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क्या BRICS को ‘कमजोर’ रखना ही भारत की सबसे बड़ी कूटनीति? जानिए चीन के दबदबे को रोकने का इनसाइड गेम

BRICS Summit 2026 : हिंदुस्तान में BRICS Summit के बीच इस समूह की भूमिका और भविष्य को लेकर बहस तेज है. एक नए विश्लेषण में दावा किया गया है कि हिंदुस्तान का असली रणनीतिक हित BRICS को मजबूत और प्रभावशाली बनाने में नहीं, बल्कि उसे इतना विभाजित रखने में हो सकता है कि वह चीन के ग्लोबल पावर प्रोजेक्ट का हथियार न बन पाए.

BRICS की सबसे बड़ी ताकत ही हिंदुस्तान के लिए बन सकती है चुनौती

BRICS अब पहले जैसा छोटा समूह नहीं रहा. द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स में विस्तार के बाद अब 11 देश शामिल हैं और इसका आर्थिक व नेतृत्वक प्रभाव काफी बढ़ गया है. लेकिन इसी विस्तार के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आया है, क्या BRICS वास्तव में सभी सदस्यों के साझा हितों के लिए काम करेगा या चीन धीरे-धीरे इस मंच पर अपना प्रभाव बढ़ाएगा?

विश्लेषण के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय संगठनों में ताकत का संतुलन बेहद मायने रखता है. किसी भी समूह के फैसले सिर्फ सदस्य देशों की संख्या से तय नहीं होते, बल्कि आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक ताकत भी उनकी भूमिका तय करती है. इस लिहाज से BRICS में चीन का प्रभाव दूसरे कई सदस्यों से काफी ज्यादा है.

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चीन के सामने हिंदुस्तान की स्थिति कमजोर क्यों?

चीन और हिंदुस्तान दोनों BRICS के अहम सदस्य हैं, लेकिन दोनों की आर्थिक और सैन्य क्षमता में बड़ा अंतर है. ऐसे में अगर BRICS एक बेहद प्रभावी नेतृत्वक या रणनीतिक समूह बनता है, तो आशंका यह है कि उसका इस्तेमाल चीन अपने हितों के लिए कर सकता है.

हिंदुस्तान के लिए समस्या इसलिए भी बड़ी है क्योंकि इंडो-पेसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव को बैलेंस करने के लिए उसे अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे स्ट्रैटजिक पार्टनर्स की जरूरत है. ऐसे में ऐसा कोई भी कदम जो इन देशों की ताकत कम करे और अप्रत्यक्ष रूप से चीन को फायदा पहुंचाए, हिंदुस्तान के हित में नहीं होगा.

डॉलर का मामला भी समझिए

BRICS में लंबे समय से de-dollarisation यानी अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका कम करने की चर्चा होती रही है. विश्लेषण का तर्क है कि अमेरिका के डॉलर सिस्टम से हिंदुस्तान की अपनी शिकायतें हो सकती हैं, लेकिन डॉलर को कमजोर करना अपने आप में हिंदुस्तान के लिए फायदेमंद नहीं है.

सवाल यह है कि अगर अमेरिकी डॉलर का प्रभाव घटता है, तो उसकी जगह किसका प्रभाव बढ़ेगा? अगर इसका फायदा मुख्य रूप से चीन को मिलता है, तो हिंदुस्तान के लिए स्थिति और मुश्किल हो सकती है.

यानी अमेरिका से नाराजगी और चीन का विरोध, दोनों को एक ही रणनीति मानना हिंदुस्तान के लिए खतरनाक हो सकता है.

BRICS ‘ineffective’ रखने से हिंदुस्तान को फायदा?

यही इस विश्लेषण का सबसे controversial और दिलचस्प हिस्सा है. इसमें तर्क दिया गया है कि हिंदुस्तान का लक्ष्य BRICS को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे इतना internally divided और ineffective रखना होना चाहिए कि चीन इसका इस्तेमाल अपने बड़े strategic ambitions के लिए न कर सके.

BRICS के विस्तार को इस नजरिए से भी देखा जा सकता है. जितने ज्यादा और अलग-अलग हितों वाले देश किसी संगठन में शामिल होंगे, उनके बीच सहमति बनाना उतना मुश्किल होगा.

मध्य पूर्व के देशों के बीच कई गंभीर मतभेद हैं. एशिया और दूसरे क्षेत्रों के देशों के अपने-अपने strategic interests हैं. ऐसे में हिंदुस्तान इन मतभेदों का इस्तेमाल BRICS के भीतर किसी एक देश के प्रभुत्व को रोकने के लिए कर सकता है.

लेकिन इस रणनीति में हिंदुस्तान के लिए भी बड़ा रिस्क

इसका दूसरा पहलू भी है. अगर हिंदुस्तान लगातार BRICS की initiatives को रोकता है या संगठन को कमजोर करने की कोशिश करता है, तो वह खुद इस समूह में अलग-थलग पड़ सकता है. इसके अलावा चीन के साथ टकराव बढ़ने पर Beijing आर्थिक और सैन्य दबाव का इस्तेमाल भी कर सकता है.

इसलिए हिंदुस्तान के सामने असली challenge BRICS छोड़ना या उसे मजबूत बनाना नहीं, बल्कि उसके भीतर रहते हुए अपने strategic interests को सुरक्षित रखना है.

BRICS का विस्तार हिंदुस्तान के लिए मौका भी है और चुनौती भी. असली सवाल अब यह नहीं है कि BRICS कितना ताकतवर बनेगा, बल्कि यह है कि क्या हिंदुस्तान चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इस मंच को अपने हितों के खिलाफ जाने से रोक पाएगा.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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