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पिता बेचते थे चाय, एक कमरे में बचपन गुजारने वाली लवलीना ने जीता गोल्ड; जानें मैरी कॉम की बराबरी करने वाली इस बेटी की कहानी

Lovlina Borgohain Wins Gold: असम के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ी लवलीना बोरगोहेन के लिए बड़े सपने देखना कभी आसान नहीं था. घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी, गांव में स्पोर्ट्सों की सुविधाएं नहीं थीं और जिंदगी की जरूरतें ही इतनी थीं कि उससे आगे के बारे में सोचना भी मुश्किल लगता था. लेकिन लवलीना ने परिस्थितियों को अपने सपनों के रास्ते में नहीं आने दिया. उन्होंने सपना देखा कि एक दिन वह ओलंपिक में हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व करेंगी और दुनिया के बड़े मंच पर देश का नाम रोशन करेंगी.

आज अपने 29वें जन्मदिन के दिन उन्होंने एशियन गेम्स 2026 में गोल्ड मेडल जीतकर अपने सफर को एक और यादगार मुकाम दिया. 75 किग्रा वर्ग के फाइनल में लवलीना ने चीन की बाओ जियी को 5-0 से हराया. इस जीत के साथ वह एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली हिंदुस्तान की दूसरी स्त्री बॉक्सर बन गईं. उनसे पहले यह उपलब्धि दिग्गज मुक्केबाज मैरी कॉम ने 2014 के इंचियोन एशियन गेम्स में हासिल की थी.

छोटे से घर में पलीं, लेकिन सपने छोटे नहीं रखे

लवलीना का जन्म 2 अक्टूबर 1997 को असम के गोलाघाट जिले के बारोमुखिया गांव में हुआ. उनका परिवार साधारण पृष्ठभूमि से आता था. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि स्पोर्ट्सों के लिए महंगे संसाधन आसानी से जुटाए जा सकें. उनके पिता चाय बागान में काम करने के साथ चाय की दुकान भी चलाते थे, जिससे परिवार की जरूरतें पूरी होती थीं.

लवलीना ने खुद बताया है कि गांव में बड़े सपने देखने का माहौल नहीं था. परिवार की जरूरतें पूरी करना, खेती-किसानी और रोजमर्रा की जिंदगी ही प्राथमिकता थी. ऐसे माहौल में किसी शिशु का ओलंपिक जैसे मंच का सपना देखना अपने आप में बड़ी बात थी.

बॉक्सिंग से पहले सीखी मार्शल आर्ट्स

लवलीना की स्पोर्ट्सों से शुरुआत सीधे बॉक्सिंग से नहीं हुई थी. उन्होंने पहले थाई मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग ली. इसी दौरान बॉक्सिंग के प्रति उनका आकर्षण बढ़ा. एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें अपने बड़े भाई के साथ बॉक्सिंग ट्रेनिंग कैंप जाने का मौका मिला. वहां कोच पदुम बोरो ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बॉक्सिंग जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया. गांव में सुविधाओं की कमी के बावजूद उन्होंने ट्रेनिंग जारी रखी और धीरे-धीरे स्थानीय प्रतियोगिताओं से राष्ट्रीय स्तर तक अपनी जगह बनाई.

गांव से बाहर निकलीं तो सामने आईं नई मुश्किलें

जब लवलीना आगे की ट्रेनिंग के लिए गुवाहाटी पहुंचीं और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के हॉस्टल में रहने लगीं, तो उनके सामने एक अलग तरह की चुनौतियां थीं. भाषा की परेशानी, आर्थिक दबाव और नए माहौल में खुद को ढालना आसान नहीं था. गांव में पली-बढ़ी लवलीना के लिए शहर की जिंदगी और प्रतिस्पर्धी स्पोर्ट्स की दुनिया बिल्कुल नई थी. लेकिन उनके दिमाग में एक सपना लगातार बना रहा-ओलंपिक में जाना.

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ओलंपिक मेडल ने बदल दी गांव की तस्वीर

लवलीना की मेहनत का सबसे बड़ा फल टोक्यो ओलंपिक 2021 में मिला. उन्होंने स्त्री बॉक्सिंग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा और असम की पहली स्त्री ओलंपिक पदक विजेता बनीं. लेकिन इस उपलब्धि का असर सिर्फ बॉक्सिंग रिंग तक सीमित नहीं रहा. लवलीना ने बताया कि जब वह ओलंपिक से मेडल लेकर अपने गांव लौटीं, तब उनके घर तक पक्की सड़क बन चुकी थी. गांव में पानी की सुविधा भी पहुंची. जिस गांव में कभी स्पोर्ट्स सुविधाओं का अभाव था, वहां एक बेटी की उपलब्धि ने बदलाव की एक नई तस्वीर खड़ी कर दी.

जन्मदिन पर गोल्ड, फाइनल में बाओ जियी को 5-0 से हराया

अब लवलीना ने अपने जन्मदिन को भी यादगार बना दिया है. एशियन गेम्स 2026 के स्त्री 75 किग्रा वर्ग के फाइनल में उन्होंने चीन की बाओ जियी को 5-0 से हराकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया. फाइनल तक पहुंचने के लिए लवलीना ने सेमीफाइनल में कजाकिस्तान की नतालिया बोगदानोवा को 3-2 से हराया था. इसके साथ ही वह लगातार दो एशियन गेम्स के फाइनल में पहुंचने वाली पहली हिंदुस्तानीय स्त्री मुक्केबाज बनी थीं.

हांगझोऊ एशियन गेम्स में उन्हें सिल्वर मेडल मिला था. इस बार उन्होंने मेडल का रंग बदलते हुए गोल्ड अपने नाम कर लिया.

मैरी कॉम के क्लब में शामिल हुईं लवलीना

लवलीना के गोल्ड मेडल की सबसे खास बात यह है कि इसके साथ उन्होंने हिंदुस्तानीय स्त्री बॉक्सिंग के दिग्गज नाम मैरी कॉम की एक खास उपलब्धि की बराबरी कर ली है. मैरी कॉम ने 2014 के इंचियोन एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था. अब लवलीना भी एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली हिंदुस्तान की दूसरी स्त्री बॉक्सर बन गई हैं.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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