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हर साल क्यों डूबता है बिहार? 50 वर्षों की बाढ़ की पूरी कहानी, सैकड़ों करोड़ खर्च के बाद भी नहीं थमा तबाही का सिलसिला

History Of Bihar Flood: बिहार में बाढ़ कोई नई आफत नहीं है. करीब 50 वर्षों से हर साल मानसून आते ही उत्तर बिहार के लाखों लोगों की चिंता बढ़ जाती है. नदियों का जलस्तर बढ़ता है, तटबंधों पर दबाव बनता है और देखते ही देखते गांव, खेत, सड़कें और घर पानी में डूबने लगते हैं. कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाना पड़ता है.

आंकड़े बताते हैं कि बिहार देश का सबसे अधिक बाढ़-प्रभावित राज्यों में से एक है. राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर में से करीब 68,800 वर्ग किलोमीटर यानी 73 फीसदी हिस्सा बाढ़ से प्रभावित माना जाता है. उत्तर बिहार की करीब 76 फीसदी आबादी बाढ़ के खतरे वाले इलाके में रहती है.

लेकिन सवाल वही है- आखिर बिहार हर साल डूबता क्यों है? और बाढ़ से बचाव के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यह सिलसिला क्यों नहीं रुक रहा?

1980 के दशक से शुरू नहीं, उससे भी पुरानी है बाढ़ की कहानी

बिहार की बाढ़ का इतिहास काफी पुराना है. खासकर उत्तर बिहार में कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान, बूढ़ी गंडक, अधवारा और महानंदा जैसी नदियां हर साल अपना असर दिखाती हैं.

इन नदियों की एक खास बात यह है कि इनमें से कई का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल और तिब्बत के पहाड़ी इलाकों में है. यानी बिहार में बारिश कम भी हो, लेकिन नेपाल के पहाड़ों में भारी बारिश हुई तो उसका असर बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है.

इसी वजह से बिहार की बाढ़ को सिर्फ बिहार में होने वाली बारिश से समझना सही नहीं होगा. नेपाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और कुछ हद तक मध्य प्रदेश में होने वाली बारिश और वहां की नदियों में बढ़ने वाला पानी भी बिहार की मुश्किल बढ़ाता है.

1987: ऐसी बाढ़ जिसे बिहार आज भी याद करता है

बिहार में आई सबसे भयावह बाढ़ों में 1987 की बाढ़ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इस दौरान राज्य के 30 जिले और 24,518 गांव प्रभावित हुए थे.

करीब 1,399 लोगों की मौत हुई और 5,000 से ज्यादा जानवर मारे गए. फसलों को करीब 678 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

यह वह दौर था जब बिहार ने देखा कि बाढ़ सिर्फ पानी का बढ़ना नहीं है. इसके साथ बीमारी, विस्थापन, फसल बर्बादी और रोजगार का संकट भी आता है. इसके बाद भी बाढ़ का सिलसिला नहीं रुका.

2004: जब बाढ़ ने 1987 को भी पीछे छोड़ दिया

2004 में उत्तर बिहार की नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में जुलाई के पहले सप्ताह में ही जबरदस्त बारिश शुरू हो गई. बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला बलान, भूतही बलान और अधवारा नदी समूह में बाढ़ की स्थिति बेहद गंभीर हो गई.

बागमती नदी में दुब्बाधार के पास जलस्तर पुराने उच्चतम स्तर से करीब 1.18 मीटर ऊपर पहुंच गया. बूढ़ी गंडक और कमला बलान में भी रिकॉर्ड जलस्तर दर्ज किया गया.

कुल 53 तटबंध टूटे. करीब 9,346 गांव प्रभावित हुए और 2 करोड़ से ज्यादा लोगों पर इसका असर पड़ा. 885 लोगों की मौत हुई और 3,272 जानवर मारे गए.

फसलों को करीब 522 करोड़ रुपये और सार्वजनिक संपत्ति को 1,030 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ.

दिलचस्प बात यह थी कि इस दौरान मुख्य गंगा नदी में स्थिति उतनी गंभीर नहीं थी. यानी उत्तर बिहार में बाढ़ की असली ताकत स्थानीय और नेपाल से आने वाली नदियों में दिखाई दे रही थी.

2007: बिहार की सबसे बड़ी बाढ़ों में एक

2005 और 2006 अपेक्षाकृत सामान्य रहे, लेकिन 2007 में उत्तर बिहार ने फिर भयानक बाढ़ देखी.

लगभग सभी प्रमुख नदी बेसिनों में भारी बारिश हुई. बूढ़ी गंडक और बागमती बेसिन में जुलाई-अगस्त के दौरान लगातार बारिश से जलस्तर बढ़ता गया. तटबंधों में 28 जगह दरारें पड़ीं.

इस बाढ़ में 22 जिले प्रभावित हुए. करीब 2.4 करोड़ लोग बाढ़ की चपेट में आए और 1,287 लोगों की मौत हुई. 2400 से ज्यादा जानवर भी मारे गए. खेती की करीब एक करोड़ हेक्टेयर जमीन प्रभावित हुई. इसे बिहार के इतिहास की सबसे खराब बाढ़ों में गिना गया.

आखिर बिहार में बाढ़ आती कहां से है?

सबसे बड़ा सवाल यही है. बिहार में बाढ़ सिर्फ बिहार की बारिश से नहीं आती.

नेपाल सबसे बड़ा फैक्टर है. कोसी, गंडक, बागमती और कमला बलान जैसी नदियां नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों से होकर बिहार में आती हैं. नेपाल में तेज बारिश हुई तो इन नदियों का पानी तेजी से बिहार की ओर आता है.

कोसी का सबसे ज्यादा असर सुपौल और सहरसा में देखने को मिलता है. महानंदा और कनकई से अररिया और किशनगंज प्रभावित होते हैं. पूर्णिया, कटिहार और मधेपुरा पर भी कोसी और महानंदा का असर पड़ता है. पश्चिम चंपारण में गंडक, पूर्वी चंपारण में बूढ़ी गंडक, सीतामढ़ी में बागमती और मधुबनी में कमला बलान बड़ी भूमिका निभाती हैं.

उत्तर प्रदेश से आने वाली नदियों का असर सारण, बक्सर, भोजपुर, गोपालगंज, सीवान और पश्चिमी चंपारण तक दिखाई देता है.

वहीं झारखंड में भारी बारिश होने पर सोन और पुनपुन जैसी नदियों का जलस्तर बढ़ता है, जिसका असर पटना, भोजपुर और आसपास के इलाकों में पड़ सकता है.

यानी बिहार के लिए बाढ़ का पानी कई दिशाओं से आता है.

फिर बाढ़ इतनी खतरनाक क्यों हो जाती है?

इसका एक बड़ा कारण है गाद यानी सिल्ट.

हिमालय से आने वाली नदियां अपने साथ मिट्टी, बालू और दूसरे पदार्थ लेकर आती हैं. बिहार में आते-आते नदी की रफ्तार और ढलान कम हो जाती है. ऐसे में यह गाद नदी के तल में जमा होने लगती है.

धीरे-धीरे नदी का तल ऊपर उठता है और पानी रखने की उसकी क्षमता कम होती जाती है. फिर तेज बारिश या ऊपर से ज्यादा पानी आने पर नदी जल्दी उफनने लगती है.

इसके साथ बिहार की भौगोलिक स्थिति भी बड़ी वजह है. उत्तर बिहार का बड़ा हिस्सा बेहद समतल है. पानी को निकलने में समय लगता है और एक बार फैलने के बाद वह बहुत बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लेता है.

तटबंध: सुरक्षा कवच या नई परेशानी?

बाढ़ से बचाने के लिए दशकों से तटबंध बनाए और ऊंचे किए जाते रहे हैं. लेकिन विशेषज्ञों के बीच इस मॉडल को लेकर बहस भी होती रही है.

तर्क यह है कि जब नदी को तटबंधों के बीच बांध दिया जाता है तो पानी और उसके साथ आने वाली गाद भी उसी सीमित जगह में जमा होती रहती है. नदी का तल ऊपर उठता जाता है. इसके बाद तटबंध को और ऊंचा करना पड़ता है.

यानी एक तरह से समस्या का समाधान करते-करते नई समस्या पैदा होने का खतरा भी रहता है.

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करोड़ों खर्च, फिर भी हर साल वही हाल

बाढ़ से बचाव के नाम पर बिहार प्रशासन हर साल बड़ी राशि खर्च करती है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2020 से अब तक करीब 5100 करोड़ रुपये से ज्यादा बाढ़ सुरक्षा पर खर्च किए जा चुके हैं.

2026 में भी बाढ़ सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के लिए करीब 1117 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी गई. प्रशासन की ओर से 384 परियोजनाओं पर काम कराने की बात कही गई है.

सवाल यह नहीं है कि बाढ़ पर पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है. सवाल यह है कि इतना पैसा खर्च होने के बाद भी हर साल वही तबाही क्यों दिखाई देती है?

अगर हर साल तटबंध मजबूत किए जा रहे हैं, करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, बाढ़ नियंत्रण की योजनाएं बन रही हैं, तो फिर क्यों हर मानसून में लाखों लोग राहत शिविरों और ऊंची सड़कों का सहारा लेने को मजबूर होते हैं?

बिहार की बाढ़ का असली इलाज क्या है?

सिर्फ तटबंध ऊंचे करना शायद इसका पूरा समाधान नहीं है. नेपाल के साथ पानी और बाढ़ प्रबंधन को लेकर बेहतर समन्वय, नदियों की लगातार निगरानी, गाद प्रबंधन, जल निकासी की मजबूत व्यवस्था, बाढ़ क्षेत्र की वैज्ञानिक मैपिंग और जरूरत के मुताबिक स्थायी पुनर्वास जैसे कदम जरूरी हैं.

सबसे जरूरी है कि बाढ़ को हर साल आने वाली अचानक आपदा मानने के बजाय बिहार की स्थायी समस्या के रूप में देखा जाए.

क्योंकि पिछले पांच दशक का इतिहास एक बात साफ बता रहा है- बाढ़ बिहार में आती नहीं है, बल्कि बिहार के जीवन का हिस्सा बन चुकी है. सवाल अब यह है कि प्रशासन और सिस्टम इस पानी के साथ जीने की बेहतर व्यवस्था कब तैयार करेंगे?

वरना हर साल कहानी वही रहेगी- बारिश होगी, नदियां उफनेंगी, तटबंधों पर दबाव बढ़ेगा, गांव डूबेंगे, करोड़ों रुपये खर्च होंगे और अगली बरसात आते ही बिहार फिर उसी सवाल के सामने खड़ा होगा.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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