India-Japan : हिंदुस्तान और जापान के बीच सालाना द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन 2006 से लगातार हो रहा है. समय के साथ, यह मुख्य रूप से नेतृत्वक बातचीत से आगे बढ़कर सुरक्षा, वित्तीय स्थिति, टेक्नोलॉजी, लोगों के बीच आपसी संबंध और क्षेत्रीय रणनीति जैसे कई क्षेत्रों में एक मजबूत और संस्थागत साझेदारी में बदल गया है.
2006 में हिंदुस्तान और जापान के रिश्ते को ‘Strategic and Global Partnership’ का दर्जा दिया गया था. बाद में 2014 में इसे और मजबूत करके ‘Special Strategic and Global Partnership’ बना दिया गया. और तब से सालाना शिखर सम्मेलन साझा प्राथमिकताओं को ठोस प्रोजेक्ट्स में बदलने का मुख्य जरिया बन गए हैं.
जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची का हिंदुस्तान दौरा इसलिए अहम है क्योंकि यह रिश्ता सिर्फ दिखावटी कूटनीति नहीं है. यह एशिया में बदलती शक्ति के संतुलन को संभालने का एक मंच है. हिंदुस्तान और जापान की रणनीतिक सोच का मेल एक तरफ हिंदुस्तान की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’, ‘सागर’ (SAGAR) और ‘इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव’ पर आधारित है, तो दूसरी तरफ जापान के ‘फ़्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ विजन पर.
व्यावहारिक तौर पर, यह शिखर सम्मेलन दोनों पक्षों को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रतिरोध (deterrence), समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी स्टैंडर्ड्स और संकट से निपटने की क्षमता (crisis resilience) जैसे मुद्दों पर तालमेल बिठाने का मौका देता है.
India-Japan : विकास की साझी यात्रा
दोनों देशों के बीच संबंधों का विकास तीन मुख्य चरणों में हुआ है.
- पहला चरण: सभ्यतागत सद्भावना और युद्ध के बाद सुलह पर आधारित था, जिसमें 1952 की शांति संधि के बाद राजनयिक संबंध शुरू हुए.
- दूसरा चरण: 2006 से शुरू हुआ, जिसमें सालाना शिखर सम्मेलन के जरिए नियमित नेतृत्वक गति बनी और रक्षा, बुनियादी ढांचे और आर्थिक कनेक्टिविटी के क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार हुआ.
- तीसरा चरण: 2014 से शुरू हुआ, जिसमें संबंध और अधिक मजबूत और रणनीतिक हो गए हैं. इसमें रक्षा समझौते, 2+2 वार्ता, आर्थिक सुरक्षा पर बातचीत और सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिजों, AI और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करना शामिल है.
यह विकास संस्थागत संबंधों के दायरे में भी साफ दिखता है. हिंदुस्तान और जापान के बीच अब 70 से ज़्यादा द्विपक्षीय वार्ता तंत्र हैं, 2018 से 2+2 मंत्री-स्तरीय प्रारूप है, और विदेश, रक्षा तथा आर्थिक-सुरक्षा चैनलों के माध्यम से लगातार समन्वय होता है.
आर्थिक मोर्चे पर, जापान हिंदुस्तान में एक प्रमुख निवेशक और सबसे बड़ा द्विपक्षीय ODA (आधिकारिक विकास सहायता) देने वाला देश बना हुआ है, जबकि मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना लंबे समय के रणनीतिक बुनियादी ढांचा सहयोग का एक प्रमुख उदाहरण है. इस प्रकार, यह संबंध दोस्ती पर आधारित कूटनीति से आगे बढ़कर नियमों पर आधारित और परियोजनाओं पर केंद्रित साझेदारी के रूप में परिपक्व हुआ है.
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रणनीतिक कारण
- पहला, जापान एशिया में एक बैलेंसिंग पावर (संतुलन बनाने वाली ताकत) के तौर पर एक मजबूत हिंदुस्तान चाहता है. जापान को क्षेत्रीय दबाव, समुद्री रास्तों की सुरक्षा और बड़े इंडो-पैसिफिक सिस्टम की कमज़ोरी की गहरी चिंता है, इसलिए हिंदुस्तान के साथ करीबी रिश्ते दोनों देशों के लिए रणनीतिक दायरा बढ़ाने में मदद करते हैं. बदले में, हिंदुस्तान को समुद्री जागरूकता, रक्षा तकनीक और सप्लाई-चेन की मजबूती के लिए जापान के समर्थन से फ़ायदा होता है.
- दूसरा, यह दौरा आर्थिक-सुरक्षा लक्ष्यों को पूरा करता है. दोनों देश सेमीकंडक्टर, टेलीकॉम, फ़ार्मास्यूटिकल्स, जरूरी खनिजों और साफ ऊर्जा के क्षेत्रों में मजबूत सप्लाई-चेन बनाने पर काम कर रहे हैं, क्योंकि दोनों ही बाहरी सप्लायर्स पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं. यह सिर्फ व्यापारिक सहयोग नहीं है, यह इस सच्चाई का जवाब है कि तकनीक और सामग्री अब भू-नेतृत्वक दबाव बनाने के हथियार बन गए हैं.
- तीसरा, जापान का हिंदुस्तान के साथ जुड़ाव उसके अपने आर्थिक भविष्य के लिए एक सुरक्षा उपाय (हेज) है. हिंदुस्तान बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता, लेबर, बढ़ता बाज़ार और जापानी कंपनियों को ऐसे बाज़ारों से आगे बढ़कर अपने कारोबार को फैलाने का मौका देता है जो पहले से ही भरे हुए या सीमित हैं हिंदुस्तान में लगभग 1,500 जापानी कंपनियों की मौजूदगी और बढ़ता जापानी FDI यह दिखाता है कि यह कूटनीति के साथ-साथ औद्योगिक रणनीति का भी मामला है.
- चौथा, यह शिखर सम्मेलन क्षेत्रीय ढांचे को मज़बूत करता है। हिंदुस्तान-जापान की साझेदारी Quad को मजबूत करती है, इंडो-पैसिफिक में नियमों पर आधारित शासन का समर्थन करती है, और दोनों देशों को पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया और व्यापक हिंद महासागर के मामलों पर तालमेल बिठाने के लिए एक मंच देती है. इस लिहाज से, जापानी प्रधानमंत्री का यह दौरा सिर्फ औपचारिक गठबंधनों के बजाय आपसी सहयोग के जरिए एशिया में संतुलन बनाने के बारे में भी है.
हिंदुस्तान-जापान: चीन का पहलू
चीन फैक्टर को समझने के लिए इसे सीधी प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय संतुलन के रूप में देखना चाहिए. हिंदुस्तान और जापान की हाल की बातचीत का एक बड़ा कारण यही है कि दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और दबाव को लेकर चिंतित हैं.
- जापान के लिए चीन सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती-क्षेत्र है, क्योंकि पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर में उसकी गतिविधियां लगातार चिंता बढ़ाती रही हैं. इसलिए जापान हिंदुस्तान को एक ऐसे साझेदार की तरह देखता है जो एशिया में शक्ति-संतुलन बना सके और समुद्री मार्गों की सुरक्षा में मदद कर सके.
- हिंदुस्तान के लिए भी चीन फैक्टर अहम है, लेकिन उसका स्वर थोड़ा अलग है. हिंदुस्तान सीधे टकराव से बचते हुए रणनीतिक स्वायत्तता रखता है, फिर भी वह चाहता है कि हिंद-प्रशांत में कोई एक देश दबदबा न बना ले. इसी वजह से हिंदुस्तान-जापान सहयोग सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सुरक्षा जरूरत भी बन जाता है.
- इस दौरे में चीन का मुद्दा खुलकर हर बार नाम लेकर नहीं कहा जाता, लेकिन उसकी छाया साफ दिखती है. जापान की ‘Free and Open Indo-Pacific’ सोच, हिंदुस्तान के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग, और सप्लाई चेन को सुरक्षित करने की कोशिशें, इन सबके पीछे चीन की बढ़ती ताकत एक बड़ा कारण है. दूसरे शब्दों में, यह यात्रा सिर्फ दोस्ती बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि चीन-प्रेरित अनिश्चितता के जवाब में साझेदारी मजबूत करने के लिए भी है.
- आलोचनात्मक रूप से देखें तो हिंदुस्तान और जापान का चीन-फैक्टर पर मेल पूरी तरह एक जैसा नहीं है. जापान अमेरिका के साथ औपचारिक गठबंधन में है, जबकि हिंदुस्तान ऐसा नहीं है और वह टकराव से बचते हुए संतुलन बनाना चाहता है. इसलिए दोनों की साझा चिंता तो है, लेकिन रणनीतिक भाषा और सीमा अलग-अलग है.
संक्षेप में, इस हालिया दौरे में चीन फैक्टर तीन स्तरों पर काम करता है: क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री संतुलन, और आर्थिक-सप्लाई चेन सुरक्षा. यही वजह है कि हिंदुस्तान-जापान संबंध आज सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी बन चुके हैं.
आलोचनात्मक टिप्पणी
हालांकि हिंदुस्तान और जापान की इस साझेदारी का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि रिश्तें इतने गहरें होने के बावजूद, इसमें कुछ सीमाएं भी हैं. मसलन;
- व्यापार का संतुलन एक जैसा नहीं है. जापान हिंदुस्तान से जितना आयात करता है, हिंदुस्तान जापान को उससे कम निर्यात करता है.
- साथ ही, रणनीतिक बातों के मुकाबले व्यापारिक संबंध उतनी तेज़ी से नहीं बढ़े हैं.
- योजनाओं को लागू करने में आने वाली कमियां भी मायने रखती हैं.
- हाई-स्पीड रेल और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर जैसे बड़े प्रोजेक्ट नेतृत्वक रूप से तो अहम हैं, लेकिन ये धीमी गति से चलते हैं, महंगे होते हैं और इन्हें पूरा करने में देरी की संभावना बनी रहती है.
इसमें एक रणनीतिक विरोधाभास भी है. दोनों देश खुले और नियमों पर आधारित इंडो-पैसिफिक की बात तो करते हैं, लेकिन दोनों के लिए खतरों को लेकर सोच और घरेलू मजबूरियां अलग-अलग हैं, जिससे फ़ैसले लेने में देरी हो सकती है.
जापान सावधानी बरतने वाला और संस्थागत प्रक्रियाओं पर ज़्यादा ज़ोर देने वाला देश है. वहीं हिंदुस्तान अपनी आज़ादी को ज़्यादा अहमियत देता है और सुरक्षा से जुड़े पक्के समझौतों को औपचारिक रूप देने में कम इच्छुक रहता है. यह साझेदारी वहां सबसे मज़बूत है जहाँ दोनों के हित एक जैसे हैं, लेकिन यह किसी औपचारिक संधि या गठबंधन का विकल्प नहीं है.
हिंदुस्तान-जापान संबंधों की एक खास बात यह है कि इनमें रणनीतिक तालमेल के साथ-साथ सभ्यतागत स्तर पर गहरा भरोसा भी शामिल है. बहुत कम बड़े द्विपक्षीय संबंधों में प्राचीन सांस्कृतिक जुड़ाव, उच्च-स्तरीय नेतृत्वक तालमेल और आधुनिक तकनीकी-आर्थिक सहयोग का ऐसा मेल देखने को मिलता है. यही वजह है कि क्षेत्रीय माहौल अनिश्चित होने पर भी यह साझेदारी असाधारण रूप से मज़बूत बनी रहती है.
विशेषज्ञों की राय
प्रोफेसर डॉ. रोशनी सेनगुप्ता के अनुसार, ‘दुनिया के लिए मुश्किल भरे समय में जापानी प्रधानमंत्री ताकाइची का हिंदुस्तान दौरा Quad के रणनीतिक महत्व को दिखाता है. जापान और हिंदुस्तान दोनों ही इस समूह का हिस्सा हैं, जो मुख्य रूप से NATO और पश्चिम के नेतृत्व वाले अन्य गठबंधनों के मुकाबले एक क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर काम करता है. जापान के लिए, हिंदुस्तान की भागीदारी इस समूह को US-ऑस्ट्रेलिया-जापान के समुद्री कोर (मुख्य हिस्से) से आगे बढ़कर महाद्वीपीय स्तर पर भी मज़बूती देती है.
वहीं हिंदुस्तान के लिए, यह सुरक्षा सहयोग का एक ऐसा ढांचा देता है जिसमें औपचारिक गठबंधन जैसी कोई बाध्यता नहीं होती, जिनसे हिंदुस्तान पारंपरिक रूप से बचता रहा है. जापान, हिंदुस्तान को चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ एक स्वाभाविक संतुलन बनाने वाली शक्ति के रूप में देखता है, एक बड़ी और सक्षम शक्ति, जिसकी बीजिंग के साथ अपनी सीमा संबंधी चुनौतियां हैं. चीन को लेकर यह साझा चिंता ही समुद्री क्षेत्र की निगरानी, रक्षा तकनीक और चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के विकल्प के तौर पर बुनियादी ढांचे (जैसे ‘एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर’ का विचार) में सहयोग का आधार बनती है.’
विंग कमांडर (रिटायर्ड) आकांक्षा पांडेय के अनुसार, ‘हिंदुस्तान और जापान के बीच आर्थिक सहयोग और सप्लाई-चेन की मज़बूती चर्चा का मुख्य विषय बन गए हैं, खासकर सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ और ज़रूरी खनिजों के मामले में, जहां दोनों देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं.
हिंदुस्तानीय मैन्युफैक्चरिंग (जिसमें लंबे समय से चल रहा दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर भी शामिल है) में जापानी निवेश इसी सोच के अनुरूप है. इसलिए, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि जापान ने निजी निवेश के तौर पर 10 ट्रिलियन जापानी येन (JPY) देने का वादा किया है, जिसमें 1,000 बायोगैस प्लांट लगाने की योजना भी शामिल है, और साथ ही AI, सेमीकंडक्टर और ज़रूरी खनिजों के क्षेत्र में सहयोग को और गहरा किया है.’

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