ऑर्केस्ट्रा में जमीन से चुनते थे पैसे, ‘सांसों की माला’ ने बना दिया स्टार, Mirzapur के इस सिंगर की दिलचस्प कहानी…
किसी महफिल में जब लोग कलाकारों पर पैसे उड़ाते हैं, तो आमतौर पर उन नोटों को देखकर खुशी होती है. लेकिन मधुर शर्मा के लिए उन उड़ते हुए नोटों की कहानी कुछ और थी. वह उन नोटों को जमीन से चुनते थे. कभी ₹400 मिल जाते थे, तो कभी सिर्फ ₹50. यही उनकी फीस हुआ करती थी. आज वही मधुर शर्मा ‘मिर्जापुर’ के लिए ‘सांसों की माला’ रीक्रिएट कर चुके हैं और उनकी आवाज बॉलीवुड तक पहुंच चुकी है. लेकिन जमीन से नोट चुनने से लेकर लाखों लोगों के दिलों तक पहुंचने का यह सफर इतना आसान नहीं था. इसके पीछे बचपन का दर्द, परिवार को खोने का सदमा और सालों की मेहनत छिपी है. 10 साल की उम्र में सिर से उठ गया पिता का साया मध्य प्रदेश के विदिशा से आने वाले मधुर शर्मा ने नया विचार से खास बातचीत में अपनी जिंदगी के उस दौर को याद किया, जब उन्होंने महज 10 साल की उम्र में पिता को खो दिया था. मधुर के पिता ट्रांसपोर्ट का बिजनेस करते थे. इसके साथ ही उन्हें संगीत से भी बेहद लगाव था. वह कई बार जागरण में बतौर सिंगर परफॉर्म किया करते थे. घर में संगीत का माहौल था, लेकिन मधुर का सपना सिंगर बनने का नहीं था. वह डांसर बनना चाहते थे. फिर अचानक पिता इस दुनिया से चले गए और जिंदगी ने ऐसी करवट ली, जिसने मधुर के सारे सपनों और सोच को बदल दिया. मधुर कहते हैं, “फिर किस्मत बदली और हमें उस दौरान कई रिएलिटी चेक मिली. वो बहुत ही खराब दौर है, जिस पर बात नहीं करना चाहता.” कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें याद करना भी आसान नहीं होता. मधुर के लिए पिता को खोने का वह दौर शायद ऐसा ही था. पिता की कमी ने जिंदगी को दूसरी दिशा में मोड़ दिया हालात बदले तो मधुर ने सिंगिंग शुरू की. उन्होंने कवर सॉन्ग गाने शुरू किए. लेकिन सोशल मीडिया पर पहचान बनने से पहले उनकी असली ट्रेनिंग छोटे-छोटे मंचों और ऑर्केस्ट्रा में हुई. मधुर करीब आठ साल तक ऑर्केस्ट्रा में बतौर कोरस सिंगर गाते रहे. यही वह दौर था, जब उन्होंने संगीत को सिर्फ गाना नहीं, बल्कि जीना सीखा. और इसी दौरान उन्हें पहली कमाई भी मिली. महफिल खत्म होती और मधुर जमीन से पैसे चुनते ऑर्केस्ट्रा की महफिलों में जब लोग कलाकारों पर पैसे उड़ाते थे, तो कार्यक्रम खत्म होने के बाद मधुर उन पैसों को चुनते थे. वह बताते हैं, “जब मैं ऑर्केस्ट्रा में गाया करता था, तो वहां महफिलों में पैसे उड़ाए जाते थे. उन पैसों को चुनते वक्त जितने की कमाई हुई, समझो वही मेरी फीस रही. ऐसा भी रहा कि कभी चार सौ तो कभी महज पचास रुपये भी मिले हैं.” आज यह बात सुनना शायद आसान हो, लेकिन उस वक्त यही उनकी मेहनत की कमाई थी. न कोई बड़ा मंच, न लाखों की फीस और न ही स्टारडम. बस आवाज थी और उसे सुनाने की जिद. आठ साल तक कोरस, फिर कव्वाली और गजल से जुड़ा रिश्ता ऑर्केस्ट्रा में बिताए करीब आठ सालों ने मधुर के संगीत की दिशा तय कर दी. इसी दौरान उन्हें कव्वाली और गजल को करीब से समझने का मौका मिला. धीरे-धीरे इस जॉनर से उनका रिश्ता गहरा होता गया. खासकर नुसरत फतेह अली खान के गानों को रीक्रिएट करने में उनकी दिलचस्पी बढ़ी. मधुर बताते हैं कि उनके नुसरत साहब के रीक्रिएट किए गानों को मिलियंस में व्यूज और लाइक्स मिले हैं. यानी जिस लड़के ने कभी महफिल में जमीन से पैसे चुनकर अपनी फीस जुटाई थी, उसकी आवाज अब लाखों लोगों तक पहुंचने लगी थी. लॉकडाउन ने बदल दी जिंदगी फिर आया लॉकडाउन और मधुर की जिंदगी में एक नया मोड़. उन्होंने ‘काली काली जुल्फें’ का कवर सॉन्ग बनाया. यह गाना वायरल हो गया. इसके बाद उनके कवर सॉन्ग को लोग पसंद करने लगे और धीरे-धीरे उनकी अपनी एक बड़ी ऑडियंस बन गई. आज सोशल मीडिया पर मधुर की करीब 1.5 मिलियन की फैमिली है. जिस आवाज के बदले कभी ₹50 मिलते थे, उसी आवाज को अब लाखों लोग सुनते हैं. मां गईं तो लगा, जैसे ऊपर से कोई रास्ता बना रहा है मधुर की कहानी में एक और दर्दनाक मोड़ तब आया, जब उन्होंने अपनी मां को भी खो दिया. पिता को बचपन में खोने के बाद मां उनके जीवन का बड़ा सहारा थीं. लेकिन वक्त ने उनसे यह रिश्ता भी छीन लिया. मधुर बताते हैं कि मां के जाने के बाद उन्होंने महसूस किया कि चीजें सही दिशा में जाने लगीं. इस साल उनके लिए कई अच्छे मौके आए. बॉलीवुड डेब्यू हुआ और तीन-चार नए ऑफर्स भी उनके पास आए. वह इसे अपनी मां का आशीर्वाद मानते हैं. मधुर कहते हैं, “अब मां की ही शक्ति है, जो मुझे वहां बैठे मेरी मदद कर रही है.” यह बात शायद उनकी पूरी कहानी का सबसे भावुक हिस्सा है. क्योंकि जिस मां ने संघर्ष के दिनों में बेटे को संभाला, आज मधुर अपनी सफलता में भी उन्हें अपने साथ महसूस करते हैं. ‘सांसों की माला’ से बॉलीवुड तक पहुंची वही आवाज मधुर ने हाल ही में ‘मिर्जापुर’ के लिए ‘सांसों की माला’ को रीक्रिएट किया. यह उनके सफर का एक बड़ा पड़ाव है. कभी ऑर्केस्ट्रा की महफिल में कोरस गाने वाला लड़का, कभी जमीन से ₹50 के नोट चुनकर घर लौटने वाला कलाकार, आज बॉलीवुड के प्रोजेक्ट का हिस्सा बन रहा है. और कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. मधुर आने वाले समय में मिथुन और तनिष्क बागची के साथ भी एक प्रोजेक्ट करने जा रहे हैं. यानी जिस सफर की शुरुआत विदिशा से हुई, जिसने ऑर्केस्ट्रा के छोटे मंच देखे और जिसने दर्द के बीच अपनी आवाज को संभालकर रखा, वह अब बॉलीवुड की बड़ी दुनिया में कदम बढ़ा रहा है. जमीन से उठाए नोट, अब आवाज बना रही पहचान मधुर शर्मा की कहानी सिर्फ एक सिंगर के सफल होने की कहानी नहीं है. यह उस लड़के की कहानी है जिसने 10 साल की उम्र में पिता को खोया, जिसने संघर्ष के दिनों में महफिल के बाद जमीन से अपनी फीस उठाई, जिसने कभी ₹50 के लिए गाया और जिसने अपनी मां को खोने के बाद भी उनकी याद

