कई सालों से हम सभी यह साबित करते आ रहे हैं कि हम इंसान हैं, कोई बॉट नहीं. इसके लिए Google ने हमें बार-बार CAPTCHA टेस्ट करवाए हैं. कभी ट्रैफिक लाइट पर क्लिक करो, कभी बस पहचानो, कभी सीढ़ियां चुनो, या फिर उन उलझे हुए अक्षरों और नंबरों को सही-सही टाइप करो जिन्हें पढ़ना ही अपने आप में एक पहेली लगता है. लेकिन अब कहानी बदलने वाली है.
Google धीरे-धीरे इस पुराने तरीके को पीछे छोड़ रहा है और एक नए सिस्टम की तरफ बढ़ रहा है. आने वाले समय में CAPTCHA की जगह QR कोड बेस्ड वेरिफिकेशन देखने को मिलेगा, जिससे पहचान का प्रोसेस और भी आसान और फास्ट हो जाएगा. आइए इसे डिटेल में जानते हैं.
Google क्यों कर रहा ऐसा?
Google ने इस नए सिस्टम को Cloud Fraud Defense नाम दिया है. यह धीरे-धीरे उन वेबसाइट्स पर दिखना शुरू हो रहा है जो इसे सपोर्ट करती हैं.Google का कहना है कि अब पुराने CAPTCHA सिस्टम उतने असरदार नहीं रह गए हैं. वजह ये है कि आजकल AI मॉडल्स और ऑटोमेटेड बॉट्स इतने स्मार्ट हो चुके हैं कि वे इमेज-बेस्ड पजल्स को भी आसानी से हल कर लेते हैं. यूजर्स के लिए भी ये प्रोसेस अक्सर काफी झंझट भरा और थकाऊ भी हो जाता है.
इसी समस्या को देखते हुए Google का नया सिस्टम इस पूरे प्रोसेस को बदल देता है और साथ ही फ्रॉड डिटेक्शन को और बेहतर बनाता है. सिक्योरिटी के नजरिए से देखें तो यह एक समझदारी भरा कदम है. आज के समय में इंटरनेट पर बॉट ट्रैफिक, स्पैम अकाउंट्स, ऑटोमेटेड स्क्रैपिंग और फ्रॉड की कोशिशें लगातार बढ़ रही हैं. ऐसे में इस तरह के नए सिस्टम की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस हो रही है.
Google Cloud Fraud Defense कैसे काम करता है?
Google का नया Cloud Fraud Defense सिस्टम अब पुराने ‘पजल सॉल्व करके साबित करो कि तुम इंसान हो’ वाले तरीके को बदलने जा रहा है. अब जब भी किसी वेबसाइट पर ट्रैफिक थोड़ा डाउटफुल लगेगा, तो आपको इमेज पजल की झंझट नहीं करनी पड़ेगी. उसकी जगह एक QR कोड दिखेगा. बस आपको अपने Android फोन से उस QR कोड को स्कैन करना होगा (और ध्यान रहे, फोन में Google Play Services चालू होना चाहिए). स्कैन करते ही Google जल्दी से चेक करेगा कि आपका डिवाइस भरोसेमंद है या नहीं, और फिर आपको वेबसाइट का एक्सेस मिल जाएगा. सुनने में थोड़ा लंबा प्रोसेस लग सकता है, लेकिन असल में ये काफी फास्ट और स्मूद होगा.
प्राइवेसी से जुड़ी समस्या भी है
यहां एक प्राइवेसी की बड़ी समस्या भी सामने आती है, और मामला थोड़ा जटिल हो जाता है. असल में यह सिस्टम काफी हद तक Google Play Services पर डिपेंड करता है. यही वजह है कि GrapheneOS, CalyxOS और /e/OS जैसे privacy-focused Android यूजर्स के बीच चिंता बढ़ गई है. ये ऑपरेटिंग सिस्टम जानबूझकर Google की सर्विसेज को हटा देते हैं ताकि यूजर की प्राइवेसी बेहतर रहे और ट्रैकिंग कम हो सके.
अब समस्या ये है कि कुछ यूजर्स का कहना है कि नए वेरिफिकेशन सिस्टम की वजह से उन्हें वेबसाइट्स तक पहुंचने में दिक्कत आ रही है. क्योंकि उनके फोन Google के ‘trust checks’ पास नहीं कर पा रहे हैं. यहीं असली चिंता शुरू होती है. प्राइवेसी पर ज्यादा ध्यान देने वाले लोगों के लिए मुद्दा सिर्फ CAPTCHA खत्म होने का नहीं है, बल्कि यह डर भी है कि कहीं आने वाले समय में इंटरनेट तक पहुंच भी धीरे-धीरे Google-controlled verification सिस्टम पर डिपेंड न हो जाए.
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