उन्होंने ‘मॉनसून वेडिंग’, ‘पेज 3’ और बाद में ‘राजी’ जैसी फिल्मों में भी काम किया. साल 2018 में रिलीज हुई ‘राजी’ में सोनी अपनी बेटी आलिया भट्ट के साथ नजर आईं. फिल्म में आलिया ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जबकि सोनी ने उनकी मां का किरदार निभाया. यह फिल्म उनके करियर की उन फिल्मों में शामिल है, जिन्हें दर्शकों ने काफी पसंद किया. सोनी राजदान उन्होंने यह भी माना कि अगर वह आज 25 साल की होतीं, तो शायद यही बात उनके लिए उतनी बड़ी परेशानी नहीं बनती. उनके इस बयान से उस दौर की फिल्म इंडस्ट्री की सोच का एक पहलू सामने आता है, जहां कलाकारों को उनके अभिनय के साथ-साथ उनके चेहरे और दिखने के तरीके के आधार पर भी देखा जाता था. मां बनने के बाद भी आसान नहीं हुआ सफर शादी के बाद सोनी राजदान की जिंदगी में दो बेटियां आईं. शाहीन भट्ट का जन्म 1988 में हुआ, जबकि आलिया भट्ट का जन्म 1993 में हुआ. परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने करियर को आगे बढ़ाना उनके लिए एक और चुनौती थी. सितंबर 2026 में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए इंटरव्यू से जुड़ी रिपोर्ट में सोनी ने बताया कि शादी और मां बनने के बाद काम पाना उनके लिए काफी मुश्किल हो गया था. उस समय स्त्रीओं के करियर को लेकर इंडस्ट्री का नजरिया आज जैसा नहीं था. उन्होंने अपनी बेटी आलिया के करियर को लेकर खुशी भी जाहिर की. उनके मुताबिक, आज की स्त्री कलाकारों के पास अपने काम को लेकर पहले के मुकाबले ज्यादा मौके हैं. सोनी की इस बात में उनके अपने अनुभव की झलक दिखाई देती है. जिस तरह की मुश्किलों से उन्हें गुजरना पड़ा, वह नहीं चाहतीं कि आज की स्त्री कलाकारों को भी उसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़े. आज भी एक्टिंग से प्यार, शोहरत के पीछे भागना नहीं सोनी राजदान के करियर को देखें, तो उन्होंने थिएटर से शुरुआत की, फिल्मों में काम किया, टेलीविजन पर अपनी पहचान बनाई और फिर फिल्मों में कई यादगार किरदार निभाए. उन्होंने हमेशा ऐसे काम की तलाश की, जिसमें उन्हें एक्टिंग करने का मौका मिले. जून 2026 में फिल्मफेयर को दिए

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Explained: अरुणाचल पर भारत-चीन के बीच क्यों नहीं थम रहा सीमा विवाद? समझें पूरा मामला

अरुणाचल प्रदेश को लेकर हिंदुस्तान और चीन के बीच एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है. हिंदुस्तान-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने 22 अक्टूबर को कहा कि अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर कई जगहों पर हिंदुस्तानीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना जारी है. इसके अगले दिन विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीमा पर स्थिति तब बिगड़ती है, जब चीनी सैनिक गश्त के निर्धारित तौर-तरीकों से हटकर गतिविधियां करते हैं. इस बीच ITBP ने चीन से लगी सीमा पर सभी सीमा बटालियनों में ड्रोन प्लाटून बनाई हैं. गलवान जैसी झड़पों से निपटने के लिए ‘स्ट्राइक’ प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया गया है. सीमा पर भूमिगत बंकर बनाए जा रहे हैं और ‘शौर्य कमांडो’ नाम की नई लड़ाकू टीम भी गठित की गई है. लेकिन सवाल यह है कि दशकों की बातचीत और सैन्य समझौतों के बावजूद अरुणाचल प्रदेश पर विवाद क्यों नहीं सुलझा? अरुणाचल प्रदेश को लेकर हिंदुस्तान-चीन के बीच क्यों है तनाव की स्थिति ? अरुणाचल प्रदेश को लेकर फिर से जो विवाद की स्थिति बनी है इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं. पहला, सीमावर्ती इलाकों में हिंदुस्तानीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना. दूसरा, इस क्षेत्र के भूगोल और पहचान को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे. 27 जगहों के नाम तय करने पर चीन ने क्यों जताई आपत्ति? अगस्त 2026 में हिंदुस्तान ने अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों के नाम बदल दिए. इनमें पहाड़ी दर्रे, जमीन के हिस्से, एक झील और एक स्मारक शामिल थे. हिंदुस्तान के इस कदम पर चीन ने आपत्ति जताई. चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता है और इसे ‘दक्षिण तिब्बत’ कहता है. हिंदुस्तान उसके इस दावे को खारिज करता है. यह विवाद केवल नामों का नहीं है. दोनों देश आधिकारिक नक्शों, स्थानों के नाम और प्रशासनी बयानों के जरिये अपनी-अपनी क्षेत्रीय स्थिति स्पष्ट करते हैं. लेकिन किसी स्थान का नाम तय करने से जमीन पर वास्तविक नियंत्रण नहीं बदलता और न ही सीमा विवाद का कानूनी या कूटनीतिक समाधान निकलता है. क्या है मैकमोहन लाइन, जिस पर अटका है विवाद? हिंदुस्तान और चीन के बीच पूर्वी क्षेत्र के सीमा विवाद की जड़ 1914 में हुए शिमला सम्मेलन से जुड़ी है. इस सम्मेलन में ब्रिटिश हिंदुस्तान, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इसी दौरान ब्रिटिश हिंदुस्तान के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन के नाम पर मैकमोहन लाइन निर्धारित की गई. हिंदुस्तान इस रेखा को अरुणाचल प्रदेश से लगी अपनी पूर्वी सीमा का आधार मानता है. चीन इस रेखा को स्वीकार नहीं करता. उसका तर्क है कि उस समय तिब्बत को इस तरह का समझौता करने का स्वतंत्र अधिकार नहीं था. यही दोनों देशों के बीच बुनियादी मतभेद है. हिंदुस्तान का कहना है कि मैकमोहन लाइन उसकी सीमा को निर्धारित करती है, जबकि चीन इसे मान्यता नहीं देता और अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत क्यों कहता है? चीन का दावा तिब्बत के इतिहास और उसके क्षेत्रीय दावों से जुड़ा है. चीन अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से को ‘जांगनान’ यानी दक्षिण तिब्बत कहता है. वह तवांग सहित राज्य के कुछ क्षेत्रों को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर अपने दावे में शामिल करता है. हिंदुस्तान इस दावे को स्वीकार नहीं करता. हिंदुस्तान के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश देश का अभिन्न अंग है और राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था हिंदुस्तानीय संविधान के तहत चलती है. तवांग पर चीन की नजर क्यों है? तवांग अरुणाचल प्रदेश का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसका महत्व केवल भौगोलिक स्थिति के कारण नहीं, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक संबंधों की वजह से भी है. यहां स्थित तवांग मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्रों में से एक है. छठे दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो का जन्म भी तवांग क्षेत्र में हुआ था. इन ऐतिहासिक और धार्मिक संबंधों के कारण तवांग तिब्बती बौद्ध परंपरा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है. चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपने व्यापक दावे के तहत तवांग को भी दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता है. हिंदुस्तान इस दावे को खारिज करता है और तवांग को अपना क्षेत्र मानता है. तवांग की सामरिक स्थिति भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है. यह क्षेत्र हिंदुस्तान-चीन सीमा के नजदीक है और यहां तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों पर निर्भर रहना पड़ता है. इसलिए सड़क, सुरंग और अन्य बुनियादी ढांचे का विकास स्थानीय लोगों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के लिए भी अहम है. गलवान जैसी झड़पों के लिए ‘स्ट्राइक’ प्रशिक्षण ITBP ने गलवान जैसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए ‘स्ट्राइक’ नाम का नया प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया है. कपूर के मुताबिक, वर्ष 2027 के अंत तक पूरे बल को यह प्रशिक्षण देने की योजना है. जून 2020 में गलवान घाटी में हिंदुस्तानीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प में हिंदुस्तान के 20 जवान मारे गए थे. चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत स्वीकार की थी. इस घटना ने दिखाया कि सीमा पर तनाव के दौरान सैनिकों को कठिन और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है. शौर्य कमांडो और भूमिगत बंकर ITBP ने ‘शौर्य कमांडो’ नाम की नई लड़ाकू टीम भी गठित की है. बल प्रमुख ने बताया कि इन कमांडो ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के साथ गतिरोध के दौरान अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया. इन्हें प्रत्येक सीमा बटालियन में तैनात करने की योजना है. इसके साथ ही सीमा पर भूमिगत आश्रय स्थल और बंकर बनाए जा रहे हैं. आधुनिक युद्ध में ड्रोन और दूर से हमला करने वाली प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ऐसे ढांचे सैनिकों को कुछ परिस्थितियों में सुरक्षा दे सकते हैं. ITBP अपने पुराने हथियारों को आधुनिक बनाने, नए वाहनों की खरीद और ऊंचाई वाले इलाकों में जवानों की सुविधाएं बेहतर करने पर भी काम कर रही है. बल के मुताबिक, शून्य से नीचे तापमान वाले क्षेत्रों में स्थित 383 बैरकों में से 342 में ऊष्मारोधी व्यवस्था की गई है. दूरदराज की चौकियों के लिए 141 जनरेटर खरीदे गए हैं और कई स्थानों पर सौर जल हीटर लगाए गए हैं. ये भी पढ़ें: जमीन से अंतरिक्ष तक 6 मोर्चों पर हमला कर सकता है चीन! पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल सोढ़ी ने बताया, थ्री-फ्रंट वॉर के लिए हिंदुस्तान कितना तैयार?

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Gumla : न सड़क, न पुल; पांच गांवों के ग्रामीण पूछ रहे, कब बदलेगी जिंदगी?

जगरनाथ पासवान की रिपोर्ट पालकोट (गुमला). गुमला जिले के पालकोट प्रखंड की बिलिंगबिरा पंचायत के पांच गांव आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में हैं. गोइंधारा, लौखमहन, जमझरिया, चरखागोड़ी और बिलिंगबिरा रायटोली के करीब 150 घरों के ग्रामीणों का कहना है कि प्रखंड मुख्यालय पालकोट तक पहुंचने के लिए उनके पास एक ही रास्ता है, लेकिन रास्ते में चुटिया डूबा नदी पर पुल नहीं होने के कारण बरसात में इन गांवों का संपर्क प्रभावित हो जाता है. ग्रामीणों के अनुसार केरालोटी मुख्य पथ से इन गांवों को जोड़ने वाली करीब चार किलोमीटर सड़क कच्ची है. बारिश के दौरान सड़क की स्थिति खराब होने से दोपहिया वाहनों की आवाजाही भी मुश्किल हो जाती है. ऐसे में बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती स्त्रीओं को खाट के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाने की नौबत आती है. बरसात में नदी बन जाती है सबसे बड़ी बाधा ग्रामीणों का कहना है कि चुटिया डूबा नदी पर अब तक पुल नहीं बन सका है. गर्मी के दिनों में लोग किसी तरह नदी पार कर लेते हैं, लेकिन बरसात में नदी का जलस्तर बढ़ने पर पांचों गांवों का संपर्क प्रभावित हो जाता है. समस्या बताते ग्रामीण | Naya Vichar Network इसका असर बच्चों की पढ़ाई से लेकर किसानों की उपज तक पर पड़ता है. ग्रामीणों के मुताबिक बरसात में शिशु स्कूल नहीं जा पाते, किसान अपनी फसल बाजार तक पहुंचाने में परेशान होते हैं और प्रखंड कार्यालय से जुड़े जरूरी काम भी प्रभावित होते हैं. कई बार ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है. कई बार लगायी गुहार के बाद भी नहीं हुआ समाधान बलदेव सिंह, केशर सिंह, निर्मल सिंह, कुलदीप सिंह, जयपाल सिंह, दीपनारायण सिंह, बालगोविंद सिंह, निरंजन सिंह, जय नारायण सिंह, परमेश्वर सिंह, दिलु खड़िया, श्याम सुंदर सिंह, बुद्धेश्वर सिंह, मोहन नाथ सिंह, प्रद्युम्न सिंह, नरेंद्र कुमार सिंह, रूकमणी देवी, कमला देवी, जानकी देवी, फुलमनी देवी, सरीता देवी और बालेश्वरी देवी समेत अन्य ग्रामीणों ने बताया कि सड़क और पुल की समस्या को लेकर कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगायी गयी है. ग्रामीणों के अनुसार पूर्व उपायुक्त को भी लिखित आवेदन दिया गया था. स्थानीय विधायक भूषण बड़ा के गांव का दौरा करने और सड़क-पुल निर्माण का आश्वासन देने की बात भी ग्रामीणों ने कही. हालांकि, ग्रामीणों का आरोप है कि अब तक धरातल पर काम शुरू नहीं हुआ है. सड़क-पुल नहीं बना तो आंदोलन की चेतावनी लगातार समस्या का समाधान नहीं होने से ग्रामीणों में नाराजगी है. ग्रामीणों ने कहा कि यदि जल्द सड़क और पुल निर्माण की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई तो चरणबद्ध आंदोलन किया जायेगा. ग्रामीणों ने प्रखंड से लेकर जिला मुख्यालय तक सड़क जाम करने और उपायुक्त कार्यालय का घेराव करने की चेतावनी दी है. उनका कहना है कि जब तक सड़क और पुल का निर्माण नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रखा जायेगा. रोड नहीं तो वोट नहीं ग्रामीणों ने कहा कि सड़क और पुल की मांग को लेकर कई बार अधिकारियों, विधायक और मंत्री को आवेदन दिया गया, लेकिन अब उनका धैर्य जवाब दे रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय विकास के आश्वासन मिलते हैं, लेकिन चुनाव के बाद समस्या जस की तस रह जाती है. ग्रामीणों ने दावा किया कि यदि जल्द सड़क और पुल निर्माण शुरू नहीं हुआ तो 2029 के चुनाव में वोट बहिष्कार किया जायेगा. ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “रोड नहीं तो वोट नहीं.” अब देखना होगा कि पांच गांवों की इस समस्या को लेकर प्रशासन और संबंधित विभाग की ओर से कब तक ठोस पहल की जाती है.. The post Gumla : न सड़क, न पुल; पांच गांवों के ग्रामीण पूछ रहे, कब बदलेगी जिंदगी? appeared first on Naya Vichar.

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पिता थे मजदूर, चाहते थे बेटा बने पुलिसकर्मी; मगर उमेश यादव बन गए भारत के स्टार तेज गेंदबाज

Happy 39th Birthday Umesh Yadav: हिंदुस्तानीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज उमेश यादव आज यानी 25 अक्टूबर को अपना 39वां जन्मदिन मना रहे हैं. 25 अक्टूबर 1987 को महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मे उमेश यादव ने अपनी तेज रफ्तार और घातक गेंदबाजी से क्रिकेट की दुनिया में अलग पहचान बनाई. हालांकि, टीम इंडिया तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था. उनके पिता कोयला खदान में मजदूरी करते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी. उमेश के पिता चाहते थे कि उनका बेटा पुलिस या सेना में भर्ती हो, लेकिन उमेश का सपना क्रिकेटर बनने का था. आखिरकार, तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए उन्होंने अपने सपने को सच कर दिखाया और हिंदुस्तानीय टीम के प्रमुख तेज गेंदबाजों में अपनी जगह बनाई. कोयला खदान में काम करते थे पिता, आर्थिक तंगी में बीता बचपन उमेश यादव (X) उमेश यादव का परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का रहने वाला है. उनके पिता तिलक यादव काम की तलाश में महाराष्ट्र के नागपुर आ गए थे. यहां उन्होंने खापरखेड़ा स्थित कोयला खदान में काम किया. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि बच्चों की पढ़ाई और क्रिकेट का खर्च उठाना भी आसान नहीं था. उमेश के पिता चाहते थे कि उनके शिशु पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करें. उमेश की मजबूत कद-काठी को देखते हुए उन्होंने बेटे को पुलिस या सेना में भर्ती कराने का सपना देखा था. दूसरी ओर, उमेश का मन बचपन से ही क्रिकेट में लगता था. वह अपने दोस्तों के साथ नियमित रूप से क्रिकेट स्पोर्ट्सते थे और तेज गेंदबाजी करना पसंद करते थे. ये भी पढ़ें: Lala Amarnath Birthday: स्वतंत्र हिंदुस्तान के पहले टेस्ट कप्तान थे अमरनाथ, पहला शतक जड़ते ही स्त्रीओं ने फेंक दिए थे मंगलसूत्र टेनिस बॉल से शुरू किया सफर शुरुआत में उमेश यादव टेनिस बॉल से क्रिकेट स्पोर्ट्सते थे. बाद में उन्होंने लेदर बॉल से अभ्यास करना शुरू किया. उस समय परिवार के पास क्रिकेट का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे. इसके बावजूद उमेश ने हार नहीं मानी और अपनी गेंदबाजी में लगातार सुधार करते रहे. उमेश ने घरेलू क्रिकेट में विदर्भ की ओर से स्पोर्ट्सते हुए अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. साल 2008-09 में प्रथम श्रेणी क्रिकेट के अपने शुरुआती सीजन में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया. चार मुकाबलों में 14.60 की औसत से 20 विकेट लेकर उन्होंने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा. उनकी तेज गति और उछाल के कारण बल्लेबाजों के लिए उनका सामना करना चुनौतीपूर्ण होने लगा. आईपीएल से मिली पहचान, 2010 में टीम इंडिया में किया डेब्यू घरेलू क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन का फायदा उमेश यादव को मिला और दिल्ली डेयरडेविल्स ने उन्हें आईपीएल में स्पोर्ट्सने का मौका दिया. इसके बाद वह कोलकाता नाइट राइडर्स, रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और गुजरात टाइटंस जैसी टीमों का हिस्सा भी रहे. उमेश ने 28 मई 2010 को जिम्बाब्वे के खिलाफ वनडे क्रिकेट से अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत की. इसके बाद नवंबर 2011 में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू किया, जबकि 2012 में टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहला मुकाबला स्पोर्ट्सा. टेस्ट क्रिकेट में शुरुआती प्रदर्शन ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई. ऑस्ट्रेलिया दौरे पर उन्होंने चार टेस्ट मैचों में 14 विकेट हासिल किए. ये भी पढ़ें: Hardik Pandya Birthday: हार्दिक के 33वें जन्मदिन पर गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा ने लुटाया प्यार, शेयर किया दिल छू लेने वाला नोट 2015 वर्ल्ड कप में भी किया शानदार प्रदर्शन उमेश यादव के करियर का एक यादगार पड़ाव 2015 का वनडे वर्ल्ड कप रहा. इस टूर्नामेंट में उन्होंने 17.83 की औसत से 18 विकेट हासिल किए और सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाजों की सूची में तीसरे स्थान पर रहे. उनकी तेज गेंदबाजी ने हिंदुस्तानीय टीम के अभियान में अहम भूमिका निभाई. उमेश की गेंदबाजी की सबसे बड़ी ताकत उनकी रफ्तार और अतिरिक्त उछाल रही. वह लगातार 140 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से गेंदबाजी करने के लिए जाने जाते रहे. घरेलू परिस्थितियों में भी उन्होंने कई मौकों पर अपनी गेंदबाजी से प्रभावित किया. ऐसा रहा उमेश यादव का अंतरराष्ट्रीय करियर फॉर्मेट मैच विकेट टेस्ट क्रिकेट 57 170 वनडे क्रिकेट 75 106 टी20 इंटरनेशनल 9 12 प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उमेश ने 126 मैचों में 387 विकेट हासिल किए. वहीं, लिस्ट-ए क्रिकेट में उनके नाम 136 मैचों में 194 विकेट दर्ज हैं. आईपीएल में उन्होंने 148 मुकाबले स्पोर्ट्से और 144 विकेट अपने नाम किए. ये भी पढ़ें: 6 मेडन, 5 विकेट… कभी हिंदुस्तान को डराता था यह तेज गेंदबाज, आज टीम इंडिया का बॉलिंग कोच The post पिता थे मजदूर, चाहते थे बेटा बने पुलिसकर्मी; मगर उमेश यादव बन गए हिंदुस्तान के स्टार तेज गेंदबाज appeared first on Naya Vichar.

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घर बनवाने में लाखों खर्च करने से पहले जान लें ईंट, बालू और सीमेंट की क्वालिटी पहचानने का तरीका

Building Material Quality: अपना घर बनवाना हर किसी का सपना होता है. इसके लिए लोग सालों तक पैसे जोड़ते हैं, ताकि अपने परिवार के लिए एक मजबूत और अच्छा घर बना सकें. लेकिन घर बनवाते समय सिर्फ सुंदर डिजाइन और अच्छे नक्शे पर ध्यान देना काफी नहीं है. घर की मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे बनाने में किस तरह की ईंट, बालू और सीमेंट का इस्तेमाल किया जा रहा है. अगर सामान की क्वालिटी अच्छी नहीं हुई, तो आगे चलकर दीवारों में दरार आने या दूसरी परेशानियां होने का खतरा बढ़ सकता है. कई लोग घर बनवाते समय सारा सामान खुद खरीदते हैं, ताकि अच्छी क्वालिटी की चीजें इस्तेमाल हों और पैसे भी सही जगह खर्च हों. लेकिन बाजार में कई तरह के ईंट, बालू और सीमेंट मिलते हैं. ऐसे में बिना सही जानकारी के यह समझना आसान नहीं होता कि कौन-सा सामान अच्छा है और किसकी जांच करवानी चाहिए. कई बार लोग दुकानदार की बातों पर भरोसा करके सामान खरीद लेते हैं और बाद में उन्हें परेशानी होती है. इसलिए घर बनवाने से पहले कुछ जरूरी बातें जान लेना अच्छा रहता है. हिंदुस्तानीय मानक ब्यूरो (BIS) एक प्रशासनी संस्था है, जो सामान की क्वालिटी के लिए नियम बनाती है. घर बनवाते समय ईंट, बालू और सीमेंट खरीदने से पहले उनकी क्वालिटी का ध्यान रखना जरूरी है. आइए जानते हैं कि अच्छा सामान पहचानने के लिए किन बातों पर ध्यान देना चाहिए. अच्छी ईंट खरीदते समय इन बातों को देखें इन्फोग्राफिक, PC -AI घर बनवाने के लिए ईंट खरीद रहे हैं, तो सबसे पहले उसका शेप और बनावट देखें. ईंटें एक जैसी होनी चाहिए. उनके किनारे बहुत ज्यादा टूटे हुए न हों और उनमें बड़ी दरारें भी न दिखें. एक साथ कई ईंटें देखने पर उनके आकार में बहुत ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए. कई लोग दो ईंटों को टकराकर उनकी आवाज सुनते हैं या ईंट को जमीन पर गिराकर देखते हैं कि वह टूटती है या नहीं. लेकिन सिर्फ इन तरीकों से ईंट की मजबूती का सही पता नहीं चलता. हिंदुस्तानीय मानक ब्यूरो (BIS) ने ईंटों की मजबूती और पानी सोखने की क्षमता जांचने के तरीके तय किए हैं. इसलिए बड़ी मात्रा में ईंट खरीदने से पहले किसी जानकार की मदद से उसकी जांच करवाना बेहतर है. सीमेंट खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान सीमेंट खरीदते समय सिर्फ उसकी कीमत देखकर फैसला न करें. पैकेट पर लिखी जानकारी देखें और ध्यान दें कि पैकेट फटा हुआ या गीला तो नहीं है. अगर सीमेंट में सख्त गांठें बनी हुई हैं, तो उसे खरीदने से बचें या पहले उसकी जांच करवाएं. नमी के संपर्क में आने से सीमेंट में गांठें बन सकती हैं. कई लोग सीमेंट को पानी में डालकर उसकी क्वालिटी पहचानने की कोशिश करते हैं. लेकिन पानी में सीमेंट डालने से यह पता नहीं चलता कि वह घर बनाने के लिए कितना मजबूत है. सीमेंट की मजबूती जांचने के लिए खास तरीके अपनाए जाते हैं. इसलिए सीमेंट खरीदते समय पैकेट पर दी गई जानकारी देखें और जरूरत पड़ने पर किसी इंजीनियर से सलाह लें. बालू में मिट्टी मिली है या नहीं, ऐसे लगाएं पता घर बनवाते समय बालू की क्वालिटी पर भी ध्यान देना जरूरी है. बालू में बहुत ज्यादा मिट्टी या दूसरी गंदगी मिली हो, तो इससे घर बनाने के काम पर असर पड़ सकता है. इसलिए बालू खरीदते समय उसे ध्यान से देखें. अगर उसमें मिट्टी के ढेले, कचरा या दूसरी अनचाही चीजें दिखाई दें, तो उसकी जांच करवाएं. बालू में बारीक मिट्टी की मात्रा का शुरुआती अंदाजा लगाने के लिए एक पारदर्शी माप वाले बर्तन में बालू और पानी डालकर कुछ समय के लिए छोड़ सकते हैं. इसके बाद नीचे बालू और ऊपर जमा बारीक मिट्टी की परत को देखा जाता है. केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) की निर्माण संबंधी जानकारी में भी बालू में बारीक मिट्टी की मात्रा जांचने का तरीका बताया गया है. हालांकि, इस तरीके से बालू की पूरी क्वालिटी का पता नहीं चलता. इसलिए घर की नींव और छत जैसे जरूरी हिस्सों में इस्तेमाल करने से पहले किसी इंजीनियर की सलाह लेना बेहतर है. घर बनवाने से पहले इन बातों का भी रखें ध्यान ईंट, बालू और सीमेंट खरीदते समय पक्का बिल जरूर लें. सामान खरीदने से पहले उसकी पैकिंग और उस पर लिखी जानकारी भी देख लें. अगर किसी सामान की क्वालिटी को लेकर शक है, तो सिर्फ देखकर फैसला न करें. जरूरत पड़ने पर इंजीनियर या जांच करने वाली प्रयोगशाला की मदद लें. घर बनवाते समय शुरुआत में थोड़ी सावधानी रखने से आगे होने वाली परेशानियों से बचने में मदद मिल सकती है. इसलिए सामान खरीदने में जल्दबाजी न करें और घर के जरूरी हिस्सों में इस्तेमाल होने वाली चीजों की क्वालिटी पर खास ध्यान दें. यह भी पढ़ें: पैक्ड आटा, बेसन और मसाले खरीदने से पहले लेबल पर चेक कर लें ये 7 चीजें, ज्यादातर लोग कर देते हैं नजरअंदाज The post घर बनवाने में लाखों खर्च करने से पहले जान लें ईंट, बालू और सीमेंट की क्वालिटी पहचानने का तरीका appeared first on Naya Vichar.

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25 अक्टूबर की टॉप 20 खबरें: बाहुबली नेता अनंत सिंह को JDU ने निकाला, अरुणाचल प्रदेश सीमा पर तनाव; शिवा शर्मा मौत मामले में CCTV फुटेज आया सामने

1. जश्न की तैयारी के बीच अनंत सिंह को JDU ने पार्टी से निकाला, आवास पर बन रहे तीन लाख रसगुल्ले, लग रहे टेंट-पंडाल Anant Singh: बिहार की नेतृत्व में अनंत सिंह को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. JDU ने उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है. वहीं, अनंत सिंह के प्रशासनी आवास पर जीत के जश्न की तैयारी चल रही है. यहां तीन लाख रसगुल्ले बनाए जा रहे हैं और टेंट-पंडाल लगाए जा रहे हैं. पूरी समाचार यहां पढ़ें 2. तिब्बत में फिर आया भूकंप, 5.4 रही तीव्रता; गुरुवार को 7.0 के झटके से गई थी 16 लोगों की जान तिब्बत में 5.4 तीव्रता का भूकंप महसूस किया गया. पहले आए 7.0 तीव्रता के झटके से 16 लोगों की मौत और 76 घायल हुए थे. जानें ताजा जानकारी. पूरी समाचार यहां पढ़ें 3. IND vs NZ 2nd T20I: रोमांचक मुकाबले में हिंदुस्तान ने आखिरी ओवर में जीता मैच, तिलक वर्मा बने हीरो हिंदुस्तान और न्यूजीलैंड के बीच दूसरे टी20 मुकाबले में आखिरी ओवर तक रोमांच बना रहा. हिंदुस्तानीय टीम ने मुकाबला जीत लिया और तिलक वर्मा ने जीत में अहम भूमिका निभाई. पूरी समाचार यहां पढ़ें 4. अरुणाचल सीमा पर तनाव: स्वामी बोले- चीन हिंदुस्तानीय क्षेत्र पर कर रहा कब्जा; राउत का केंद्र पर हमला- ‘सेना को कमजोर किया’ अरुणाचल सीमा पर हिंदुस्तान-चीन तनाव पर सुब्रमण्यम स्वामी दिल्ली हाईकोर्ट जाने की बात कह रहे हैं. संजय राउत ने भी केंद्र प्रशासन की नीतियों पर उठाए सवाल, कहा कि प्रशासन ने सेना को कमजोर कर दिया है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 5. Video: फारूक अब्दुल्ला ने कहा- पाकिस्तान कर रहा कश्मीरियों की रक्षा, दिल्ली से उम्मीद भी नहीं; BJP ने किया पलटवार फारूक अब्दुल्ला के बयान के बाद नेतृत्वक विवाद सामने आया है. बीजेपी ने उनके बयान पर पलटवार किया है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 6. Sting Video: सिद्धारमैया ने दर्ज कराई पुलिस शिकायत; बोले- ब्लैकमेल करने की हुई साजिश 23 अक्टूबर को मैसूरु में पत्रकारों से बात करते हुए सिद्धारमैया ने कहा कि उन्होंने खुद पुलिस में शिकायत की है, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके. उन्होंने कहा, “यह झूठा मामला है. मुझे ब्लैकमेल करने के इरादे से यह सब किया गया है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 7. छात्र संघ चुनाव की मांग पर भड़का आंदोलन: जामिया कैंपस में झड़प के बाद सभी कक्षाएं होंगी ऑनलाइन जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रदर्शनों के बीच यूनिवर्सिटी प्रशासन ने सभी कोर्स की क्लासेस तत्काल ऑनलाइन करने का फैसला किया है. कहा है कि छात्रों की सुरक्षा सबसे पहले, पढ़ाई जारी रहेगी. पूरी समाचार यहां पढ़ें 8. राहुल की रैली पर भड़की बीजेपी, रविशंकर प्रसाद बोले- 1 नवंबर को रैली कर सिख दंगों के पीड़ितों को चिढ़ा रही कांग्रेस बीजेपी ने कांग्रेस की 1 नवंबर की रैली को लेकर बड़ा हमला बोला है. रविशंकर प्रसाद ने कहा कि राहुल गांधी 1984 सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों की भावनाओं को आहत कर रहे हैं. जानें क्या है पूरा विवाद. पूरी समाचार यहां पढ़ें 9. शिवा शर्मा मौत मामला: मॉडल श्रद्धा दुबे का नया CCTV फुटेज आया सामने, सीढ़ियों से उतरते दिखे दोनों; डमी से सीन री-क्रिएट करेगी पुलिस शिवा शर्मा मौत मामले में नया CCTV फुटेज आया है जिसमें मॉडल श्रद्धा दुबे के साथ शिवा शर्मा सीढ़ियों से उतर रहे हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस डमी से सीन री-क्रिएट कर मौत का सच खंगालने की तैयारी कर रही है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 10. पाकिस्तान में 8,000 रुपये पार हुई LPG की कीमत, ईरान ने बंद की सप्लाई तो मचा हाहाकार LPG cylinder price : ईरान के साथ बॉर्डर बंद होने के कारण पाकिस्तान में एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हुई है. देश में 12 किलो के सिलेंडर की कीमत 4,500 से बढ़कर करीब 8,200 रुपये तक पहुंच गई. जानिए बॉर्डर बंद होने की वजह क्या है और इसका असर आम लोगों पर कैसे पड़ रहा है? पूरी समाचार यहां पढ़ें 11. बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमला, बलूच विद्रोहियों ने कहा- हमने किए हमले, पाकिस्तान हार चुका है बलूचिस्तान में बलूच विद्रोहियों ने पाकिस्तानी सेना पर ‘ऑपरेशन अलमास’ के तहत हमले का दावा किया है. इस दौरान पाकिस्तान में सैन्य ठिकानों पर कब्जे और भारी नुकसान पहुंचाने की बात भी कही गई है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 12. कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में जमा हो रहे हैं इंडिया गठबंधन के नेता, मोदी प्रशासन को चुनौती देने की है तैयारी इंडिया गठबंधन के नेता दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में जुट रहे हैं. बैठक में केंद्र प्रशासन को चुनौती देने से जुड़े नेतृत्वक मुद्दों पर चर्चा की तैयारी है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 13. सोनिया गांधी CWC बैठक में दिग्विजय सिंह की किस बात पर भड़कीं? कहा- ‘अच्छा ही हुआ नीतीश चले गए’ कांग्रेस की CWC बैठक से जुड़ा एक घटनाक्रम चर्चा में है. सोनिया गांधी और दिग्विजय सिंह के बीच हुई बातचीत में नीतीश कुमार का जिक्र भी सामने आया है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 14. INDIA ब्लॉक की बैठक से AAP ने बनाई दूरी, संजय सिंह बोले- हम गठबंधन में नहीं इंडिया गठबंधन की बैठक के बीच आम आदमी पार्टी की दूरी और संजय सिंह के बयान ने नेतृत्वक हलचल बढ़ाई है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 15. मिलन प्रधान की जमानत को बंगाल प्रशासन ने दी चुनौती, सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘रद्द कर देंगे’ मिलन प्रधान की जमानत को लेकर पश्चिम बंगाल प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. मामले की सुनवाई से पहले अदालत की टिप्पणी चर्चा में है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 16. पूर्व IAF ऑफिसर ने राहुल गांधी की कसाब से की तुलना, कांग्रेस ने कहा- “नहीं किया जाएगा बर्दाश्त” राहुल गांधी को लेकर पूर्व वायुसेना अधिकारी की टिप्पणी पर नेतृत्वक विवाद सामने आया है. कांग्रेस ने इस टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. पूरी समाचार यहां पढ़ें 17. सऊदी अरब पर हूतियों के हमले का दावा, रियाद एयरपोर्ट समेत 6 से ज्यादा ठिकानों को बनाया निशाना यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के रियाद एयरपोर्ट और अरामको फैसिलिटी समेत 6 से ज़्यादा ठिकानों पर ड्रोन-मिसाइल हमले का दावा किया है. जानिए सऊदी पर हमले से दूसरे देशों पर क्या होगा असर? पूरी समाचार यहां पढ़ें 18. Cyclone Alert: बंगाल

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