आज जब हिंदुस्तान की बड़ी IT कंपनियों का नाम लिया जाता है, तो HCL का नाम भी सामने आता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि HCL की शुरुआत किसी बड़े ऑफिस, करोड़ों रुपये या किसी बड़े कारोबारी परिवार से नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत दिल्ली की एक छोटे-से कमरे से हुई थी, जहां कुछ दोस्तों के पास बड़ा सपना तो था, लेकिन पैसे बहुत कम थे.
इस कहानी के केंद्र में शिव नादर हैं. एक ऐसे लड़के की कहानी, जिसने गांव और छोटे शहरों में पढ़ाई की, तमिल माध्यम से पढ़े, 22 साल की उम्र में पहली बार शहर देखा और आगे चलकर हिंदुस्तान की कंप्यूटर क्रांति के शुरुआती दौर में बड़ी भूमिका निभाई. दिलचस्प बात यह है कि खुद शिव नादर मानते हैं कि उनकी सफलता की शुरुआत कारोबार से नहीं, बल्कि एक स्कॉलरशिप से हुई थी. ‘टेक टाइकून्स की कहानी’ की इस कड़ी में आइए जानते हैं शिव नादर के बारे में.
आठ भाई-बहनों में सातवें नंबर पर थे शिव नादर
शिव नादर का जन्म 14 जुलाई 1945 को तमिलनाडु के एक गांव में हुआ. उनके पिता जज थे और नौकरी की वजह से उनका परिवार अलग-अलग जगहों पर जाता रहा. इसी कारण नाडर की पढ़ाई भी एक ही जगह नहीं हुई. लेकिन उनकी जिंदगी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि उन्होंने अपनी पढ़ाई तमिल में की थी. अंग्रेजी उनके लिए बचपन से पढ़ाई की भाषा नहीं थी.
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और उन्होंने अंग्रेजी में नहीं, बल्कि तमिल में पढ़ाई की. यहां तक कि उन्होंने कहा कि उन्होंने पहली बार किसी शहर को तब देखा, जब वह 22 साल के थे.
पिता के निधन के बाद परिवार पर आया आर्थिक संकट
शिव नादर की जिंदगी में एक और बड़ा मोड़ तब आया, जब स्कूल के आखिरी वर्षों में उनके पिता का निधन हो गया. परिवार के सामने आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई. इसी दौरान उन्हें पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिली और उन्होंने PSG College of Technology से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. बाद में एक इंटरव्यू में नाडर ने बताया कि स्कॉलरशिप उनके लिए सिर्फ आर्थिक मदद नहीं थी, बल्कि आजादी जैसी थी. इससे वह पैसों की चिंता किए बिना अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सके.
दिल्ली पहुंचे तो जिंदगी बदल गई
1960 के दशक में शिव नादर नौकरी के लिए दिल्ली पहुंचे. उन्होंने DCM में काम शुरू किया. यही वह जगह थी जहां उनकी मुलाकात उन लोगों से हुई, जो आगे चलकर HCL की नींव रखने वाले थे. DCM में नादर ने इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर से जुड़ा काम शुरू किया. उस समय हिंदुस्तान में कंप्यूटर आज की तरह आम चीज नहीं थे. बल्कि कंप्यूटर को देखकर ज्यादातर लोग यही सोचते थे कि इसका इस्तेमाल आखिर करेगा कौन?
लेकिन नादर और उनके साथियों को माइक्रोप्रोसेसर में भविष्य दिखाई दे रहा था. उन्होंने महसूस किया कि आने वाले समय में कंप्यूटर दुनिया बदल सकते हैं. यही सोच उन्हें अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़ने की तरफ ले गई.
HCL के पास पहले ग्राहक नहीं, सिर्फ एक सपना था
जब HCL ने अपना पहला कंप्यूटर बनाने की योजना बनाई, तब मशीन तैयार भी नहीं हुई थी. इसके बावजूद कंपनी की टीम ग्राहकों के पास पहुंचने लगी. उनके पास एक ब्रोशर था, जिसमें उस प्रोडक्ट का मॉडल दिखाया गया था. HCL की इस सोच का फायदा भी मिला. शुरुआती ग्राहकों में IIT Kharagpur और IIT Madras जैसे संस्थान शामिल रहे.
उस समय हिंदुस्तान में कंप्यूटर की पहुंच बेहद सीमित थी. नादर के मुताबिक, लोग कंप्यूटर को जरूरत नहीं बल्कि सुविधा समझते थे. IBM के हिंदुस्तान से बाहर जाने के बाद हिंदुस्तानीय कंपनियों के सामने बाजार बनाने की बड़ी चुनौती भी आ गई थी.
एक गलती जिसे शिव नादर आज भी मानते हैं
शिव नादर की कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है. इसमें एक बड़ी गलती भी शामिल है, जिसे वह खुद स्वीकार करते हैं. जब 1990 के दशक के आखिर और 2000 के आसपास Y2K का दौर आया, तब दुनिया भर में कंप्यूटर सिस्टम को अपडेट करने की जरूरत बढ़ गई थी. हिंदुस्तान की IT कंपनियों के लिए यह बहुत बड़ा मौका था. लेकिन HCL इस मौके को उतना नहीं भुना पाया, जितना उसके प्रतियोगियों ने किया.
एक इंटरव्यू में नाडर ने साफ कहा था कि Y2K का मौका गंवाना “big mistake” था. उनके मुताबिक अगर HCL ने उस मौके को पकड़ लिया होता तो कंपनी नंबर एक तक पहुंच सकती थी.
मां ने सिखाया कि पैसा सिर्फ अपने लिए नहीं होता
शिव नादर की जिंदगी का एक और बेहद व्यक्तिगत हिस्सा उनकी मां से जुड़ा है. एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि बचपन से उन्होंने अपनी मां को मुश्किल समय में भी कुछ न कुछ दूसरों को देने के लिए अलग रखते देखा था. यही आदत आगे चलकर उनकी सोच का हिस्सा बन गई. नादर ने कहा था कि उनकी मां ने उन्हें याद दिलाया कि समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी क्या है और शिक्षा वह क्षेत्र है जिसमें उन्हें वापस देना चाहिए. 1994 में उन्होंने Shiv Nadar Foundation की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने सिर्फ पैसे दान करने के बजाय संस्थान बनाने का रास्ता चुना.
क्यों बनवाए इतने स्कूल और कॉलेज?
नादर के लिए शिक्षा सिर्फ किताब और नौकरी पाने का जरिया नहीं रही. उन्होंने SSN College of Engineering से शुरुआत की. बाद में VidyaGyan, Shiv Nadar University, Shiv Nadar School और दूसरे संस्थानों के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा नेटवर्क खड़ा किया.
Foundation के मुताबिक, इसका मकसद सिर्फ ज्यादा बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे संस्थान बनाना है जो लंबे समय तक काम करते रहें और आने वाली पीढ़ियों को भी फायदा दें. SSN के जरिए हजारों छात्रों को स्कॉलरशिप भी दी गई है. Foundation के अनुसार, SSN के स्कॉलरशिप प्रोग्राम से 5,000 से ज्यादा छात्र लाभान्वित हो चुके हैं, जिनमें 2,000 से ज्यादा फर्स्ट-जनरेशन हैं.
बेटी ने कहा, “मैं आपकी जगह नहीं लेना चाहती”
शिव नादर और उनकी बेटी रोशनी नादर मल्होत्रा की बातचीत भी उनकी कहानी का दिलचस्प हिस्सा है. एक इंटरव्यू में नादर ने बताया कि उन्होंने अपनी बेटी से पूछा था कि वह जिंदगी में क्या करना चाहती हैं. रोशनी ने उनसे पूछा कि अगर वह अपने पिता की जगह कंपनी नहीं संभालेंगी तो क्या उन्हें निराशा होगी.
नाडर का जवाब था, नहीं. उन्होंने कहा कि वह उनकी बेटी हैं और वह चाहते हैं कि वह खुश रहें. इसके बाद रोशनी ने साफ कहा कि वह ऐसा काम करेंगी जो उन्हें खुशी दे. यह छोटी-सी बातचीत बताती है कि नाडर के लिए विरासत का मतलब सिर्फ कंपनी अपने परिवार को सौंपना नहीं था.
आज शिव नादर की सबसे बड़ी विरासत क्या है?
शिव नादर ने एक समय दिल्ली की छोटे-से कमरे से शुरुआत की थी. आज HCLTech दुनिया की बड़ी IT कंपनियों में शामिल है और HCL Group की शुरुआत के 50 साल पूरे हो चुके हैं. HCLTech ने 2026 में अपनी 50वीं वर्षगांठ भी मनाई. लेकिन शायद नादर की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा उनकी दौलत या HCL नहीं है.
उन्होंने एक बार कहा था कि शिक्षा ने उनकी जिंदगी बदली क्योंकि उन्हें खुद स्कॉलरशिप का फायदा मिला था. शायद यही वजह है कि बिजनेस बनाने के बाद उन्होंने सिर्फ पैसा कमाने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि ऐसे संस्थान बनाने पर जोर दिया जो उनके बाद भी काम करते रहें.
एक गांव से निकलकर, तमिल माध्यम में पढ़कर, 22 साल की उम्र में पहली बार शहर देखने वाला एक लड़का आखिरकार हिंदुस्तान की टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के शुरुआती बड़े नामों में शामिल हो गया. और उनकी कहानी शायद यही बताती है कि बड़ा सपना देखने के लिए आपके पास शुरुआत में बड़ा बैंक बैलेंस होना जरूरी नहीं है. कई बार जरूरी सिर्फ इतना होता है कि आपको अपने सपने पर भरोसा हो और मुश्किल आने पर पीछे हटने का मन न करे.
नोट: यह लेख नया विचार की ‘टेक टायकून्स की कहानी’ सीरीज का हिस्सा है. इस सीरीज के जरिए हम टेक जगत की अलग-अलग दिग्गज हस्तियों की कहानी आपके सामने ला रहे हैं. इस सीरीज में हम जानेंगे कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की, किन चुनौतियों का सामना किया और किस तरह अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे. इस सीरीज की अगली कड़ी में हम 14 अक्टूबर को टेक इंडस्ट्री के एक और बड़े नाम की कहानी आपके सामने लेकर आएंगे. तब तक जुड़े रहिए हमारे साथ.
ये भी पढ़ें: 13 साल की उम्र में बेचते थे SIM कार्ड, होटल में की हाउसकीपिंग, फिर रितेश अग्रवाल ने ऐसे खड़ी की OYO की करोड़ों की कंपनी
The post कभी स्कॉलरशिप के सहारे पढ़े, 22 की उम्र तक नहीं देखा शहर, फिर 1.8 लाख रुपये से खड़ी कर दी HCL appeared first on Naya Vichar.

