Gita Updesh: श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का गहराई से मार्गदर्शन करने वाला अद्भुत स्रोत है. यह हमें सिखाती है कि कठिन समय में भी मन और आत्मा को शांत रखकर, बिना फल की चिंता किए कर्म करना ही सच्चा धर्म है. जब जीवन में भ्रम, दुख और असंतुलन होता है, तब गीता आत्मबल देती है. इसका मूल संदेश निष्काम कर्म, आत्म-ज्ञान और ईश्वर में विश्वास है. आज का मनुष्य बाहरी दुनिया में इतना उलझ गया है कि वह भीतर की शांति से दूर हो गया है. ऐसे में गीता हमें उसी आंतरिक स्थिरता की ओर लौटने की प्रेरणा देती है, जहां से प्रेम, संतुलन और सच्ची खुशी का आरंभ होता है. वर्तमान समय में हर इंसान लोभ-लालच इस तरह फंसता चला जा रहा है कि उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ जा रही है. लालच एक ऐसी स्थिति है, जो कि मनुष्य के मन को कभी संतुष्ट नहीं होने देती है. गीता में श्रीकृष्ण ने लालच को आत्म-विकास और मोक्ष के मार्ग की एक बड़ी बाधा बताया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि लोभ और लालच की मानसिक अवस्था को कैसे त्यागा जा सकता है.
इन्द्रिय तृप्ति से दूरी बनाओ
श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करो और इस लालच रूपी पाप को नष्ट करो क्योंकि यह ज्ञान और विवेक को नष्ट कर देता है. इससे यह सीख मिलती है कि लालच इन्द्रियों की तृप्ति से बढ़ता है और संयम से ही इसे रोका जा सकता है.
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संतोष में ही सुख है
जैसे नदियां समुद्र में समा जाती हैं और समुद्र फिर भी शांत रहता है, वैसे ही जो व्यक्ति इच्छाओं से अडिग रहता है, वही शांति को प्राप्त करता है. गीता का यह उपदेश हमें सिखाता है कि इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि नियंत्रण से सच्ची शांति मिलती है.
इन तीन दोषों का करें त्याग
काम, क्रोध और लोभ ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं. इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए. गीता उपदेश के अनुसार, लोभ यानी लालच एक आत्म-विनाश का कारण है. इसे त्यागना आवश्यक है.
निष्काम कर्म
गीता उपदेश में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं है. अगर हम फल (लाभ, पैसा, पद) की लालसा में कर्म करेंगे तो लालच बढ़ेगा. ऐसे में निष्काम कर्म से लालच कम होता है.
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