जून 2023 में बालासोर ट्रेन हादसे में 250 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, लेकिन रेलवे मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ. अप्रैल 2026 में पहलगाम में आतंकियों ने नाम पूछकर 26 लोगों की हत्या की, लेकिन किसी मंत्री की जावबदेही तय नहीं हुई.
सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर में अभिनेता से नेता बने विजय की रैली में 39 लोग मारे गए. इसके 8 महीने बाद विजय मुख्यमंत्री बन गए. इन घटनाओं ने नेतृत्वक और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए.
कांग्रेस, बीजेपी समेत तमाम नेतृत्वक दलों के नेता और बड़े अधिकारी गंभीर आरोपों के बावजूद अपने पद पर बने रहते हैं. 25 जुलाई 2026 को बीते 12 सालों में पहली बार ऐसा हुआ, जब हिंदुस्तान प्रशासन ने विरोध प्रदर्शनों के चलते ताकतवर मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लिया.
अब 77 दिनों के बाद एक बार फिर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) से इस्तीफा मांगने के लिए दिल्ली में प्रदर्शन कर रही है. लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदुस्तान में गंभीर आरोपों के बाद भी नेता और अधिकारी पद क्यों नहीं छोड़ते हैं?
एक गर्भवती हिंदुस्तानीय स्त्री की मौत पर पुर्तगाली स्वास्थ्य मंत्री ने दिया था इस्तीफा
साल 2018 की बात है. डॉक्टर मार्टा टेमिडो पुर्तगाल की स्वास्थ्य मंत्री बनीं. 2 साल बाद कोरोना काल के दौरान टेमिडो ने देश को इस महामारी से उबारने में खास भूमिका निभाई. इसके बाद वह पूरे देश की आइकॉन लेडी बन गईं. लेकिन, 2022 में एक हिंदुस्तानीय गर्भवती स्त्री की मौत के बाद मंत्री टेमिडो ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मैटरनिटी वॉर्ड में जगह न मिलने की वजह से एक 34 वर्षीय गर्भवती हिंदुस्तानीय पर्यटक को दूसरे अस्पताल ट्रांसफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई. इस घटना की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए मार्टा टेमिडो ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इसी तरह जापान में नाओतो कान ने 2011 में फुकुशिमा परमाणु आपदा के बाद प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने इस घटना की जिम्मेदारी किसी और पर देने के बजाय खुद स्वीकार किया था.
गंभीर आरोपों में घिरने के बाद भी हिंदुस्तानीय नेता और अधिकारी पद क्यों नहीं छोड़ते हैं?
पूर्व राज्यसभा सांसद फौजिया खान अपने एक लेख में बताती हैं कि 1956 में एक रेल दुर्घटना के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. नैतिक जवाबदेही की गहरी भावना से प्रेरित उनके इस फैसले ने नेतृत्व का एक उच्च मानक स्थापित किया, जो आज के समय में बहुत कम देखने को मिलता है. यह घटना तब और अब के बीच के अंतर को जाहीर करता है. इससे पता चलता है कि हिंदुस्तानीय नेतृत्व से जवाबदेही क्यों गायब हो गई है?
शास्त्री के तरह ही अधिकारियों की बात करें तो टी. एन. शेषन एक बड़ा उदाहरण हैं. उन्होंने चुनाव व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कड़े कदम उठाए. इसी तरह, ईमानदार और नियमों को लागू करने वाले अधिकारी भ्रष्टाचार कम कर सकते हैं. लेकिन, अब जो हालात हैं, उसे देखकर लगता है कि हिंदुस्तानीय नेतृत्व में नैतिक उत्तरदायित्व और जवाबदेही लगातार कम होती जा रही है.
जहां पहले नेता सीधे तौर पर दोषी न होने पर भी नैतिक कारणों से इस्तीफा दे देते थे, वहीं आज का नेतृत्वज्ञ वर्ग अक्सर ऐसे कदम उठाने से बचता है और दोष दूसरों पर डालने का विकल्प चुनता है. यही वजह है कि अब नेता हो या अधिकारी अपने पद से इस्तीफा देने से बचते हैं.
क्या हिंदुस्तानीय नेता और अधिकारी कम जवाबदेह हैं?
पूर्व राज्यसभा सांसद फौजिया खान कहती हैं कि जो हालात हैं, उसे देखकर ऐसा ही लगता है कि नेता और अधिकारी लोकतंत्र, संविधान और लोगों के प्रति कम जवाबदेह होते जा रहे हैं. हिंदुस्तानीय नेतृत्व और प्रशासन में जवाबदेही का क्षरण दूरगामी परिणाम लाता है.
जब नेता और अधिकारी जिम्मेदारी से बचते हैं, तो व्यवस्था में जनता का विश्वास कम हो जाता है. लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब उसके नेता अपने कार्यों, नीतियों और निर्णयों के लिए जवाबदेह हों. जवाबदेही के बिना, लोकतांत्रिक शासन की नींव ही कमजोर हो जाती है, जिससे नागरिक अपनी गलतियों को सुधारने के लिए हर पांच साल में होने वाले चुनावों पर ही निर्भर हो जाते हैं.
हमें यह समझना होगा कि जवाबदेही केवल एक नेतृत्वक उपकरण नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व है. जैसा कि नेतृत्वक दार्शनिक हन्ना एरेंड्ट ने कहा था, “नेताओं का दायित्व केवल अपने कार्यों के लिए उत्तर देना ही नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि सत्ता जनता की सेवा में बनी रहे.” इसलिए हिंदुस्तानीय नेतृत्व को इस भावना को एक बार फिर जिंदा करना होगा. सार्वजनिक संस्थानों को भी यह सुनिश्चित करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए कि जवाबदेही शासन का एक महत्वपूर्ण पहलू बनी रहे.
अब जानिए कैसे आरोपों में घिरते ही 5 साल में 4 प्रधानमंत्रियों ने अपने पद से दिया इस्तीफा
लॉकडाउन पार्टी और बोरिस जॉनसन का इस्तीफा: ब्रिटेन में 2022 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को इस्तीफा देना पड़ा था. उन पर आरोप थे कि कोरोना काल में जब लोग अपने घरों में कैद थे उस वक्त वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहे थे. उन पर आरोप था कि न सिर्फ उन्होंने लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन किया बल्कि अपनी पार्टियों के लिए सदन को झूठ भी कहा. इन विवादों के कुछ दिनों बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.
झूठे वादे पर लिज ट्रस ने 45 दिनों में छोड़ी कुर्सी: जॉनसन के बाद कंजर्वेटिव पार्टी ने लिज ट्रस को प्रधानमंत्री नियुक्त किया. लिज देश की आर्थिक स्थिति सुधारने जैसे बड़े वादों के साथ प्रधानमंत्री चुनी गई थी, पीएम बनने के बाद वह एक मिनी बजट लेकर आई जिसका नतीजा यह रहा की ब्रिटेन की करेंसी की वैल्यू क्रैश हो गई. वह वादा पूरा नहीं कर पाई इसके चलते उन्हें 45 दिन के भीतर अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी.
पत्नी की कंपनी को फायदा पहुंचाने के आरोप में कुर्सी गई: लिज ट्रस के बाद 2024 में हिंदुस्तानवंशी ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने भी देश की वित्तीय स्थिति को लेकर बड़े-बड़े वादे किए. हालांकि, जल्द ही वह अपनी पत्नी अक्षता मूर्ति की कंपनी को फायदा पहुंचाने के आरोपों में घिर गए. उनके खिलाफ संसदीय नियमों के उल्लंघन की जांच भी हुई थी.
यह मामला मुख्य रूप से चाइल्डकेयर एजेंसी ‘कोरु किड्स’ (Koru Kids) में अक्षता मूर्ति की शेयरहोल्डिंग से जुड़ा था. इसके अलावा, वह देश की हालत ठीक करने की बजाय यूक्रेन के राष्ट्रपति के जेलेंस्की से सहानूभूति जताने के लिए ज्यादा मशहूर हुए. इन आरोपों के बाद उन पर इस्तीफा के लिए प्रेशर बढ़ने लगा. लेकिन, चुनाव नजदीक आने के कारण वह अपने पद पर बने रहे.
नतीजा यह हुआ कि उनकी कंजर्वेटिव पार्टी चुनाव हार गई और सुनक को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.
आर्थिक हालात ठीक नहीं कर पाने पर इस्तीफा देना पड़ा: सुनक के बाद जुलाई 2024 को कीर स्टार्मर प्रधानमंत्री चुने गए. उनका भी यही हाल हुआ. जुलाई 2024 में पीएम बने स्टार्मर विवादों में घिर गए, वह देश के आर्थिक हालातों को ठीक नहीं कर पा रहे थे. उनकी पब्लिक रेटिंग लगातार गिरती रही. 2026 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.
इस तरह ब्रिटेन में 5 साल में 4 प्रधानमंत्री बदले गए, लेकिन किसी भी इस्तीफे के लिए ब्रिटेन की जनता सड़कों पर नहीं उतरी. सभी इस्तीफे स्वविवेक या आरोपों में घिरने के बाद चुनाव हारने पर हुए.
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