India during cold war : 15 अगस्त 1947 – दिल्ली में आधी रात का वक्त था. सदियों की गुलामी के बाद हिंदुस्तान स्वतंत्र होने जा रहा था. लेकिन उस रात दुनिया सिर्फ हिंदुस्तान की आजादी नहीं देख रही थी. अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व भी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जिसने अगले चार दशकों का इतिहास लिखना था.
द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म हुए अभी दो साल ही हुए थे. नाजी जर्मनी हार चुका था, लेकिन युद्ध के बाद के सहयोगी अब एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन रहे थे. अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में सामने आ चुके थे. यूरोप में तनाव बढ़ रहा था, परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू हो चुकी थी और दुनिया धीरे-धीरे दो शक्ति-गुटों में बंट रही थी. इसी वह वक्त था जब हिंदुस्तान ने आजादी हासिल की.
सवाल सिर्फ यह नहीं था कि हिंदुस्तान अपने देश को कैसे संभालेगा. सवाल यह भी था कि नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हिंदुस्तान किस तरफ खड़ा होगा?
उस समय इसका जवाब आसान नहीं था. एक ओर अमेरिका था, जिसके पास विशाल आर्थिक और सैन्य ताकत थी. दूसरी ओर सोवियत संघ था, जो समाजवादी व्यवस्था के साथ दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था. हिंदुस्तान ने दोनों में से किसी एक को नहीं चुना. यही फैसला आगे चलकर हिंदुस्तानीय विदेश नीति की सबसे चर्चित पहचान बना.
आजादी के बाद पहला बड़ा फैसला
जवाहरलाल नेहरू के सामने विदेश नीति की चुनौती असाधारण थी. हिंदुस्तान अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से निकला था. देश का विभाजन हो चुका था, लाखों लोग विस्थापित हुए थे और वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर थी. ऐसे में किसी सैन्य गुट में शामिल होकर महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा बनना हिंदुस्तान के लिए कितना फायदेमंद होता, यह बड़ा सवाल था.
नेहरू का जवाब था – हिंदुस्तान को अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए. 14-15 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में नेहरू ने कहा था:
“At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom.”
यह सिर्फ एक यादगार पंक्ति नहीं थी. उसी भाषण में नेहरू ने आजादी को हिंदुस्तान की सीमाओं से आगे मानवता की सेवा से जोड़ा था. स्वतंत्र हिंदुस्तान को वह ऐसी भूमिका में देख रहे थे, जहां उसकी आजादी का मतलब दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ जिम्मेदारी से जुड़ना था. यही सोच कुछ ही वर्षों में हिंदुस्तान की विदेश नीति में साफ दिखाई देने लगी.
दुनिया दो हिस्सों में बंट रही थी
Cold War (शीत युद्ध) को सिर्फ अमेरिका बनाम सोवियत संघ कहना अधूरा होगा. असल में यह दो अलग नेतृत्वक और आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच वैश्विक प्रतिस्पर्धा थी.
अमेरिका पश्चिमी देशों के साथ अपना प्रभाव बढ़ा रहा था. सोवियत संघ पूर्वी यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा था. NATO जैसे सैन्य गठबंधन बने. बाद में वारसा पैक्ट (Warsaw Pact) भी अस्तित्व में आया.
एशिया और अफ्रीका के लिए यह परिस्थिति और कठिन थी. इन महाद्वीपों के कई देश औपनिवेशिक शासन से निकल रहे थे. उन्हें विकास के लिए आर्थिक मदद चाहिए थी और सुरक्षा के लिए सैन्य सहयोग भी. लेकिन इसके साथ एक खतरा भी था – कहीं नई आजादी किसी नए शक्ति-गुट की निर्भरता में न बदल जाए. हिंदुस्तान इसी समस्या का अपना समाधान तलाश रहा था.
गुट निरपेक्ष का विचार
हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) नीति का अर्थ यह नहीं था कि वह अमेरिका और सोवियत संघ से संबंध नहीं रखेगा. बल्कि उल्टा हिंदुस्तान दोनों से संबंध रखना चाहता था, लेकिन किसी सैन्य गुट में शामिल होकर अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता नहीं खोना चाहता था.
विदेश मंत्रालय के अनुसार, Non-Alignment की हिंदुस्तानीय सोच का मूल उद्देश्य स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता को बनाए रखना था.
इस नीति की जड़ें हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन में भी देखी जा सकती हैं. औपनिवेशिक शासन का अनुभव कर चुके हिंदुस्तान के लिए विदेश नीति की स्वतंत्रता सिर्फ रणनीतिक मुद्दा नहीं थी; यह नेतृत्वक स्वतंत्रता का विस्तार भी थी. यही कारण था कि हिंदुस्तान ने Cold War को केवल दो महाशक्तियों के बीच चुनाव के रूप में देखने से इनकार कर दिया.
बांडुंग से बेलग्रेड तक
हिंदुस्तान अकेला नहीं था, एशिया और अफ्रीका के दूसरे देश जिन्हें 1947 के आसपास ही आजादी मिली थी, वे भी चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व में उनकी अपनी आवाज हो. अप्रैल 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग में 29 एशियाई और अफ्रीकी देशों का सम्मेलन हुआ. यह सम्मेलन Cold War के दोनों ध्रुवों से अलग एक तीसरी नेतृत्वक आवाज के उभरने का महत्वपूर्ण पड़ाव बना.
बांडुंग (Bandung) में उपनिवेशवाद के विरोध, नस्लीय भेदभाव, आर्थिक विकास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया. इसके बाद सितंबर 1961 में युगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला Non-Aligned सम्मेलन हुआ. हिंदुस्तान, युगोस्लाविया, इजिप्ट, इंडोनेशिया और घाना सहित 25 देशों ने इसमें हिस्सा लिया.
यहीं गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के रूप में सामने आया. इसलिए 1947 और 1961 के बीच का अंतर समझना जरूरी है. हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष नीति पहले से विकसित हो रही थी, जबकि NAM 1961 में औपचारिक रूप से स्थापित हुआ.
लेकिन दुनिया इतनी सरल नहीं थी
Non-Alignment के बावजूद हिंदुस्तान और सोवियत संघ के संबंध लगातार मजबूत होते गए. इसके पीछे कई कारण थे. हिंदुस्तान को औद्योगिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर तकनीकी और आर्थिक सहयोग चाहिए था. रक्षा क्षेत्र में भी उसे हथियार और तकनीक की जरूरत थी. दूसरी ओर पाकिस्तान का अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध मजबूत हो रहा था. फिर 1962 में चीन के साथ हिंदुस्तान का युद्ध हुआ. इन घटनाओं ने हिंदुस्तान की सुरक्षा चिंताओं को बदल दिया. सोवियत संघ हिंदुस्तान के लिए तेजी से महत्वपूर्ण साझेदार बनने लगा.
लेकिन हिंदुस्तान को सोवियत कैंप का हिस्सा कहना फिर भी सही नहीं होगा. हिंदुस्तान ने अमेरिका से भी संबंध बनाए रखे. अमेरिकी सहायता हिंदुस्तान की खाद्य सुरक्षा और विकास के कई दौर में महत्वपूर्ण रही. वहीं सोवियत संघ के साथ भारी उद्योग, रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा.
यानी हिंदुस्तान की नीति साफ थी- जहां से देश को फायदा मिले, वहां सहयोग करो, लेकिन विदेश नीति से जुड़े बड़े फैसलों पर नियंत्रण अपने हाथ में रखो.
1971 ने बदल दिया पूरा समीकरण
इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ 1971 में आया. पूर्वी पाकिस्तान में नेतृत्वक संकट और सैन्य कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में शरणार्थी हिंदुस्तान पहुंचे. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता गया. इसी दौरान हिंदुस्तान ने सोवियत संघ के साथ अपने संबंधों को एक नए स्तर पर पहुंचाया.
9 अगस्त 1971 को दोनों देशों ने ट्रिटी ऑफ पीस, फ्रेंडशिप एंड कॉपरेशन पर हस्ताक्षर किए. यह 20 साल की संधि थी. संधि में दोनों देशों ने एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखने और गंभीर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में परामर्श करने की बात कही. साथ ही इसमें हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष नीति का सम्मान करने का उल्लेख भी था.
1971: जब कोल्ड वॉर दक्षिण एशिया तक पहुंचा
1971 में हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ तो दुनिया की बड़ी ताकतें भी इसमें सक्रिय हो गईं. अमेरिका ने पाकिस्तान को समर्थन का संकेत देने और हिंदुस्तान पर दबाव बनाने के लिए अपनी नौसेना का बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा. वहीं, सोवियत संघ कूटनीतिक तौर पर हिंदुस्तान के साथ खड़ा था. यानी पहली बार कोल्ड वॉर की नेतृत्व दक्षिण एशिया के युद्ध में साफ दिखाई दे रही थी.
हिंदुस्तान के सामने बड़ी चुनौती
हिंदुस्तान के लिए यह बेहद संवेदनशील स्थिति थी. पाकिस्तान को अमेरिका और चीन का समर्थन मिल रहा था, जबकि हिंदुस्तान के साथ सोवियत संघ खड़ा था. इसके बावजूद हिंदुस्तान ने अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक सैन्य कार्रवाई जारी रखी. 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में सामने आया. यह हिंदुस्तान की सैन्य जीत के साथ-साथ एक बड़ी कूटनीतिक सफलता भी थी.
क्या हिंदुस्तान सोवियत खेमे में चला गया था?
1971 के बाद हिंदुस्तान और सोवियत संघ के रिश्ते काफी मजबूत हुए. रक्षा सहयोग बढ़ा और दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी गहरी हुई. लेकिन हिंदुस्तान औपचारिक रूप से सोवियत खेमे का हिस्सा नहीं बना. 1971 की संधि में भी हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष नीति के सम्मान की बात कही गई थी. यानी हिंदुस्तान ने जरूरत के समय सोवियत संघ का साथ लिया, लेकिन अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता बरकरार रखी.
1991 के बाद बदली दुनिया, नीति की सोच वही रही
1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद दुनिया का शक्ति-संतुलन बदल गया. हिंदुस्तान ने आर्थिक उदारीकरण शुरू किया और अमेरिका व पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते बेहतर किए, लेकिन रूस के साथ पुराने संबंध भी बनाए रखे. आज हिंदुस्तान अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी करता है, क्वाड का हिस्सा है और रूस से भी रक्षा व ऊर्जा संबंध बनाए हुए है. यानी दुनिया बदलती रही, लेकिन हिंदुस्तान की मूल सोच वही रही. किसी एक खेमे में बंधने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसला खुद लेना. यही सोच आज की बहु-गुटीय नीति और रणनीतिक स्वायत्तता में दिखाई देती है.
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