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राखी के लिए चाहिए परफेक्ट मेहंदी? ये लेटेस्ट डिजाइन जरूर करें ट्राई

Raksha Bandhan Mehndi Designs: रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्यार और रिश्ते का खास पर्व होता है. इस दिन स्त्रीएं और लड़कियां नए कपड़े पहनने के साथ-साथ हाथों में मेहंदी लगाना भी पसंद करती हैं. अगर आप भी रक्षाबंधन पर अपने हाथों को खूबसूरत और ट्रेंडी लुक देना चाहती हैं, तो इन मेहंदी डिजाइनों को जरूर ट्राई कर सकती हैं. ये डिजाइन सिंपल होने के साथ-साथ देखने में बेहद आकर्षक भी लगते हैं. फ्लोरल मेहंदी डिजाइन ब्रेसलेट डिजाइन मेहंदी, फोटो- सोशल मीडिया अगर आप ऑफिस या कॉलेज जाने वाली हैं और ज्यादा भरी हुई मेहंदी पसंद नहीं करतीं, तो ब्रेसलेट डिजाइन आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकता है. इसमें हाथों पर ऐसा पैटर्न बनाया जाता है जो किसी खूबसूरत ब्रेसलेट की तरह नजर आता है. यह डिजाइन रक्षाबंधन के मौके पर आपके हाथों को यूनिक और स्टाइलिश लुक देगा. अरेबिक मेहंदी डिजाइन Minimal Mehndi Design अगर आप रक्षाबंधन पर कुछ सिंपल लेकिन स्टाइलिश मेहंदी लगाना चाहती हैं, तो मिनिमल मेहंदी डिजाइन आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है. इसमें ज्यादा भरी हुई डिजाइन की जगह छोटे-छोटे फूल, बेल, पत्तियां और खूबसूरत पैटर्न बनाए जाते हैं. यह डिजाइन कम समय में तैयार हो जाती है और हाथों को एलिगेंट व मॉडर्न लुक देती है. कॉलेज जाने वाली लड़कियों और सिंपल लुक पसंद करने वाली स्त्रीओं के लिए यह डिजाइन काफी पसंद की जाती है. यह भी पढ़ें: चांदी की बिछिया में चाहिए नया डिजाइन? देखें लेटेस्ट और खूबसूरत कलेक्शन The post राखी के लिए चाहिए परफेक्ट मेहंदी? ये लेटेस्ट डिजाइन जरूर करें ट्राई appeared first on Naya Vichar.

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झारखंड विधानसभा में 8,399.31 करोड़ का पहला अनुपूरक बजट पेश, ग्रामीण विकास को सबसे ज्यादा राशि

रांची: झारखंड विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन राज्य प्रशासन ने वित्तीय वर्ष 2026-27 का पहला अनुपूरक बजट पेश किया. प्रशासन ने कुल 8,399.31 करोड़ रुपये की अनुपूरक अनुदान मांग सदन के पटल पर रखी. इसमें 7,256.25 करोड़ रुपये राजस्व व्यय और 1,143.06 करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए प्रस्तावित किए गए हैं. अनुपूरक बजट में ग्रामीण विकास, शिक्षा, ग्रामीण कार्य, पेयजल, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों पर विशेष फोकस किया गया है. ग्रामीण विकास विभाग को 4,258.67 करोड़ रुपये आवंटित प्रशासन की ओर से पेश अनुपूरक बजट में सबसे बड़ा आवंटन ग्रामीण विकास विभाग को दिया गया है. विभाग के लिए 4,258.67 करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है. इसके बाद प्राथमिक एवं वयस्क शिक्षा प्रभाग को 946.31 करोड़ रुपये, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग को 912.45 करोड़ रुपये तथा ग्रामीण कार्य विभाग को 885.83 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. ये भी पढ़ें… झारखंड विधानसभा: JPSC को लेकर सदन के अंदर वेल में BJP विधायकों का हंगामा स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना पर जोर स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना से जुड़े विभागों को भी अतिरिक्त राशि दी गई है. पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के लिए 271.61 करोड़ रुपये, पंचायती राज विभाग के लिए 244.80 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के लिए 218.17 करोड़ रुपये, खान एवं भूतत्व विभाग के लिए 173.65 करोड़ रुपये तथा गृह, जेल एवं आपदा प्रबंधन विभाग के लिए 490.69 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-गवर्नेंस विभाग को 66.53 करोड़ रुपये, वित्त विभाग को 56.96 करोड़ रुपये, पर्यटन विभाग को 36.76 करोड़ रुपये, कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग को 33.21 करोड़ रुपये, विधि विभाग को 29.54 करोड़ रुपये, भवन निर्माण विभाग को 21.75 करोड़ रुपये, नगर विकास एवं आवास विभाग को 20.21 करोड़ रुपये तथा जल संसाधन विभाग को 18.06 करोड़ रुपये दिए गए हैं. ये भी पढ़ें… रामगढ़ के चुटूपालू घाटी में अब हादसों पर लगेगा ब्रेक; पहाड़ काटकर बनेगी नई फोरलेन सड़क पूंजीगत व्यय पर विशेष जोर अनुपूरक बजट में पूंजीगत व्यय को भी प्राथमिकता दी गई है. ग्रामीण कार्य विभाग को पूरे 885.83 करोड़ रुपये पूंजीगत मद में दिए गए हैं. इसके अलावा पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के लिए 69.94 करोड़ रुपये, अनुसूचित जनजाति, एससी एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के लिए 33.39 करोड़ रुपये, पर्यटन विभाग के लिए 34.87 करोड़ रुपये, शहरी विकास विभाग के लिए 11.15 करोड़ रुपये तथा स्वास्थ्य विभाग के लिए 10 करोड़ रुपये पूंजीगत मद में प्रस्तावित किए गए हैं. इससे सड़क, पेयजल, भवन और अन्य आधारभूत संरचना परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है. अनुपूरक बजट की अनुदान मांगों पर चर्चा के बाद प्रशासन विनियोग विधेयक भी सदन में पेश करेगी. विधेयक के पारित होने के बाद संबंधित विभागों को अतिरिक्त राशि खर्च करने की वैधानिक अनुमति मिल जाएगी. वित्तीय वर्ष 2026-27 : प्रथम अनुपूरक बजट (विभागवार आवंटन) क्रम विभाग राशि (करोड़ रुपये में) 1 ग्रामीण विकास विभाग 4,258.67 2 प्राथमिक एवं वयस्क शिक्षा प्रभाग 946.31 3 अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग 912.45 4 ग्रामीण कार्य विभाग 885.83 5 गृह, जेल एवं आपदा प्रबंधन विभाग (आपदा प्रबंधन) 490.69 6 पेयजल एवं स्वच्छता विभाग 271.61 7 पंचायती राज विभाग 244.80 8 स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग 218.17 9 खान एवं भूतत्व विभाग 173.65 10 ब्याज भुगतान 152.00 11 कैबिनेट सचिवालय (निर्वाचन) 86.78 12 सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-गवर्नेंस विभाग 66.53 13 वित्त विभाग 56.96 14 पर्यटन विभाग (पर्यटन प्रभाग) 36.76 15 कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग 33.21 16 ऋण की अदायगी 31.08 17 विधि विभाग 29.54 18 मंत्रिमंडल सचिवालय (नागर विमानन) 27.07 19 माध्यमिक शिक्षा प्रभाग 25.06 20 वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग 23.55 21 भवन निर्माण विभाग 21.75 22 नगर विकास एवं आवास विभाग 20.21 23 झारखंड उच्च न्यायालय 19.20 24 जल संसाधन विभाग 18.06 25 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग 16.96 26 राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग (राजस्व) 16.29 27 स्त्री, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग 14.79 28 ऊर्जा विभाग 14.36 29 स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग (पूंजीगत) 10.00 30 वाणिज्यकर विभाग 8.85 31 डेयरी प्रभाग 7.06 32 कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग (डेयरी) 7.06 33 श्रम, नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास विभाग 2.00 34 राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग (निबंधन) 2.00 35 विधानसभा सचिवालय 1.45 36 उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग 0.91 37 खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग 0.33 38 योजना एवं विकास विभाग 0.20 39 संसदीय कार्य विभाग 0.20 40 विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग (मुख्यालय) 0.15 41 कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग (पशुपालन) 0.05 42 राज्यपाल सचिवालय 0.05 43 कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग (सहकारिता) 0.04 44 राजभाषा प्रभाग 0.01 The post झारखंड विधानसभा में 8,399.31 करोड़ का पहला अनुपूरक बजट पेश, ग्रामीण विकास को सबसे ज्यादा राशि appeared first on Naya Vichar.

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RSS चीफ भागवत के बयान पर CPI(M) का हमला: बालगोपाल बोले-BJP की जमीन खिसक रही है, इसलिए बदले सुर

RSS प्रमुख मोहन भागवत के ‘जेन जी’ (नई पीढ़ी) व ‘जेन अल्फा’ के साथ संवाद को लेकर केरल के वित्त मंत्री और CPI(M) नेता के एन बालगोपाल ने BJP और RSS पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि अब BJP और RSS युवाओं की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें महसूस हो गया है कि जनता के बीच उनकी पकड़ कमजोर पड़ रही है. उन्होंने कहा कि यह बदलाव नेतृत्वक मजबूरी का परिणाम है, न कि युवाओं के प्रति वास्तविक चिंता. युवाओं की मांगों को पहले किया गया नजरअंदाज CPI(M) नेता बालगोपाल ने आरोप लगाया कि लंबे समय से युवा रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठा रहे हैं, लेकिन मोदी प्रशासन ने इन मांगों को गंभीरता से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि जब इन मुद्दों पर चर्चा का समय था, तब प्रशासन समाधान के बजाय चुप्पी साधे रही. अब जब युवाओं का असंतोष बढ़ रहा है, तब प्रशासन और RSS दोनों अपने रुख में बदलाव दिखा रहे हैं.  RSS प्रमुख मोहन भागवत ने साफ कहा कि यदि Gen Z किसी आंदोलन में हिस्सा लेती है तो उसे देशविरोधी नहीं कहा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह हमारी अपनी अगली पीढ़ी है और उनके साथ अपनापन व सम्मान का रिश्ता होना चाहिए. संवाद तभी सफल होगा जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की बात समझने और सुनने के लिए तैयार हों. उन्होंने कहा कि उनके अनुसार आज की Gen Z और Gen Alpha मौजूदा पीढ़ी से अधिक ईमानदार है. इस पीढ़ी में राष्ट्र के प्रति निष्ठा, देशभक्ति और सेवा की भावना मजबूत होनी चाहिए. पुरानी घटनाओं से जोड़ा मौजूदा विवाद CPI(M) नेता बालगोपाल ने कहा कि पिछले दस वर्षों में बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और युवाओं के विभिन्न आंदोलनों ने केंद्र प्रशासन को लगातार घेरा है. कई राज्यों में छात्रों और युवाओं ने प्रदर्शन किए, लेकिन विपक्ष का आरोप रहा कि उनकी मांगों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. अब RSS प्रमुख का युवाओं से संवाद उसी बढ़ते दबाव का परिणाम माना जा रहा है. नीति बदले बिना नहीं बनेगी बात CPI(M) नेता बालगोपाल ने कहा कि केवल बयान देने या संवाद करने से स्थिति नहीं बदलेगी. यदि प्रशासन वास्तव में युवाओं का भरोसा जीतना चाहती है तो उसे रोजगार, शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस नीतिगत फैसले लेने होंगे. उन्होंने दावा किया कि देशभर में युवाओं के आंदोलनों को व्यापक समर्थन मिल रहा है और प्रशासन को नेतृत्वक संदेशों के बजाय वास्तविक बदलाव पर ध्यान देना चाहिए. The post RSS चीफ भागवत के बयान पर CPI(M) का हमला: बालगोपाल बोले-BJP की जमीन खिसक रही है, इसलिए बदले सुर appeared first on Naya Vichar.

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थलपति विजय और पत्नी संगीता का नहीं होगा तलाक, फैमिली कोर्ट से वापस ली याचिका

Thalapathy Vijay Divorce Case: साउथ सुपरस्टार से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने थलपति विजय और उनकी पत्नी संगीता सोर्नालिंगम के तलाक मामले में बड़ा अपडेट सामने आया है. संगीता ने फैमिली कोर्ट में दाखिल अपनी तलाक की याचिका वापस ले ली है. इसके बाद कोर्ट ने इस मामले को बंद कर दिया. यानी फिलहाल विजय और संगीता का तलाक नहीं होगा. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में शामिल हुईं संगीता PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को संगीता सोर्नालिंगम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए फैमिली कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुईं. इस दौरान उन्होंने कोर्ट को अपनी याचिका वापस लेने की वजह बताई. इसके बाद जज ने उनकी अर्जी स्वीकार कर ली और सुनवाई यहीं खत्म हो गई. संगीता ने क्यों मांगा था तलाक? यह मामला फरवरी 2026 में शुरू हुआ था, जब संगीता सोर्नालिंगम ने चेंगलपट्टू फैमिली कोर्ट में थलपति विजय से तलाक की याचिका दायर की थी. अपनी अर्जी में उन्होंने कहा था कि दोनों के बीच मतभेद इतने बढ़ गए हैं कि अब साथ रहना संभव नहीं है. इसके साथ ही उन्होंने परमानेंट एलिमनी (गुजारा भत्ता) की मांग की थी और चेन्नई के नीलांकरई स्थित अपने वैवाहिक घर में रहने की अनुमति भी मांगी थी. इसके बाद यह मामला कई महीनों तक कोर्ट में चलता रहा और सुनवाई भी कई बार टलती रही. 15 जून 2026 को हुई सुनवाई में संगीता ने कोर्ट को बताया था कि वह अपनी याचिका वापस लेना चाहती हैं. वहीं, एक दूसरी सुनवाई में न विजय कोर्ट पहुंचे और न ही संगीता. दोनों की ओर से उनके वकील मौजूद रहे और कोर्ट को बताया कि वे सुनवाई में शामिल नहीं हो सके. 30 साल पुराना है विजय और संगीता का रिश्ता विजय और संगीता की शादी को करीब तीन दशक हो चुके हैं. दोनों ने 25 अगस्त 1999 को चेन्नई में पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज से शादी की थी. शादी के बाद दोनों दो बच्चों के माता-पिता बने. उनके बेटे का जन्म साल 2000 में हुआ, जबकि 2005 में उनकी बेटी का जन्म हुआ. ये भी पढ़ें: चीटिंग के शक पर एक्ट्रेस ने अपने ही पति के पीछे लगाया प्राइवेट डिटेक्टिव, फिर जांच में खुलते गए कई राज The post थलपति विजय और पत्नी संगीता का नहीं होगा तलाक, फैमिली कोर्ट से वापस ली याचिका appeared first on Naya Vichar.

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मुझे अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद रहाणे ने बताया आगे का प्लान

Ajinkya Rahane: हिंदुस्तानीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और अनुभवी बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास के फैसले पर पहली बार खुलकर बात की है. रहाणे ने कहा कि उन्हें अपने फैसले का कोई पछतावा नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपने करियर में हर बार अपना 200 फीसदी देने की कोशिश की. अपने करियर से पूरी तरह संतुष्ट रहाणे ने कहा कि संन्यास का फैसला लेने से पहले उन्होंने करीब एक महीने तक खुद से सवाल किए कि क्या कोई अधूरापन या पछतावा तो नहीं है. लेकिन उन्हें हर बार यही जवाब मिला कि उन्होंने मैदान पर अपना सब कुछ झोंक दिया और अपने करियर से पूरी तरह संतुष्ट हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं अपने फैसले से बहुत खुश हूं. मैं पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता. जब मैंने यह फैसला लिया तो करीब 25-30 दिनों तक इस पर विचार किया. मैंने खुद से पूछा कि क्या कुछ ऐसा है जो मैं अलग कर सकता था, लेकिन जवाब था- नहीं. मैंने अपनी तरफ से 200 फीसदी दिया.’ बनना चाहते ​है कोच या मेंटर 14 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर को अलविदा कहने वाले रहाणे अब क्रिकेट से जुड़े नए रोल के लिए भी तैयार हैं. उन्होंने कहा कि वह भविष्य में कोच या मेंटर की भूमिका निभाना पसंद करेंगे, क्योंकि उन्होंने अपने करियर में हर तरह की परिस्थितियों का सामना किया है और खिलाड़ियों की मानसिकता को अच्छी तरह समझते हैं. रहाणे ने कहा कि वह अपने अनुभव को सिर्फ खुद तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि दुनियाभर की लीगों में स्पोर्ट्सकर युवा खिलाड़ियों के साथ अपना ज्ञान साझा करना चाहते हैं. Also Read: क्रिकेट के खिलाफ नहीं हूं, बस हर स्पोर्ट्स को मिले बराबर सम्मान, शुबम जुयाल ने फैंस से की खास अपील कप्तानी में छोड़ी है गहरी छाप बता दें कि रहाणे ने हिंदुस्तान के लिए 85 टेस्ट मैचों में 5077 रन बनाए, जिसमें 12 शतक और 26 अर्धशतक शामिल हैं. वह 2020-21 बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ऐतिहासिक सीरीज जीत के दौरान अपनी कप्तानी के लिए भी याद किए जाते हैं. उनकी कप्तानी में हिंदुस्तान ने मेलबर्न टेस्ट जीता था और गाबा में ऑस्ट्रेलिया का अभेद किला भी तोड़ा था. एम्स्टर्डम फ्लेम्स का होंगे हिस्सा अजिंक्य रहाणे अब आगामी यूरोपियन टी20 प्रीमियर लीग (ETPL) के पहले सीजन में एम्स्टर्डम फ्लेम्स के मार्की खिलाड़ी के तौर पर स्पोर्ट्सते नजर आने वाले है. एम्स्टर्डम फ्लेम्स ने शुक्रवार को रहाणे के साथ करार का ऐलान किया. यह रहाणे का पहला विदेशी टी20 असाइनमेंट होगा. Also Read: रिटायरमेंट के बाद अजिंक्य रहाणे ने यूरोपियन T20 लीग में शुरु की नई पारी, जाने किस टीम से स्पोर्ट्सेंगे The post मुझे अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद रहाणे ने बताया आगे का प्लान appeared first on Naya Vichar.

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370 विरोध प्रदर्शन पर FIR के बाद महबूबा बोलीं- 2019 से PDP को बनाया जा रहा निशाना, उमर ने बताया ‘फिक्स्ड मैच’

Article 370 Anniversary : जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने की बरसी पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) प्रमुख महबूबा मुफ्ती और उनकी बेटी इल्तिजा मुफ्ती के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर सियासत तेज हो गई है. श्रीनगर में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए महबूबा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि वर्ष 2019 से उनकी पार्टी को लगातार निशाना बनाया जा रहा है और उसे कमजोर करने की कोशिशें आज भी जारी हैं. वहीं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने महबूबा के आरोपों को खारिज करते हुए पूरे घटनाक्रम को “फिक्स्ड मैच” करार दिया. ‘2019 से PDP को तोड़ने की कोशिश जारी’ महबूबा मुफ्ती ने कहा कि अनुच्छेद 370 और 35A की बहाली के लिए सबसे पहले और सबसे मुखर तरीके से PDP ने आवाज उठाई थी. उन्होंने दावा किया कि इसी वजह से 2019 के बाद उनकी पार्टी को तोड़ने की कोशिश शुरू हुई. उनके अनुसार, पार्टी से कई अलग-अलग गुट बनाए गए और कुछ नेताओं ने अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन भी किया. महबूबा ने कहा कि आज भी PDP को नेतृत्वक रूप से कमजोर करने की कोशिशें जारी हैं और उनकी पार्टी अपने रुख से पीछे हटने वाली नहीं है. Also read : मोरबी के कुएं में उठीं रहस्यमयी लहरें, चमत्कार या विज्ञान? जांच से खुलेगा असली राज इल्तिजा पर FIR और पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल महबूबा मुफ्ती ने अपनी बेटी इल्तिजा मुफ्ती के खिलाफ दर्ज एफआईआर का भी बचाव किया. PDP का आरोप है कि 4 अगस्त को पार्टी कार्यालय के बाहर निकाले गए कैंडल मार्च के दौरान पुलिस ने इल्तिजा को रोका और उनके साथ अभद्र व्यवहार किया. पार्टी का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया और इस मामले को अदालत में ले जाया जाएगा. उमर अब्दुल्ला बोले- यह ‘फिक्स्ड मैच’ है मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने महबूबा मुफ्ती के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “इस फिक्स्ड मैच पर मुझसे टिप्पणी मत कराइए. जो कुछ हुआ, उसके बाद उनकी छवि कमजोर हो गई थी. जब भी उनकी छवि कमजोर होती है, एजेंसियां उनकी विश्वसनीयता वापस लाने की कोशिश करती हैं.” उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “क्या इल्तिजा मुफ्ती पांच साल की बच्ची हैं? पांच साल का बच्चा भी जानता है कि किसी को इस तरह उकसाया नहीं जाता. यह लोगों को गुमराह करने और नेतृत्वक फायदा उठाने की कोशिश है. दुर्भाग्य से PDP बार-बार ऐसा करती है.” ‘अनुच्छेद 370 लोगों के दिलों में है’ महबूबा मुफ्ती ने भाजपा पर भी निशाना साधते हुए कहा कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के समय विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन आज भी जम्मू-कश्मीर के लोगों के दिलों में अनुच्छेद 370 मौजूद है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ PDP और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच की लड़ाई नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की पहचान और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है. Also read : संसद में बढ़ा सियासी तनाव! शाह-बिड़ला की 1 घंटे की बंद कमरे में मीटिंग, क्या टूटेगा विपक्ष का घेराव? The post 370 विरोध प्रदर्शन पर FIR के बाद महबूबा बोलीं- 2019 से PDP को बनाया जा रहा निशाना, उमर ने बताया ‘फिक्स्ड मैच’ appeared first on Naya Vichar.

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बंगाल में ठप पड़ी 17 रेल परियोजनाओं पर शुरू होगा काम, जानें क्यों अटके थे प्रोजेक्ट

पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ वर्षों से अधर में लटकी 17 रेल परियोजनाओं को रेल मंत्रालय की मंजूरी मिल गयी है. संसद के उच्च सदन राज्यसभा में केंद्र प्रशासन ने क्षेत्र के समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए इन नयी रेल लाइन परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने (दोबारा शुरू करने) का निर्णय लिया है. राज्यसभा में सांसद विश्वजीत सिन्हा (राहुल सिन्हा) द्वारा पूछे गये अतारांकित प्रश्न संख्या 2364 के लिखित उत्तर में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शुक्रवार को यह जानकारी दी. क्यों अटकी थीं परियोजनाएं? रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में बताया कि इनमें से कई परियोजनाएं अलग से या पहले से चल रही योजनाओं के हिस्से के रूप में स्वीकृत की गयीं थीं. हालांकि, तत्कालीन राज्य प्रशासन द्वारा भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) में सहयोग नहीं मिलने और कानून-व्यवस्था (Law & Order) की समस्याओं के कारण इन प्रोजेक्ट्स पर काम आगे नहीं बढ़ सका था. इन्हें बीच में ही रोकना पड़ा था. अब आम जनता की आवश्यकताओं और लगातार उठ रही मांगों को देखते हुए रेल मंत्रालय ने इन परियोजनाओं पर फिर से काम शुरू करने का फैसला किया है. ये भी पढ़ें: मोदी प्रशासन ने बंगाल को दी 83433 करोड़ की परियोजनाएं, शमिक भट्टाचार्य को अश्विनी वैष्णव का जवाब दोबारा शुरू होने वाली 17 नयी रेल लाइन परियोजनाओं लिस्ट प्रांतिक – सूरी Prantik – Siuri 34 किमी नयी रेल लाइन बनगांव – पोरामहेशतला Bangaon – Poramahesthala 20 किमी नयी रेल लाइन बनगांव – चांदबाजार Bangaon – Chandbazar 12 किमी नयी रेल लाइन चांदबाजार – बागदा Chandbazar – Bagdah 14 किमी नयी रेल लाइन राणाघाट (आरानघाटा) – दत्तफुलिया Ranaghat (Aranghata)–Duttaphulia 8 किमी नयी रेल लाइन कांथी – एगरा Kanthi – Egra 26 किमी नयी रेल लाइन नंदकुमार – बलाईपांडा Nandakumar – Balaipanda 28 किमी नयी रेल लाइन नंदीग्राम – कांदियामारी (नयाचार) Nandigram–Kandiamari (Nayachar) 7 किमी नयी रेल लाइन बोवाईचंडी – आरामबाग Bowaichandi – Arambagh 31 किमी नयी रेल लाइन बोवाईचंडी – खाना Bowaichandi – Khana 24 किमी नयी रेल लाइन बांकुड़ा (कालाबाटी) – पुरुलिया (हुरा के रास्ते) Bakura (Kalabati)–Purulia via Hura 65 किमी नयी रेल लाइन रायगंज – ईटाहार Raiganj – Itahar 22 किमी नयी रेल लाइन गंगारामपुर/गजोले – ईटाहार Gazole – Itahar 27 किमी नयी रेल लाइन ईटाहार – बुनियादपुर Itahar – Buniadpur 27 किमी नयी रेल लाइन चालसा – नक्सल Chalsa – Naxal 20 किमी नयी रेल लाइन राजाभातखावा – जैंतिया Rajabhatkhawa – Jaintia 15 किमी नयी रेल लाइन रायगंज – दालखोला Raiganj – Dalkhola 43 किमी नयी रेल लाइन ये भी पढ़ें: रेलवे भर्ती परीक्षा : रांची-सबौर के बीच आज से चलेंगी परीक्षा स्पेशल ट्रेन The post बंगाल में ठप पड़ी 17 रेल परियोजनाओं पर शुरू होगा काम, जानें क्यों अटके थे प्रोजेक्ट appeared first on Naya Vichar.

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संसद में बढ़ा सियासी तनाव! शाह-बिड़ला की 1 घंटे की बंद कमरे में मीटिंग , क्या टूटेगा विपक्ष का घेराव?

संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (7 अगस्त) को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की. पीटीआई न्यूज एजेंसी के मुताबिक, करीब एक घंटे तक चली इस बैठक ने नेतृत्वक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिय. उधर, विपक्ष लगातार छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और राम मंदिर के लिए मिले चंदे में कथित गड़बड़ी के मुद्दे पर सदन में चर्चा की मांग कर रहा है, जबकि प्रशासन अपने रुख पर कायम है. विपक्ष की मांग पर अड़ा सदन विपक्ष का कहना है कि 20 जुलाई को संसद मार्च कर रहे छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह सदन में जवाब दें. इसी के साथ राम मंदिर के लिए मिले चंदे में कथित चोरी के आरोपों पर भी विस्तृत चर्चा कराई जाए. इन मांगों को लेकर विपक्ष लगातार हंगामा कर रहा है, जिसके कारण लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है. यह पहली बार नहीं है जब संसद में गतिरोध के दौरान सत्ता पक्ष के शीर्ष नेताओं और लोकसभा अध्यक्ष के बीच अहम बैठक हुई हो. इससे पहले 2023 और 2024 के कई संसदीय सत्रों में भी विपक्ष के हंगामे के बीच प्रशासन और स्पीकर के बीच लगातार बैठकें हुई थीं. मणिपुर हिंसा, सुरक्षा चूक, महंगाई और अन्य विवादित मुद्दों पर भी संसद लंबे समय तक नहीं चल सकी थी. ऐसे समय में हुई बैठकों के बाद कई बार गतिरोध खत्म हुआ, जबकि कई बार टकराव और बढ़ गया. क्या निकलेगा गतिरोध का समाधान? अमित शाह और ओम बिरला की इस मुलाकात को संसद की आगे की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि बैठक के बाद किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई. अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन विपक्ष की मांगों पर चर्चा के लिए तैयार होती है या फिर संसद का गतिरोध आने वाले दिनों में और गहरा जाएगा. ये भी पढ़ें: मोरबी के कुएं में उठीं रहस्यमयी लहरें, चमत्कार या विज्ञान? जांच से खुलेगा असली राज The post संसद में बढ़ा सियासी तनाव! शाह-बिड़ला की 1 घंटे की बंद कमरे में मीटिंग , क्या टूटेगा विपक्ष का घेराव? appeared first on Naya Vichar.

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मोरबी के कुएं में उठीं रहस्यमयी लहरें, चमत्कार या विज्ञान? जांच से खुलेगा असली राज

गुजरात के मोरबी जिले के विरपरडा गांव का एक खेत का कुआं इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है. कुएं के पानी में बिना किसी बाहरी कारण के लगातार लहरें उठती दिखाई देने लगीं. इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद कई लोगों ने इसे चमत्कार या किसी रहस्यमयी घटना से जोड़ना शुरू कर दिया. मामला बढ़ने पर जिला प्रशासन ने तुरंत वैज्ञानिक जांच के आदेश दिए. मोरबी के जिला कलेक्टर स्वप्निल खरे ने बताया कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर जिला भू-वैज्ञानिकों की टीम मौके पर पहुंची. शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि पानी के नीचे फंसी हवा के दबाव और उसके स्थान बदलने से पानी की सतह पर लहरें बन रही हैं. हालांकि अंतिम निष्कर्ष के लिए गुजरात ग्राउंडवाटर रिसर्च इंस्टीट्यूट को विस्तृत अध्ययन कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है. पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले यह पहली बार नहीं है जब किसी कुएं या जलस्रोत में ऐसी रहस्यमयी हलचल देखने को मिली हो. इससे पहले महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात के कुछ इलाकों में भी भूगर्भीय गतिविधियों, भूमिगत गैस, दबाव में बदलाव या पानी के प्राकृतिक प्रवाह के कारण कुओं और तालाबों में लहरें उठने जैसी घटनाएं सामने आई थीं. शुरुआती दौर में इन्हें चमत्कार बताया गया, लेकिन बाद की वैज्ञानिक जांच में इनके पीछे प्राकृतिक कारण पाए गए. रिपोर्ट के बाद साफ होगी पूरी तस्वीर फिलहाल प्रशासन लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और आधिकारिक रिपोर्ट का इंतजार करने की अपील कर रहा है. जांच के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि पानी में उठ रही लहरों के पीछे केवल प्राकृतिक भूगर्भीय कारण हैं या कोई अन्य वैज्ञानिक वजह. गुजरात ग्राउंडवाटर रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट आने के बाद पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी. ये भी पढ़ें: उत्तराखंड में बारिश का कहर! चेतावनी स्तर से ऊपर बह रही गंगा, ऋषिकेश के घाट खाली कराए गए The post मोरबी के कुएं में उठीं रहस्यमयी लहरें, चमत्कार या विज्ञान? जांच से खुलेगा असली राज appeared first on Naya Vichar.

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Tribalpedia: आदिवासी कला डिजिटल हुई, लेकिन अधिकार किसका हुआ? Part 1

किसी आदिवासी चित्र को संग्रहालय की दीवार से उठाकर डिजिटल स्क्रीन पर लाना पहली नजर में संरक्षण का काम लगता है. तस्वीर सुरक्षित रहेगी, दुनिया उसे देख सकेगी और शायद कलाकार की परंपरा को नई पहचान भी मिलेगी. लेकिन सवाल यह है कि उस चित्र को डिजिटल बनाने का अधिकार किसके पास है? मान लीजिए किसी गांव की एक पारंपरिक चित्रकला पीढ़ियों से समुदाय के साथ जीवित है. उसे किसी संस्था ने स्कैन किया, ऑनलाइन संग्रह में डाल दिया और कुछ समय बाद वही तस्वीर दुनिया भर की वेबसाइटों, किताबों या व्यावसायिक उत्पादों में दिखाई देने लगी. समुदाय के पास न अनुमति देने का अधिकार था, न कमाई में हिस्सा और न ही यह तय करने की ताकत कि उसकी कला को किस संदर्भ में दिखाया जाए. यहीं से संरक्षण और सांस्कृतिक कब्जे के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है. हिंदुस्तान में जादोपाटिया चित्रकला, वारली कला, पारंपरिक नृत्य, अनुष्ठान और मौखिक परंपराओं का डिजिटल दस्तावेजीकरण तेजी से बढ़ा है. इसका उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत को बचाना है. लेकिन जब किसी समुदाय की अनुमति और profit-sharing के बिना उसकी कला को डिजिटल संग्रह में रखा जाता है, तो संरक्षण का यह प्रयास digital extraction यानी संस्कृति से डेटा निकालने की प्रक्रिया जैसा दिखाई देने लगता है. Read More: Tribalpedia Brazil: सोने की तलाश में बीमार होती नदी, बिखरती जिंदगी समस्या सिर्फ तस्वीर की नहीं, अधिकार की है आदिवासी कला को लेकर सबसे बड़ी कानूनी दिक्कत यह है कि हिंदुस्तानीय कॉपीराइट कानून मुख्य रूप से एक ऐसे लेखक की कल्पना करता है, जिसकी पहचान की जा सके. लेकिन आदिवासी कला अक्सर किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं होती. वह समुदाय की सामूहिक स्मृति होती है. एक पीढ़ी उसे दूसरी पीढ़ी को देती है. उसके रंग, आकृतियां, प्रतीक और तकनीक किसी एक कलाकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा होते हैं. यही कारण है कि ऐसी कला को कई बार बिना लेखक या सामुदायिक संपत्ति मान लिया जाता है. फिर उसे संग्रहालय, विश्वविद्यालय या निजी संस्थाएं डिजिटल रूप में संग्रहित और इस्तेमाल कर सकती हैं. लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है- अगर किसी रचना का कोई एक लेखक नहीं है, तो क्या उसका कोई मालिक भी नहीं है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने Eastern Book Company v. D.B. Modak मामले में मौलिकता को बहुत कठोर अर्थ में देखने के बजाय कम रचनात्मकता की कसौटी को स्वीकार किया था. यानी कानून यह मानता है कि रचनात्मकता हमेशा असाधारण या पूरी तरह नई होने की जरूरत नहीं है. फिर सामुदायिक रचनात्मकता को उसी नजर से देखने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए? डिजिटल दुनिया में कला की ‘दूसरी जिंदगी’ डिजिटाइजेशन केवल किसी चित्र की फोटो खींचना नहीं है. हाई-रेजोल्यूशन स्कैन, ऑनलाइन कैटलॉग और डिजिटल संग्रह किसी जीवित सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को ऐसी डिजिटल वस्तु में बदल देते हैं, जिसे आसानी से खोजा, कॉपी किया और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है. यहीं शक्ति का संतुलन भी बदल जाता है. जिस कला पर पहले समुदाय का सांस्कृतिक नियंत्रण था, उसके डिजिटल संस्करण पर नियंत्रण किसी संग्रहालय, विश्वविद्यालय या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के पास जा सकता है. वह संस्था तय कर सकती है कि सामग्री कौन देखेगा, किसे लाइसेंस मिलेगा और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल कैसे होगा. इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिए. किसी गांव का कुआं अगर गांव के लोगों का है, तो उसकी तस्वीर लेने से कुएं का मालिकाना हक नहीं बदलता. लेकिन अगर उसी तस्वीर के आधार पर पानी के अधिकार, पहुंच और उपयोग पर कोई बाहरी संस्था नियंत्रण करने लगे, तो मामला बदल जाता है. डिजिटल संस्कृति के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है. Read More: Tribalpedia Latin-America: Rosewood की लड़ाई ने दुनिया को क्या सिखाया? ‘आइडिया’ नहीं, जीवित अभिव्यक्ति कॉपीराइट कानून विचार और उसकी अभिव्यक्ति में अंतर करता है. R.G. Anand v. Deluxe Films मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कॉपीराइट की सुरक्षा को विचार के बजाय उसकी ठोस अभिव्यक्ति से जोड़ा. आदिवासी कला के मामले में समस्या तब पैदा होती है, जब किसी पूरी परंपरा को सिर्फ स्टाइल, थीम या सांस्कृतिक विचार मान लिया जाता है. जबकि वास्तविक चित्र, तकनीक, प्रतीक और सामाजिक संदर्भ ठोस अभिव्यक्तियां हो सकते हैं. स्रोत सामग्री का तर्क है कि यदि इन्हें सही कानूनी दृष्टि से देखा जाए, तो आदिवासी कला को संरक्षण की अधिक मजबूत जमीन मिल सकती है. संविधान में संस्कृति, लेकिन डिजिटल सहमति कहां? हिंदुस्तान का संविधान समुदायों की विशिष्ट संस्कृति को बनाए रखने के अधिकार को पहचानता है. अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक पहचान की रक्षा से जुड़ा है. वहीं अनुच्छेद 21 की व्यापक न्यायिक व्याख्या में गरिमा और स्वायत्तता जैसे अधिकार शामिल किए गए हैं. Puttaswamy फैसले के बाद निजता (privacy) और अपने डेटा पर नियंत्रण (data protection) का सवाल भी संवैधानिक विमर्श का हिस्सा बना है. यहां से एक नया प्रश्न निकलता है- अगर व्यक्ति को अपने निजी डेटा पर नियंत्रण का अधिकार है, तो क्या समुदाय को अपनी सामूहिक सांस्कृतिक जानकारी पर नियंत्रण का अधिकार नहीं होना चाहिए? आदिवासी कला का डिजिटलीकरण बिना अनुमति के होने पर समुदाय यह तय नहीं कर पाता कि उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति डिजिटल दुनिया में कैसे जाए, किस रूप में प्रस्तुत हो और उसका इस्तेमाल कौन करे. स्रोत सामग्री इसी कमी को हिंदुस्तानीय कानून की बड़ी खामी के रूप में देखती है. जैव विविधता कानून से मिल सकता है रास्ता हिंदुस्तान के जैव विविधता कानून में एक दिलचस्प रास्ता दिखाई देता है. Biological Diversity Act, 2002 जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के इस्तेमाल को समुदायों की सहमति और लाभ-साझेदारी से जोड़ता है. इसका मतलब यह है कि कानून यह मानता है कि आदिवासी और स्थानीय समुदाय केवल ज्ञान के स्रोत नहीं हैं, बल्कि उस ज्ञान के अधिकार रखने वाले संरक्षक भी हैं. यही बात कला पर भी लागू की जा सकती है. अगर किसी समुदाय की पारंपरिक औषधीय जानकारी के इस्तेमाल पर उसकी सहमति जरूरी मानी जाती है, तो उसकी सांस्कृतिक कला के व्यावसायिक और डिजिटल इस्तेमाल पर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? Orissa Mining Corporation Ltd. v. Ministry of Environment & Forests मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी समुदायों को उनके पवित्र स्थलों से जुड़े फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका दी थी. स्रोत सामग्री

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