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DU, JNU में छात्रसंघ चुनाव तो जामिया में क्यों नहीं? जानें क्या है लिंगदोह कमेटी की सिफारिश

Jamia Student Union Election: दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग को लेकर छात्रों का प्रदर्शन जारी है. 12 अक्टूबर 2026 से शुरू हुआ यह आंदोलन अब भूख हड़ताल तक पहुंच गया है. छात्र विश्वविद्यालय में चुनी हुई छात्रसंघ व्यवस्था बहाल करने की मांग कर रहे हैं. कुछ छात्र भूख हड़ताल पर भी बैठे हैं.

इस बीच, विश्वविद्यालय प्रशासन ने 21 अक्टूबर को छात्रसंघ का संविधान तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाने का फैसला लिया. कमेटी को जामिया में 2006 में छात्रसंघ भंग होने की परिस्थितियों, अदालत के आदेशों, लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों और विश्वविद्यालय के नियमों की समीक्षा करनी है.

छात्रों की मांग है कि चुनाव की तारीख घोषित की जाए. वहीं, विश्वविद्यालय पहले छात्रसंघ के संविधान और इससे जुड़े नियमों पर काम कर रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में छात्रसंघ चुनाव होते हैं, तो जामिया में चुनाव क्यों नहीं हो रहे हैं? इसके साथ ही लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों पर विवाद क्या है और सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा?

जामिया में करीब 20 साल से छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं हुए?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव 2005 में हुए थे. इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ भंग कर दिया. उस समय छात्रसंघ के अध्यक्ष और विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर के बीच हॉस्टल में सीटों के आवंटन को लेकर विवाद हुआ था. इसके अलावा कैंपस में हिंसा और पढ़ाई में बाधा से जुड़ी घटनाओं का भी जिक्र सामने आया. इसके बाद से विश्वविद्यालय में चुना हुआ केंद्रीय छात्रसंघ बहाल नहीं हो सका.

बाद के वर्षों में छात्रों ने कई बार चुनाव बहाल करने की मांग की. विश्वविद्यालय में विभागों और विषयों के स्तर पर छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था रही, लेकिन इससे पूरे विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करने वाला चुना हुआ छात्रसंघ नहीं बनता.

इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में भी याचिका दाखिल की गई थी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 दिसंबर 2022 को हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया था. विश्वविद्यालय ने अदालत में कहा था कि छात्रसंघ भंग हो चुका है और उस समय चुनाव कराने का सवाल नहीं उठता. हालांकि, अदालत के आदेश का अर्थ यह नहीं था कि विश्वविद्यालय भविष्य में चुनाव करा ही नहीं सकता.

अब विश्वविद्यालय ने छात्रसंघ का संविधान तैयार करने के लिए कमेटी बनाई है. लेकिन छात्र इस प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव का स्पष्ट कार्यक्रम घोषित करने की मांग कर रहे हैं. यही मौजूदा विवाद की बड़ी वजह है.

DU और JNU में कैसे होते हैं छात्रसंघ चुनाव?

दिल्ली यूनिवर्सिटी और JNU में छात्रसंघ चुनाव होते हैं, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में चुनाव की प्रक्रिया अलग है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) के चुनाव होते हैं. इसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे पदों के लिए मतदान कराया जाता है. DU के अलग-अलग कॉलेजों में भी छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्थाएं होती हैं.

वहीं, JNU में छात्रसंघ चुनाव के जरिए विश्वविद्यालय के केंद्रीय छात्रसंघ के पदाधिकारी चुने जाते हैं. यहां भी छात्र अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं और विभिन्न छात्र संगठन चुनाव में हिस्सा लेते हैं. दोनों विश्वविद्यालयों में चुनाव के लिए नियम और प्रक्रिया तय हैं. जामिया में स्थिति अलग है, क्योंकि वहां 2006 में छात्रसंघ भंग होने के बाद से चुनाव बहाल नहीं हुए. अब विश्वविद्यालय को छात्रसंघ का संविधान और चुनाव कराने की व्यवस्था तैयार करनी है.

क्या है लिंगदोह कमेटी और इसकी सिफारिशें?

लिंगदोह कमेटी का गठन छात्रसंघ चुनावों में पैसे और बाहुबल के इस्तेमाल, हिंसा और नेतृत्वक दखल जैसी समस्याओं को कम करने के लिए किया गया था. इसकी अध्यक्षता पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे. एम. लिंगदोह ने की थी. कमेटी ने 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2006 को इसकी सिफारिशों को स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव कराने के लिए उनका पालन करने का निर्देश दिया था.

कमेटी का मकसद छात्रसंघ चुनाव बंद कराना नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित और निष्पक्ष बनाना था. इसकी प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं:

  • उम्र सीमा: स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए चुनाव लड़ने की उम्र सामान्य तौर पर 17 से 22 साल और स्नातकोत्तर स्तर के लिए 24 से 25 साल तय की गई.
  • उपस्थिति: उम्मीदवार के लिए कम से कम 75 प्रतिशत कक्षाओं में उपस्थिति की शर्त रखी गई.
  • चुनाव खर्च: उम्मीदवार के चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा 5,000 रुपये तय की गई.
  • चुनाव लड़ने के अवसर: छात्रसंघ के पदाधिकारी के पद के लिए एक बार और कार्यकारिणी सदस्य के पद के लिए दो बार चुनाव लड़ने का अवसर निर्धारित किया गया.
  • अनुशासन और आपराधिक मामले: उम्मीदवारों को अनुशासन और आपराधिक मामलों से जुड़े नियमों का पालन करना होता है.
  • चुनावी आचार: चुनाव के दौरान धनबल, बाहुबल और अनुचित प्रभाव को रोकने के लिए नियम तय किए गए हैं.

इन सिफारिशों का मकसद यह है कि चुनाव में पैसे और ताकत के बजाय विद्यार्थियों के मुद्दों को महत्व मिले. हालांकि, किसी उम्मीदवार की पात्रता तय करते समय संबंधित नियमों और लागू आदेशों को देखना जरूरी है.

सुप्रीम कोर्ट में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को चुनौती क्यों दी गई?

लिंगदोह कमेटी की कुछ सिफारिशों पर कानूनी सवाल भी उठाए गए हैं. फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर केंद्र प्रशासन, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था, जिसमें छात्रसंघ चुनाव लड़ने के अवसरों की सीमा तय करने वाली लिंगदोह कमेटी की सिफारिश को चुनौती दी गई थी. यह नियम छात्रसंघ के पदाधिकारी के पद के लिए एक बार और कार्यकारिणी सदस्य के पद के लिए दो बार चुनाव लड़ने के अवसर से संबंधित है. याचिकाकर्ताओं ने इस नियम को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया था.

सुप्रीम कोर्ट की ओर से जवाब मांगे जाने का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने इस नियम को रद्द कर दिया है. यह एक खास सिफारिश को चुनौती देने वाला मामला है. जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग याचिका खारिज की थी, जिसमें देशभर के विश्वविद्यालयों में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने की मांग की गई थी. यह मामला 2024 की याचिका से अलग था.

यहां ध्यान देने वाली बात है कि लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं और जामिया में चुनाव नहीं होने का मुद्दा एक ही मामला नहीं हैं. जामिया में छात्रसंघ भंग होने का इतिहास, विश्वविद्यालय के नियम और संविधान तैयार करने की मौजूदा प्रक्रिया भी अहम हैं.

जामिया में अब चुनाव कब होंगे?

फिलहाल जामिया में छात्रसंघ चुनाव की तारीख घोषित नहीं हुई है. विश्वविद्यालय प्रशासन ने संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए कमेटी बनाई है, जिसे 20 दिसंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी है. यह संविधान के मसौदे की समय-सीमा है, चुनाव कराने की घोषित तारीख नहीं.  प्रशासन का कहना है कि संविधान और चुनाव कराने की व्यवस्था तैयार होने के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय की जा सकती है. वहीं, प्रदर्शनकारी छात्र जल्द चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं.

कुल मिलाकर, जामिया में करीब दो दशक से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं. DU और JNU में चुनाव की व्यवस्था चल रही है, जबकि जामिया में अब छात्रसंघ का संविधान तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हुई है. लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें छात्रसंघ चुनाव कराने के नियम तय करती हैं. लेकिन जामिया में चुनाव कब होंगे, यह विश्वविद्यालय की मौजूदा प्रक्रिया, लागू नियमों और कानूनी पहलुओं पर निर्भर करेगा.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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