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संवदेनशील मुद्दों पर संयम और गंभीरता बरते नेपाल

-डॉ सौरभ-

(एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू)

Nepal : नेपाल ने सौ रुपये के अपने नये नोट पर एक नया राष्ट्रीय नेतृत्वक मानचित्र दिखाया है, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा के हिंदुस्तानीय क्षेत्र शामिल हैं. नेपाल के इस कदम ने पहले से चल रही सीमा समस्या को और जटिल बना दिया है. हमें याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान द्वारा लिपुलेख सड़क खोलने के जवाब में नेपाल की संसद ने लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा क्षेत्रों को अपना क्षेत्र दर्शाते हुए एक नये नेतृत्वक मानचित्र को मंजूरी दे दी थी, जिसे हिंदुस्तान ने नेपाल द्वारा दावों का ‘कृत्रिम विस्तार’ बताया था.

लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा परस्पर जुड़े हुए क्षेत्र हैं, जो वर्षों से हिंदुस्तानीय नियंत्रण में हैं, वहां रहने वाले हिंदुस्तानीय नागरिक हैं, हिंदुस्तान में कर देते हैं और हिंदुस्तानीय चुनावों में मतदान करते हैं. नेपाल प्रशासन ने अपने कथित नये नेतृत्वक मानचित्र के अनुरूप नोटों की छपाई का काम चीनी कंपनी को दिया था. नये मुद्रा नोटों के मुद्रण में चीनी कंपनी की भागीदारी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है.

लिपुलेख दर्रा सदियों से हिंदुस्तान और तिब्बत के पठार के बीच प्राचीन व्यापार और तीर्थयात्रा मार्ग के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. व्यापारी, भिक्षुक और तीर्थयात्री ऊन, नमक, बोरेक्स जैसी वस्तुओं व सांस्कृतिक विचारों के आदान-प्रदान के लिए इस दर्रे से गुजरते थे. हिंदुस्तान-नेपाल सीमा का निर्धारण 1816 की सुगौली संधि द्वारा किया गया था. दोनों देशों के क्षेत्रीय दावे काली नदी के उद्गम स्थल पर केंद्रित हैं. नेपाल का तर्क है कि यह नदी लिपुलेख के उत्तर-पश्चिम में लिंपियाधुरा की एक धारा से निकलती है. कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख नदी के पूर्व में स्थित हैं और नेपाल का हिस्सा हैं.

हिंदुस्तान का जवाब है कि काली नदी दर्रे के काफी नीचे स्थित झरनों से निकलती है, और हालांकि संधि इन झरनों के उत्तर के क्षेत्र का सीमांकन नहीं करती, फिर भी 19वीं सदी के प्रशासनिक और राजस्व रिकॉर्ड बताते हैं कि कालापानी हिंदुस्तान की ओर था. हिंदुस्तान का वर्षों से इस क्षेत्र पर नियंत्रण है और चीन के साथ सीमा दर्रे तक अपना प्रशासन चलाने व सैन्य बल तैनात करने के अलावा हिंदुस्तान ने पहले भी वहां अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है. वर्ष 1954 में तिब्बत के साथ व्यापार और संपर्क पर हिंदुस्तान-चीन समझौते के तहत इस दर्रे को एक व्यापार मार्ग के रूप में औपचारिक रूप दिया गया था.

वर्ष 1992 में एक सहमति पत्र के बाद आधिकारिक तौर पर व्यापार फिर से शुरू हुआ, जिससे यह चीन के साथ व्यापार के लिए खोली गयी हिंदुस्तान की पहली सीमा चौकी बन गयी. उसके बाद 1994 में शिपकी ला और 2006 में नाथू ला को भी व्यापार के लिए खोला गया था. वर्ष 2015 के एक बयान में चीन ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से व्यापार बढ़ाने पर सहमति जताकर हिंदुस्तान की संप्रभुता को मान्यता दी थी.
हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच वार्ता के दौरान शिपकी ला और नाथू ला के साथ लिपुलेख के माध्यम से व्यापार को फिर से खोलने पर सहमति बनी थी.

तब जब नेपाल ने लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपना अभिन्न अंग बताया था, तब भी हिंदुस्तान ने कहा था कि काठमांडू के क्षेत्रीय दावे ‘न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित’. सदियों से कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों द्वारा पवित्र तीर्थयात्रा है. हर साल हजारों हिंदुस्तानीय तीर्थयात्री इस मार्ग का उपयोग करते हैं और हिंदुस्तान प्रशासन ने परमिट और बुनियादी ढांचे के माध्यम से इसे सुगम बनाया है. उत्तराखंड की स्थानीय वित्तीय स्थिति के लिए, यह तीर्थयात्रा व्यापार के मौसम के दौरान पर्यटन, ट्रैकिंग और सहायक गतिविधियों को बढ़ावा देती है. भू-नेतृत्वक दृष्टि से लिपुलेख हिंदुस्तान की सीमा सुरक्षा और चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य रसद आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.

मुद्रा विवाद ने सीमा निर्धारण से जुड़ी कूटनीतिक वार्ताओं को और जटिल बना दिया है, और इससे सीमांत जिलों में रहने वाले निवासियों को लेन-देन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. यदि हिंदुस्तानीय व्यापारी नये नोट लेने से मना कर दें, तो सीमापार व्यापार प्रभावित हो सकता है. हिंदुस्तान-नेपाल सीमा के व्यापारी नेतृत्वक संवेदनशीलताओं का हवाला देते हुए नयी मुद्रा स्वीकारने में हिचकिचाहट जता चुके हैं. इस विवाद ने हिंदुस्तान-नेपाल के बीच पर्यटन के भविष्य पर चिंता बढ़ा दी है. हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया में अराजकतावादी शक्तियां प्रशासनें बदलती रही हैं. नेपाल में, जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था हाल के वर्षों में ही आयी है, हिंदुस्तान विरोधी स्वर को कवच बनाकर अपनी विफलता छिपाने का प्रयास नेतृत्वक दलों द्वारा किया जा रहा है. सीमा निर्धारण का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील है, जिसे सिर्फ बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है, न कि एकतरफा नीति बनाकर. तेजी से बदलती वैश्विक कूटनीतिक बिसात में, जहां राष्ट्रों के बीच कूटनीतिक धुरी कल्पना से भी कहीं ज्यादा तेजी से बदल रही हैं, हिंदुस्तान और नेपाल को द्विपक्षीय संबंधों को बनाये रखते हुए, व्यापार सहयोग को गहरा करते हुए आपसी हितों को आगे बढ़ाना चाहिए. ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर मनचाहा निर्णय लेना उचित नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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