अरुणाचल प्रदेश को लेकर हिंदुस्तान और चीन के बीच एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है. हिंदुस्तान-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने 22 अक्टूबर को कहा कि अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर कई जगहों पर हिंदुस्तानीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना जारी है. इसके अगले दिन विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीमा पर स्थिति तब बिगड़ती है, जब चीनी सैनिक गश्त के निर्धारित तौर-तरीकों से हटकर गतिविधियां करते हैं.
इस बीच ITBP ने चीन से लगी सीमा पर सभी सीमा बटालियनों में ड्रोन प्लाटून बनाई हैं. गलवान जैसी झड़पों से निपटने के लिए ‘स्ट्राइक’ प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया गया है. सीमा पर भूमिगत बंकर बनाए जा रहे हैं और ‘शौर्य कमांडो’ नाम की नई लड़ाकू टीम भी गठित की गई है. लेकिन सवाल यह है कि दशकों की बातचीत और सैन्य समझौतों के बावजूद अरुणाचल प्रदेश पर विवाद क्यों नहीं सुलझा?
अरुणाचल प्रदेश को लेकर हिंदुस्तान-चीन के बीच क्यों है तनाव की स्थिति ?
अरुणाचल प्रदेश को लेकर फिर से जो विवाद की स्थिति बनी है इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं. पहला, सीमावर्ती इलाकों में हिंदुस्तानीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना. दूसरा, इस क्षेत्र के भूगोल और पहचान को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे.
27 जगहों के नाम तय करने पर चीन ने क्यों जताई आपत्ति?
अगस्त 2026 में हिंदुस्तान ने अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों के नाम बदल दिए. इनमें पहाड़ी दर्रे, जमीन के हिस्से, एक झील और एक स्मारक शामिल थे.
हिंदुस्तान के इस कदम पर चीन ने आपत्ति जताई. चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता है और इसे ‘दक्षिण तिब्बत’ कहता है. हिंदुस्तान उसके इस दावे को खारिज करता है.
यह विवाद केवल नामों का नहीं है. दोनों देश आधिकारिक नक्शों, स्थानों के नाम और प्रशासनी बयानों के जरिये अपनी-अपनी क्षेत्रीय स्थिति स्पष्ट करते हैं. लेकिन किसी स्थान का नाम तय करने से जमीन पर वास्तविक नियंत्रण नहीं बदलता और न ही सीमा विवाद का कानूनी या कूटनीतिक समाधान निकलता है.
क्या है मैकमोहन लाइन, जिस पर अटका है विवाद?
हिंदुस्तान और चीन के बीच पूर्वी क्षेत्र के सीमा विवाद की जड़ 1914 में हुए शिमला सम्मेलन से जुड़ी है. इस सम्मेलन में ब्रिटिश हिंदुस्तान, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इसी दौरान ब्रिटिश हिंदुस्तान के विदेश सचिव हेनरी मैकमोहन के नाम पर मैकमोहन लाइन निर्धारित की गई.
हिंदुस्तान इस रेखा को अरुणाचल प्रदेश से लगी अपनी पूर्वी सीमा का आधार मानता है. चीन इस रेखा को स्वीकार नहीं करता. उसका तर्क है कि उस समय तिब्बत को इस तरह का समझौता करने का स्वतंत्र अधिकार नहीं था.
यही दोनों देशों के बीच बुनियादी मतभेद है. हिंदुस्तान का कहना है कि मैकमोहन लाइन उसकी सीमा को निर्धारित करती है, जबकि चीन इसे मान्यता नहीं देता और अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है.
चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत क्यों कहता है?
चीन का दावा तिब्बत के इतिहास और उसके क्षेत्रीय दावों से जुड़ा है. चीन अरुणाचल प्रदेश के बड़े हिस्से को ‘जांगनान’ यानी दक्षिण तिब्बत कहता है. वह तवांग सहित राज्य के कुछ क्षेत्रों को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर अपने दावे में शामिल करता है.
हिंदुस्तान इस दावे को स्वीकार नहीं करता. हिंदुस्तान के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश देश का अभिन्न अंग है और राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था हिंदुस्तानीय संविधान के तहत चलती है.
तवांग पर चीन की नजर क्यों है?
तवांग अरुणाचल प्रदेश का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसका महत्व केवल भौगोलिक स्थिति के कारण नहीं, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक संबंधों की वजह से भी है.
यहां स्थित तवांग मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्रों में से एक है. छठे दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो का जन्म भी तवांग क्षेत्र में हुआ था. इन ऐतिहासिक और धार्मिक संबंधों के कारण तवांग तिब्बती बौद्ध परंपरा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है.
चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपने व्यापक दावे के तहत तवांग को भी दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता है. हिंदुस्तान इस दावे को खारिज करता है और तवांग को अपना क्षेत्र मानता है.
तवांग की सामरिक स्थिति भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है. यह क्षेत्र हिंदुस्तान-चीन सीमा के नजदीक है और यहां तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों पर निर्भर रहना पड़ता है. इसलिए सड़क, सुरंग और अन्य बुनियादी ढांचे का विकास स्थानीय लोगों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के लिए भी अहम है.
गलवान जैसी झड़पों के लिए ‘स्ट्राइक’ प्रशिक्षण
ITBP ने गलवान जैसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए ‘स्ट्राइक’ नाम का नया प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया है. कपूर के मुताबिक, वर्ष 2027 के अंत तक पूरे बल को यह प्रशिक्षण देने की योजना है.
जून 2020 में गलवान घाटी में हिंदुस्तानीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प में हिंदुस्तान के 20 जवान मारे गए थे. चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत स्वीकार की थी.
इस घटना ने दिखाया कि सीमा पर तनाव के दौरान सैनिकों को कठिन और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है.
शौर्य कमांडो और भूमिगत बंकर
ITBP ने ‘शौर्य कमांडो’ नाम की नई लड़ाकू टीम भी गठित की है. बल प्रमुख ने बताया कि इन कमांडो ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के साथ गतिरोध के दौरान अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया. इन्हें प्रत्येक सीमा बटालियन में तैनात करने की योजना है.
इसके साथ ही सीमा पर भूमिगत आश्रय स्थल और बंकर बनाए जा रहे हैं. आधुनिक युद्ध में ड्रोन और दूर से हमला करने वाली प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ऐसे ढांचे सैनिकों को कुछ परिस्थितियों में सुरक्षा दे सकते हैं.
ITBP अपने पुराने हथियारों को आधुनिक बनाने, नए वाहनों की खरीद और ऊंचाई वाले इलाकों में जवानों की सुविधाएं बेहतर करने पर भी काम कर रही है. बल के मुताबिक, शून्य से नीचे तापमान वाले क्षेत्रों में स्थित 383 बैरकों में से 342 में ऊष्मारोधी व्यवस्था की गई है. दूरदराज की चौकियों के लिए 141 जनरेटर खरीदे गए हैं और कई स्थानों पर सौर जल हीटर लगाए गए हैं.
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