Allahabad High Court: उत्तर प्रदेश में मकान मालिक और किराएदारों के बीच किराया, बेदखली और विवादों से जुड़े नियमों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 8, 9, 10, 38 और 42 को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है. इन प्रावधानों में किराया संशोधन, विवाद की स्थिति में किराया तय करने और किरायेदारी विवादों के निपटारे की व्यवस्था शामिल थी.
2021 के कानून की पांच धाराएं रद्द
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने इंदर भूषण साहनी और अन्य की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2021 के कानून की धारा 8, 9 और 10 किराए के संशोधन और निर्धारण से संबंधित थीं, जबकि धारा 38 और 42 अन्य लागू कानूनों के तहत निर्धारित प्रक्रिया को प्रभावित करती थीं. कोर्ट ने इन प्रावधानों को संबंधित केंद्रीय कानूनों से असंगत पाया.
राष्ट्रपति की मंजूरी क्यों बनी मुद्दा?
हाईकोर्ट ने कहा कि मकान मालिक और किराएदार के संबंधों से जुड़े कानून संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं. ऐसे मामलों में राज्य कानून यदि पहले से मौजूद केंद्रीय कानून से टकराता है तो संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है. कोर्ट के मुताबिक, 2021 के कानून के संबंधित प्रावधान केंद्रीय कानूनों से टकराते थे और उन्हें राष्ट्रपति की आवश्यक मंजूरी प्राप्त नहीं थी. इसलिए वे प्रभावी नहीं रह सकते.
सालाना 5 और 7 फीसदी किराया बढ़ाने का आधार खत्म
धारा 9 में पुराने किराएदारों के लिए किराया संशोधन की व्यवस्था थी. इसके तहत आवासीय परिसर के किराए में 5 प्रतिशत और गैर-आवासीय परिसर के किराए में 7 प्रतिशत सालाना संशोधन का प्रावधान था. अब धारा 9 के रद्द होने के बाद मकान मालिक केवल 2021 के इस प्रावधान का हवाला देकर हर साल किराया नहीं बढ़ा सकेंगे. किराया बढ़ाने का मामला अब किरायेदारी समझौते और लागू केंद्रीय व राज्य कानूनों के तहत तय होगा.
रेंट अथॉरिटी की भूमिका भी बदली
धारा 10 के तहत विवाद होने पर रेंट अथॉरिटी को किराया निर्धारित करने की शक्ति दी गई थी. हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को भी केंद्रीय कानून से असंगत माना है. वहीं, 2021 के कानून के तहत बनाए गए विशेष विवाद निपटान तंत्र को लेकर भी कोर्ट ने धारा 38 और 42 को उस सीमा तक असंवैधानिक माना, जहां वे प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम और संबंधित सिविल कानूनों की प्रक्रिया को प्रभावित करते थे.
1972 का कानून कितनी सीमा तक लौटेगा?
2021 के कानून की धारा 46 के जरिए निरस्त किया गया उत्तर प्रदेश नगरीय भवन (किराया, किराया निर्धारण और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 अब कानूनी स्थिति में जरूरी सीमा तक फिर प्रभावी होगा. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि 1972 का कानून हर मामले में पूरी तरह स्वतः लागू हो गया है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुराने कानून की व्यवस्था उतनी ही सीमा तक प्रभावी होगी, जितनी 2021 की रद्द की गई धाराओं के बाद कानूनी स्थिति को संभालने के लिए आवश्यक है.
पहले से तय किराया और समझौते रहेंगे सुरक्षित
कोर्ट ने पहले से पूरे हो चुके उन मामलों और किरायेदारी समझौतों को भी सुरक्षित रखा है, जिनमें संबंधित प्रावधानों की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी. यानी 2021 के कानून के तहत पहले से तय या संशोधित किराया और निष्पादित किरायेदारी समझौते केवल इस फैसले के कारण अपने आप खत्म नहीं होंगे.
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