Parenting Tips: मेरी एक दोस्त हमेशा इस बात को लेकर परेशान रहती है कि उसका बेटा खाने में बहुत नाटक करता है. कुछ ही कौर खाने के बाद उसका बेटा कह देता है कि अब और नहीं खाना, मेरा पेट भर गया है. यह सुनते ही उसकी चिंता शुरू हो जाती है कि बच्चा इतना कम खाकर कैसे रहेगा. इसके बाद वह उसे मनाने लगती है कि बस एक कौर और खा लो या फिर बस इतना सा ही तो बचा है. कई बार शिशु के साफ मना करने के बाद भी वह उसे थोड़ा और खिलाने की कोशिश करती है. ऐसी परेशानी केवल मेरी दोस्त की नहीं बल्कि बहुत से माता-पिता की है. शिशु के कम खाने पर उन्हें यह डर सताने लगता है कि कहीं उसका पेट खाली तो नहीं रह गया. लेकिन हर बार थाली में खाना बचने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि शिशु ने कम खाया है. कई बार बच्चा इसलिए खाना छोड़ देता है क्योंकि उसका पेट पूरी तरह भर चुका होता है.
ऐसे में माता-पिता के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि बच्चा कब सच में भूखा है और कब उसका पेट भर चुका है. आइए जानते हैं शिशु की भूख और पेट भरने के इन संकेतों को आसानी से कैसे समझें और खाना खिलाते समय किन बातों का ध्यान रखें.
हर दिन शिशु की भूख एक जैसी नहीं होती
बच्चों की भूख हर दिन एक जैसी नहीं रहती. जिस दिन बच्चा ज्यादा स्पोर्ट्सा हो, ज्यादा दौड़ा-भागा हो या काफी देर से कुछ नहीं खाया हो, उस दिन उसे ज्यादा भूख लग सकती है, वहीं, किसी दूसरे दिन वह कम खाना खा सकता है, उसकी नींद, तबीयत, दिनभर की एक्टिविटीज और बीच में खाई गई चीजों का भी उसकी भूख पर असर पड़ सकता है. इसलिए अगर बच्चा एक दिन दो रोटी खाता है और अगले दिन एक रोटी खाने के बाद ही कहता है कि उसका पेट भर गया, तो तुरंत यह मान लेना सही नहीं है कि वह खाना नहीं खा रहा. माता-पिता को सिर्फ एक वक्त की प्लेट देखने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि बच्चा पूरे दिन में क्या और कितना खा रहा है.
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे शिशु के सामने न्यूट्रिशियस खाना और उसकी उम्र के हिसाब से सही मात्रा में रखें. बच्चा उसमें से कितना खाना चाहता है, यह उसकी भूख पर निर्भर हो सकता है.
कैसे समझें कि शिशु का पेट भर गया है?
छोटे शिशु हमेशा यह बोलकर नहीं बता पाते कि उनका पेट भर गया है. वे कई बार अपने व्यवहार से इसका संकेत देते हैं. जैसे खाना धीरे-धीरे खाना, मुंह बंद कर लेना, खाना दूर कर देना, सिर दूसरी तरफ घुमा लेना या खाने में दिलचस्पी कम कर देना. ये संकेत हो सकते हैं कि अब शिशु को और खाने की जरूरत नहीं है. वहीं, अगर बच्चा खाने की तरफ खुद बढ़ रहा है, खाना देखकर एक्साइटेड हो रहा है या और खाना मांग रहा है, तो यह उसकी भूख के संकेत हो सकते हैं.
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स भी माता-पिता को बच्चों के भूख और पेट भरने के संकेत पहचानने की सलाह देती है. इसी तरीके को रिस्पॉन्सिव फीडिंग कहा जाता है. इसका आसान मतलब है कि शिशु की भूख और पेट भरने के संकेतों को समझकर उसी के हिसाब से उसे खाना दिया जाए.
ये भी पढ़ें: हर कार्टून आपके शिशु के लिए अच्छा नहीं, फोन या टीवी पर वीडियो दिखाते समय इन बातों का रखें ख्याल
“प्लेट खत्म करो” कहना क्यों सही तरीका नहीं?
माता-पिता शिशु को खाना खत्म करने के लिए इसलिए कहते हैं क्योंकि वे उसकी सेहत को लेकर परेशान रहते हैं. उन्हें लगता है कि अगर बच्चा खाना छोड़ देगा तो उसे जरूरी न्यूट्रिशन नहीं मिलेगा. लेकिन शिशु को उसकी भूख से ज्यादा खाना खिलाने के लिए मजबूर करना रिस्पॉन्सिव फीडिंग का हिस्सा नहीं है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन बच्चों को उनकी भूख और पेट भरने के संकेतों के हिसाब से खाना खिलाने की सलाह देता है. उसके अनुसार, शिशु को धीरे और पेशेंस से खाना खिलाना चाहिए. उसे खाने के लिए मोटिवेट किया जा सकता है, लेकिन जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए. अगर बच्चा किसी खाने को मना करता है तो अलग स्वाद, बनावट या खाने के तरीके आजमाए जा सकते हैं.
शिशु को खाना खिलाते समय उसके संकेतों को समझना, प्यार से उसे मोटिवेट करना और खाने के लिए दबाव न बनाना इस तरीके का अहम हिस्सा है।इसका मतलब यह नहीं है कि शिशु को खाने के लिए बिल्कुल नहीं कहना चाहिए. माता-पिता उसे प्यार से खाना खाने के लिए मोटिवेट कर सकते हैं. फर्क बस इतना है कि मोटिवेट करना और जबरदस्ती करना एक जैसी बात नहीं है.
शुरुआत में प्लेट में कम खाना रखें
शिशु की प्लेट शुरुआत में बहुत ज्यादा भरने की जरूरत नहीं है. थोड़ी मात्रा में खाना दें. अगर बच्चा और खाना चाहता है तो उसे दोबारा दे सकते हैं. इससे बच्चा अपनी भूख के हिसाब से खाना सीख सकता है और खाना भी कम बचेगा. अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स भी बच्चों के लिए छोटी मात्रा से शुरुआत करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें और खाना देने की सलाह देती है. शिशु को जितना खाना है उतना खाने देना बेहतर है, बजाय इसके कि शुरुआत में ही उसकी प्लेट बहुत ज्यादा भर दी जाए. इसका एक फायदा यह भी है कि शिशु के सामने बड़ी प्लेट देखकर माता-पिता को बार-बार यह कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि “इतना खाना तो खत्म करो.”
खाने के समय बार-बार टोकने से बचें
कई घरों में शिशु के खाने का समय आते ही माता-पिता की बातें शुरू हो जाती हैं. उदहारण के लिए, “सीधे बैठो”, “जल्दी खाओ”, “सब्जी भी खाओ”, “रोटी खत्म करो”, “एक और निवाला लो.” लगातार ऐसी बातें सुनने से खाना शिशु के लिए मजेदार समय कम और दबाव वाला समय ज्यादा बन सकता है. कोशिश करें कि खाने के समय घर का माहौल शांत रहे. शिशु को आराम से खाना खाने दें और उसकी प्लेट पर बार-बार नजर रखने के बजाय उसके संकेतों पर ध्यान दें. अगर बच्चा खाना खाते-खाते इधर-उधर देखने लगता है या उसका ध्यान जल्दी भटकता है, तो खाने के समय मोबाइल या टीवी जैसी चीजों से दूरी रखना भी मददगार हो सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की रिस्पॉन्सिव फीडिंग से जुड़ी सलाह में भी खाने के समय ध्यान भटकाने वाली चीजों को कम करने की बात कही गई है.
ये भी पढ़ें: स्कूल से आते ही शिशु से ये 5 सवाल पूछना पड़ सकता है भारी, कहीं आप भी तो नहीं करते ये गलती? ऐसे करें बातचीत की शुरुआत
बच्चा कोई चीज नहीं खाता तो तुरंत हार न मानें
अगर बच्चा किसी सब्जी या किसी दूसरी न्यूट्रिशियस चीज को देखकर एक बार मना कर देता है, तो उसे डांटने या जबरदस्ती खिलाने की जरूरत नहीं है. बच्चों को कई बार नए स्वाद और खाने की अलग बनावट पसंद करने में समय लगता है. ऐसे में उसी चीज को किसी दूसरे तरीके से बनाकर कुछ समय बाद फिर से दिया जा सकता है. मान लीजिए बच्चा पालक की सब्जी नहीं खाता तो उसे किसी दूसरी पसंदीदा डिश में मिलाकर दिया जा सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन भी सलाह देता है कि अगर बच्चा कई चीजें खाने से मना करता है तो माता-पिता अलग-अलग स्वाद, बनावट और खाने के तरीके आजमा सकते हैं. यहां कोशिश यह होनी चाहिए कि शिशु को जबरदस्ती खिलाने के बजाय उसे धीरे-धीरे अलग-अलग न्यूट्रिशियस चीजों से परिचित कराया जाए.
कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?
हर बार कम खाना चिंता की बात नहीं होती. लेकिन अगर बच्चा लगातार बहुत कम खाना खा रहा है, उसका वजन या लंबाई उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही है, खाना खाते समय बार-बार उल्टी होती है, निगलने में परेशानी होती है या खाने को लेकर बहुत ज्यादा परेशानी दिखाई देती है, तो इसे सिर्फ शिशु की पसंद या नखरे समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसी स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ से बात करना बेहतर रहेगा. डॉक्टर शिशु की उम्र, वजन, लंबाई, डेवलपमेंट और पूरे खाने के तरीके को देखकर सही सलाह दे सकते हैं.
शिशु की प्लेट नहीं, उसकी भूख समझना जरूरी है
आखिर में माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि शिशु की प्लेट खाली करवाना ही उसके अच्छे खाने की निशानी नहीं है. आपका काम है कि शिशु के सामने न्यूट्रिशियस और बैलेंस्ड खाना रखें, उसे आराम से खाने का मौका दें और उसकी भूख के संकेतों को समझने की कोशिश करें. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन भी रिस्पॉन्सिव फीडिंग में शिशु की भूख और पेट भरने के संकेतों को समझने, पेशेंस से खिलाने और जबरदस्ती से बचने की सलाह देता है. हर दिन बच्चा कितना खाएगा, यह थोड़ा अलग हो सकता है. इसलिए अगली बार जब बच्चा आधी प्लेट छोड़कर कहे कि उसका पेट भर गया है, तो तुरंत “एक निवाला और” कहने से पहले एक बार उसके संकेतों को समझने की कोशिश जरूर करें. हो सकता है कि उस समय उसे सच में और खाने की जरूरत न हो.
ये भी पढ़ें: बच्चा अपना कोई भी काम खुद नहीं करता? उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए पैरेंट्स आज से ही करें ये काम
The post शिशु को खाना खत्म करने के लिए मजबूर करते हैं? ऐसे समझें उसकी भूख और पेट भरने के संकेत appeared first on Naya Vichar.

