दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंडिया गठबंधन की बैठक शुरू हो गई है. गौर करने वाली बात यह है कि इस बैठक में गठबंधन की सभी प्रमुख पार्टियां शामिल नहीं हो रही हैं. कांग्रेस की कोशिश है कि एसआईआर और ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर विपक्षी दलों की साझा रणनीति तैयार हो और संसद से सड़क तक एक संयुक्त अभियान चलाया जाए. लेकिन बैठक से पहले ही विपक्षी एकता को लेकर सवाल उठने लगे हैं जिसकी वजह से यह आशंका उत्पन्न हो रही है कि क्या विपक्ष एकजुट हो पाएगा? आइए जानते हैं कि बैठक में कौन नहीं पहुंचा और क्यों?
इंडिया गठबंधन की बैठक में कौन नहीं पहुंचा?
इंडिया गठबंधन की बैठक में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव खुद शामिल नहीं हो रहे हैं. हालांकि, पार्टी ने बैठक का बहिष्कार नहीं किया है. पार्टी की ओर से सांसद हरेंद्र मलिक और रामपुर से सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी बैठक में शामिल हो रहे हैं. सपा की ओर से यह जानकारी दी गई है कि अखिलेश यादव पहले से तय कार्यक्रमों में व्यस्त हैं.जिनमें राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम प्रमुख है, साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी चल रही हैं.
शिवसेना (UBT) के नेता भी बैठक में शामिल नहीं हो रहे हैं. हालांकि पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बैठक में शामिल होंगे. इस संबंध में पार्टी के नेता संजय राउत ने बताया है कि मुंबई में आंदोलन की तैयारियों के कारण पार्टी के नेता दिल्ली नहीं जा रहे हैं.
अखिलेश यादव का नहीं आना कोई मुद्दा नहीं
इस संबंध में नेतृत्वक विश्लेषक रशीद किदवई का कहना है कि इंडिया गठबंधन की जो बैठक हो रही है, उसमें इन नेताओं का नहीं पहुंचना कोई मुद्दा नहीं है. इसकी वजह यह है कि इन्होंने पहले से यह सूचित कर रखा है कि उनके कुछ तय कार्यक्रम हैं इसलिए वे नहीं आ रहे हैं. ऐसा नहीं है कि इन नेताओं ने किसी तरह की नाराजगी जताई है और वे नहीं आए हैं.
हिंदुस्तान में गठबंधन चुनाव आधारित होते हैं
रशीद किदवई कहते हैं कि हिंदुस्तान में नेतृत्वक पार्टियों के गठबंधन चुनाव आधारित होते हैं. UPA, NDA जनता पार्टी जैसे गठबंधन इसके उदाहरण हैं. इस लिहाज से हमें यह समझना होगा कि अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं, जहां योगी प्रशासन के खिलाफ सपा और कांग्रेस दोनों को एकजुट होकर लड़ाई लड़नी होगी. अगर वे अलग-अलग रहे तो नुकसान दोनों को होगा और इस बात को दोनों पार्टियां समझती हैं.
जहां तक बात आम आदमी पार्टी की है, तो वे पंजाब में अकेले अपने दम पर प्रशासन में हैं. विधानसभा चुनाव में उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस से है. ऐसे में वे किस तरह इंडिया गठबंधन के साथ आ सकते हैं. हां, जब 2029 में लोकसभा चुनाव होंगे तो वे इंडिया गठबंधन के साथ आ जाएंगे. इसकी वजह यह होगी कि उन्हें भी 10-12 सीटें चाहिए होंगी.
संवेदनशील मुद्दों ने विपक्ष को दिया मौका
इस वक्त देश में एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज का जो तरीका है, उसने विपक्ष को मौका दिया है कि वो अपनी आवाज बुलंद करें. इसी वजह से सभी विपक्षी दल नरेंद्र मोदी प्रशासन को घेरने की तैयारी में हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के मसले पर भी सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट हैं, चाहे वो आम आदमी पार्टी को हो या कांग्रेस. इसी वजह से विपक्ष अभी पूरी ऊर्जा के साथ नरेंद्र मोदी प्रशासन को चुनौती देने की तैयारी में है.
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