Sonam Wangchuk का आमरण अनशन हिंदुस्तानीय लोकतंत्र के लिए एक अहम घटना रही. इसकी शुरुआत शिक्षा व्यवस्था में लगातार हो रही गड़बड़ियों, खासकर NEET और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों के बीच हुई थी. वांगचुक ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को आंदोलन का मुख्य मुद्दा बनाया और इसे ‘पैसिव रेजिस्टेंस’ (शांतिपूर्ण प्रतिरोध), यानी अहिंसक विरोध का एक रूप बताया.
हालांकि उनके शांतिपूर्ण आंदोलन ने नैतिक दबाव तो बनाया, लेकिन यह उस बड़े जन-आंदोलन में नहीं बदल पाया जिसकी उम्मीद उनके समर्थकों ने की थी.
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सोनम वांगचुक का आंदोलन उस देश में उम्मीद के मुताबिक जन-समर्थन क्यों नहीं जुटा पाया, जहां महात्मा गांधी के सत्याग्रह ने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी थी, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से सत्ता बदली थी, और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान ने राष्ट्रीय नेतृत्व की दिशा बदल दी थी.
इसका जवाब सिर्फ प्रशासन के रवैये में ही नहीं, बल्कि आंदोलन के ढांचे, विपक्ष की नेतृत्व, PM मोदी की रणनीतिक समझ को ना भेद पाना और बदलते लोकतांत्रिक माहौल में भी छिपा है.
आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी: मजबूत संगठन का अभाव
किसी भी बड़े जनांदोलन की सफलता केवल उसकी नैतिक शक्ति पर निर्भर नहीं करती. उसके पीछे एक सुविचारित संगठनात्मक ढांचा, स्पष्ट रणनीति और दीर्घकालिक कार्ययोजना भी आवश्यक होती है.
सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षा सुधार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर आधारित था, लेकिन यह शुरुआत से ही एक सीमित दायरे में सिमट गया. इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि यह छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों को एक साझा मंच पर नहीं ला सका.
आंदोलन का केंद्र धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था से हटकर केवल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर केंद्रित हो गया.
इससे मूल प्रश्न, परीक्षा प्रणाली में सुधार कही पीछे छूट गया और पूरा विमर्श व्यक्तिकेंद्रित यानि सोनम वांगचुक के इर्द-गिर्द दिखाई देने लगा.
इतिहास बताता है कि सफल आंदोलन किसी व्यक्ति के विरोध पर नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की व्यापक मांग पर टिके होते हैं. यही वह बिंदु था, जहां यह आंदोलन अपनी संभावनाओं से पीछे रह गया.
अन्ना आंदोलन से तुलना क्यों जरूरी है?
2011 का अन्ना हजारे आंदोलन केवल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान नहीं था. वह एक सुव्यवस्थित सामाजिक आंदोलन था.
उसमें पूर्व नौकरशाह, न्यायविद, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा, मध्यम वर्ग, उद्योग जगत और मीडिया- सभी की सक्रिय भागीदारी थी.
आंदोलन के पास स्पष्ट मांग थी- जनलोकपाल कानून.
उसके पास रणनीति थी, नेतृत्व था, संवाद था और पूरे देश में स्वयंसेवकों का मजबूत नेटवर्क था।
इसके विपरीत, सोनम वांगचुक के आंदोलन में ऐसी व्यापक सामाजिक भागीदारी दिखाई नहीं दी. न तो बड़े छात्र संगठनों का संगठित समर्थन मिला, न ही विश्वविद्यालयों की निर्णायक भागीदारी दिखी. नागरिक समाज के वे चेहरे भी अनुपस्थित रहे जिन्होंने अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया था.
यही कारण है कि यह आंदोलन नैतिक रूप से प्रभावशाली होने के बावजूद नेतृत्वक और सामाजिक रूप से सीमित रह गया.
विपक्ष की दूरी: नेतृत्वक मजबूरी या रणनीति?
पहली नजर में यह आश्चर्यजनक लगता है कि परीक्षा घोटालों जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विपक्ष पूरी ताकत से आंदोलन के साथ क्यों नहीं खड़ा हुआ.
लेकिन नेतृत्व केवल नैतिकता से नहीं, रणनीति से भी संचालित होती है.
सोनम वांगचुक ने आंदोलन का मुख्य लक्ष्य धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को बनाया. इससे पूरा संघर्ष एक मंत्री तक सीमित होता दिखाई दिया. विपक्ष के लिए यह एक नेतृत्वक दुविधा थी.
यदि वह पूरी तरह इस आंदोलन के साथ खड़ा होता, तो उसका स्वतंत्र नेतृत्वक एजेंडा कमजोर पड़ सकता था. दूसरी ओर, यदि आंदोलन केवल एक मंत्री के खिलाफ सीमित रहता, तो उससे पूरी मोदी प्रशासन को नेतृत्वक रूप से घेरना कठिन हो जाता.
यही कारण है कि विपक्ष का समर्थन प्रतीकात्मक यानि सिंबॉलिक अधिक दिखाई दिया, निर्णायक कम.
जो भी मजबूरी हो, पर राहुल गांधी जैसे नेताओं की सीमित उपस्थिति भी इसी रणनीतिक संकोच का संकेत मानी गई. विपक्ष ने परीक्षा व्यवस्था के मुद्दे को तो उठाया, लेकिन आंदोलन को अपने नेतृत्वक अभियान का केंद्रीय आधार नहीं बनाया.
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प्रशासन की रणनीति: संवेदनशीलता और नेतृत्वक यथार्थ का संतुलन
प्रशासन का रवैया भी उल्लेखनीय रहा.
उसने आंदोलन को पूरी तरह कुचलने की कोशिश नहीं की, लेकिन उसकी प्रमुख मांगों पर औपचारिक नेतृत्वक वार्ता भी नहीं की.
दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद पुलिस ने स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए हस्तक्षेप किया. प्रशासन ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी प्राथमिकता प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है.
साथ ही, प्रशासन इस बात से भी भलीभांति परिचित थी कि यदि किसी आंदोलन के दबाव में एक कार्यरत केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता, तो भविष्य में यह एक नेतृत्वक मिसाल बन सकती थी.
इसलिए प्रशासन ने नैतिक दबाव को स्वीकार करने और नेतृत्वक मांग को अस्वीकार करने की दोहरी रणनीति अपनाई.
यह आधुनिक हिंदुस्तानीय नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता भी है, जहां प्रशासनें विरोध प्रदर्शनों को पूरी तरह दबाने के बजाय उन्हें सीमित नेतृत्वक प्रभाव तक नियंत्रित रखने की कोशिश करती हैं.
क्या आंदोलन ने प्रधानमंत्री मोदी की नेतृत्वक कौशल को कम आंका?
सोनम वांगचुक आंदोलन का एक बड़ा नेतृत्वक आकलन शायद यह था कि लंबे अनशन और नैतिक दबाव से प्रशासन झुक जाएगी.
लेकिन पिछले एक दशक की हिंदुस्तानीय नेतृत्व कुछ अलग संकेत देती है.
नरेंद्र मोदी प्रशासन ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ लंबे आंदोलन देखे. कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक किसान आंदोलन का सामना किया. विभिन्न राज्यों में आरक्षण, रोजगार और सामाजिक मुद्दों पर भी बड़े प्रदर्शन हुए.
इन आंदोलनों के अनुभवों ने यह स्पष्ट किया है कि वर्तमान प्रशासन केवल सड़क पर बने दबाव के आधार पर त्वरित नेतृत्वक निर्णय लेने से बचती है. वह तब तक प्रतीक्षा करती है, जब तक उसे व्यापक नेतृत्वक या चुनावी नुकसान की आशंका न दिखाई दे.
कृषि कानूनों की वापसी भी केवल आंदोलन के कारण नहीं, बल्कि व्यापक नेतृत्वक परिस्थितियों और चुनावी समीकरणों के संदर्भ में समझी जाती है.
ऐसे में केवल नैतिक दबाव, बिना व्यापक जनसमर्थन और नेतृत्वक सहमति के, प्रशासन को निर्णायक कदम उठाने के लिए पर्याप्त नहीं होता.
सबसे बड़ा सबक
सोनम वांगचुक का आंदोलन असफल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर राष्ट्रीय बहस को जीवित रखा. उसने यह प्रश्न फिर से उठाया कि करोड़ों छात्रों का भविष्य केवल प्रशासनिक लापरवाही के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.
लेकिन इस आंदोलन ने यह भी सिखाया कि नैतिक शक्ति अपने आप नेतृत्वक सफलता में नहीं बदलती.
हिंदुस्तान में प्रभावी जनांदोलन के लिए चार तत्वों का साथ होना आवश्यक है…
- स्पष्ट मुद्दा
- मजबूत संगठन
- व्यापक सामाजिक गठबंधन, और
- व्यावहारिक नेतृत्वक संवाद
इनमें से किसी एक की भी कमी आंदोलन की गति को सीमित कर सकती है.
निष्कर्ष
सोनम वांगचुक बनाम धर्मेंद्र प्रधान का विवाद केवल एक मंत्री के इस्तीफे की मांग भर नहीं है. यह हिंदुस्तान की बदलती लोकतांत्रिक नेतृत्व का अध्ययन भी है.
इसने दिखाया कि आज के दौर में केवल नैतिक प्रतीकवाद पर्याप्त नहीं है. प्रशासनें पहले की तुलना में अधिक नेतृत्वक रूप से धैर्यवान हैं, विपक्ष अधिक रणनीतिक है और समाज पहले की अपेक्षा अधिक विभाजित तथा डिजिटल रूप से बिखरा हुआ है.
इसलिए भविष्य के किसी भी छात्र आंदोलन को केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि संस्थागत समर्थन, नागरिक समाज की भागीदारी, नेतृत्वक संवाद और दीर्घकालिक संगठनात्मक क्षमता भी विकसित करनी होगी.
आखिरकार, लोकतंत्र में इतिहास उन्हीं आंदोलनों को याद रखता है जो केवल विरोध नहीं करते, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर परिवर्तन का रास्ता भी तैयार करते हैं.
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