Delimitation In Jharkhand, रांची (अभिषेक आनंद की रिपोर्ट): झारखंड में परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा, इन दिनों चर्चा के केंद्र में बना हुआ है. नेतृत्वक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, सभी इस पर अपनी गंभीर चिंता जाहिर कर रहे हैं. खासतौर पर आदिवासी (ST) आरक्षित सीटों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर माहौल काफी गरम है. पक्ष और विपक्ष के तमाम बड़े नेता, आदिवासी सीटों के संरक्षण की बात कर रहे हैं.
क्या है परिसीमन और क्यों है जरूरी
परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं जनसंख्या के आधार पर तय की जाती हैं. इसका मुख्य मकसद, हर क्षेत्र को उसकी आबादी के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व देना होता है. इसी प्रक्रिया के दौरान यह भी तय होता है कि कौन-सी सीटें सामान्य वर्ग के लिए होंगी और कौन-सी अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित रहेंगी.
आदिवासी सीटों पर असर की आशंका से बढ़ी चिंता
झारखंड में परिसीमन विवाद की सबसे बड़ी वजह, आदिवासी आरक्षित सीटों पर पड़ने वाला संभावित असर है. कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने आशंका जताई है कि, यदि पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ, तो ST सीटों की संख्या कम हो सकती है. वर्तमान में राज्य में लोकसभा की 5 और विधानसभा की 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. ऐसे में किसी भी बदलाव का सीधा असर आदिवासी नेतृत्व पर पड़ सकता है.
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सभी दलों की राय लगभग एक जैसी
इस मुद्दे पर अलग-अलग नेतृत्वक दलों के नेता भी एकमत नजर आ रहे हैं. कांग्रेस के रामेश्वर उरांव का कहना है कि केवल जनसंख्या के आधार पर आदिवासी सीटों को कम करना सही नहीं होगा. वहीं, भाजपा नेता सह नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी आदिवासी सीटों के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया है और इस मुद्दे पर राज्य प्रशासन को समर्थन देने की बात कही है.
अभी कोई अंतिम फैसला नहीं, प्रक्रिया जारी
फिलहाल झारखंड के लिए परिसीमन को लेकर कोई आधिकारिक अंतिम नक्शा जारी नहीं हुआ है. वर्तमान निर्वाचन क्षेत्र 2026 के बाद होने वाली अगली जनगणना तक लागू रहेंगे. इसके बाद ही परिसीमन आयोग के गठन और संसद के नए कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया शुरू होगी. हालांकि, यह विषय सामाजिक और नेतृत्वक रूप से बेहद संवेदनशील बन गया है, जिस पर आने वाले समय में बहस और तेज होने की संभावना है.
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