Arunachal Pradesh Hydropower Project : अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को लेकर विरोध तेज हो गया है. एक तरफ प्रशासन इसे चीन की बांध परियोजनाओं के मुकाबले हिंदुस्तान की रणनीतिक जरूरत बता रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय आदिवासी समुदाय को अपनी जमीन, गांव और संस्कृति खोने का डर सता रहा है. हालात ऐसे हैं कि परियोजना के सर्वे को लेकर सुरक्षा बलों की तैनाती और प्रदर्शनकारियों की हिरासत ने विवाद को और बढ़ा दिया है.
क्या है पूरा मामला?
अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की क्षमता 11,200 मेगावाट है. इसके लिए प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने के उद्देश्य से सर्वे और ड्रिलिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है.
अक्टूबर में परियोजना के विरोध में प्रदर्शन कर रहे चार लोगों को हिरासत में लिए जाने के बाद गेकू इलाके में फिर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. प्रदर्शनकारी उनकी रिहाई की मांग कर रहे हैं. स्थानीय संगठन प्रशासन से परियोजना पर बातचीत की प्रक्रिया रोकने और लोगों की सहमति को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं.
आदिवासियों को किस बात का डर?
सियांग घाटी में रहने वाले आदि आदिवासी समुदाय को आशंका है कि बड़े बांध से उनकी जमीन, खेती और रोजी-रोटी पर गंभीर असर पड़ सकता है. स्थानीय संगठन SIFF का दावा है कि परियोजना का जलाशय 27 गांवों को डुबो सकता है, जबकि कई अन्य गांव भी प्रभावित हो सकते हैं. संगठन के मुताबिक, 1 से 1.5 लाख आदिवासी लोगों के विस्थापित होने का खतरा है. ये आंकड़े संगठन के दावे हैं.
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समुदाय के लिए जमीन केवल खेती और रहने की जगह नहीं है. आदि समाज की परंपराएं, पहचान और सांस्कृतिक जीवन भी सियांग नदी और आसपास की भूमि से जुड़े हैं. इसलिए विरोध करने वाले लोग इसे सिर्फ बिजली उत्पादन का मुद्दा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों से जुड़ा सवाल मानते हैं.
चीन के बांध से क्यों बढ़ी चिंता?
सियांग नदी तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से जानी जाती है. चीन इस नदी पर अपनी जलविद्युत क्षमता बढ़ा रहा है. दिसंबर 2024 में चीन ने निचले यारलुंग त्सांगपो क्षेत्र में 60,000 मेगावाट की बड़ी जलविद्युत परियोजना को मंजूरी दी थी.
हिंदुस्तान को आशंका है कि चीन की परियोजनाओं से भविष्य में नदी के पानी के बहाव पर असर पड़ सकता है. अचानक पानी छोड़े जाने या जलप्रवाह में बदलाव की स्थिति में निचले इलाकों पर खतरा बढ़ने की चिंता भी जताई जाती रही है. इसी रणनीतिक चिंता के बीच हिंदुस्तान सियांग नदी पर बड़े जलाशय की जरूरत पर जोर दे रहा है.
हालांकि, विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि चीन की परियोजना के जवाब में अपने ही लोगों पर बड़े बांध का बोझ डालना सही रास्ता नहीं है. उनके मुताबिक, हिंदुस्तान को चीन से परियोजना संबंधी जानकारी मांगने और संभावित प्रभावों का संयुक्त आकलन कराने पर भी जोर देना चाहिए.
परियोजना पर नेतृत्व भी तेज
सियांग परियोजना का विरोध नया नहीं है. वर्ष 2010 में भी बांध विरोधी कार्यकर्ताओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी. समय के साथ परियोजना की योजना में बदलाव हुए और 2017 में नीति आयोग ने पहले प्रस्तावित दो चरणों को मिलाकर एक बड़ी परियोजना की दिशा में काम करने का सुझाव दिया.
अब मुख्यमंत्री पेमा खांडू की प्रशासन परियोजना को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है. वहीं, विपक्ष और स्थानीय संगठनों ने पारदर्शिता, पर्यावरणीय जोखिमों की जांच और प्रभावित समुदायों की सहमति की मांग उठाई है.
दिलचस्प बात यह है कि पहले बांध का विरोध करने वाले कुछ नेता अब इसे चीन की चुनौती के सामने जरूरी बता रहे हैं. इससे परियोजना को लेकर नेतृत्वक बहस भी और गहरी हो गई है.
विकास या विस्थापन का सवाल
सियांग परियोजना के समर्थकों के लिए यह बिजली उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा कदम है. लेकिन विरोध कर रहे आदिवासियों के लिए सवाल है कि अगर परियोजना आगे बढ़ती है, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा और उनके भविष्य का फैसला कौन करेगा.
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हिंदुस्तानीय अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सियांग परियोजना को लेकर विवाद का केंद्र यही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास की जरूरतों के बीच स्थानीय समुदायों की जमीन, आजीविका, संस्कृति और सहमति को किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा. इस परियोजना का भविष्य अब केवल तकनीकी सर्वे पर नहीं, बल्कि प्रशासन और प्रभावित लोगों के बीच भरोसेमंद बातचीत पर भी निर्भर करता है.
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