Explainer: देश में मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR), फॉर्म-6 में बदलाव, चुनाव आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया और EVM-बैलेट पेपर जैसे मुद्दों पर विपक्ष और BJP आमने-सामने हैं. विपक्ष जहां इसे ‘वोट के अधिकार और लोकतंत्र की सुरक्षा’ से जोड़ रहा है, वहीं BJP और चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध और विश्वसनीय बनाना चुनावी प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा है.
‘सेव डेमोक्रेसी’ मार्च से गरमायी सियासत
6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के सांसदों ने ‘सेव डेमोक्रेसी’ मार्च निकाल कर चुनाव आयोग तक पहुंचने की कोशिश की. मार्च को पुलिस ने रोक दिया. विपक्ष ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR से जुड़े विवादों पर जवाब की मांग की.
विपक्ष का दावा- वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR का मकसद मतदाता सूची की गहन जांच और उसमें अपात्र, मृत या स्थान बदल चुके मतदाताओं के नामों को दुरुस्त करना है. चुनाव आयोग इसे निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी प्रक्रिया बता रहा है.
विपक्ष का आरोप है कि सत्यापन की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी हटने का खतरा है. खासकर गरीब, प्रवासी, बुजुर्ग और ऐसे लोग जिन्हें जरूरी दस्तावेज जुटाने में परेशानी होती है, उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को मई 2026 में बरकरार रखा था. इसलिए SIR को लेकर मौजूदा विवाद का केंद्र अब इसकी प्रक्रिया और उसके संभावित प्रभाव पर है.
5 बड़े सवाल, जिन पर टिकी है पूरी बहस
- SIR में योग्य मतदाता का नाम नहीं कटेगा, इसकी गारंटी क्या है?
- फॉर्म-6 में अतिरिक्त जानकारी की जरूरत क्यों पड़ी और इसकी अनुमति किस स्तर पर मिली?
- चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय होने पर अंतिम फैसला किस प्रक्रिया से होता है?
- क्या ECI के हर फैसले में सर्वसम्मति या बहुमत की संवैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ?
- चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बढ़ाने के लिए EVM, बैलेट और मतदाता सूची पर क्या सुधार जरूरी हैं?
कोर्ट ने पूछा- आखिर बदलाव किसने किया?
फॉर्म-6 नये मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसी फॉर्म से जुड़े अतिरिक्त विवरण और SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाये हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर की सुनवाई में कहा कि उसने किसी संशोधित रूप (Modified Form-6) को मंजूरी नहीं दी थी. कोर्ट ने चुनाव आयोग से रिकॉर्ड और जवाब मांगा है कि फॉर्म में यदि कोई बदलाव हुआ, तो वह किस प्रक्रिया और किसके आदेश से हुआ.
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि चुनाव आयोग ने गैरकानूनी तरीके से फॉर्म-6 में बदलाव किया. अदालत फिलहाल मामले की प्रक्रिया और रिकॉर्ड की जांच कर रही है.
ECI के अंदर भी मतभेद? 14 आपत्तियों की रिपोर्ट से मचा हड़कंप
चुनाव आयोग में SIR से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कथित मतभेद भी नेतृत्वक बहस का हिस्सा बन गये हैं.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले महीनों में SIR से जुड़े कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज करायी थी.
विपक्ष इसे आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल मान रहा है. उसका आरोप है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में फैसले पारदर्शी और सामूहिक तरीके से होने चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से क्यों बढ़ी CEC पर सियासी गर्मी?
CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया.
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले कानून के मुताबिक लिये जाने चाहिए. यदि कोई फैसला न तो सर्वसम्मति से और न ही बहुमत से लिया गया हो, तो अदालत उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है और ऐसे फैसले को रद्द करने का सवाल उठ सकता है.
लेकिन यह स्पष्ट रहना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि CEC ज्ञानेश कुमार ने अकेले या गैरकानूनी तरीके से कोई फैसला लिया. यह मामला अभी न्यायिक जांच के स्तर पर है.
INDIA ब्लॉक की मांग- चुनाव प्रक्रिया में बढ़े पारदर्शिता
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने SIR और मतदाता सूची के मुद्दे को ‘वोट चोरी’ के आरोप से जोड़ा है. राहुल गांधी समेत विपक्षी नेता लगातार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
INDIA ब्लॉक के नेताओं ने EVM की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी उठायी है. विपक्ष का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है और इसे मजबूत करने के लिए ज्यादा पारदर्शिता जरूरी है.
BJP का आरोप है कि विपक्ष चुनावी हार के बाद EVM और चुनाव आयोग को निशाना बना रहा है. पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और उस पर बिना ठोस आधार के आरोप लगाना लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है.
क्या सुप्रीम कोर्ट ने CEC को दोषी ठहरा दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी CEC ज्ञानेश कुमार को किसी मामले में दोषी नहीं ठहराया है. अदालत ने संबंधित याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है और रिकॉर्ड/जवाब मांगा है. इसी तरह फॉर्म-6 के मामले में भी अदालत ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि चुनाव आयोग ने गैरकानूनी तरीके से फॉर्म बदला. यानी विपक्ष के आरोप नेतृत्वक हैं, जबकि उनकी कानूनी वैधता पर अंतिम फैसला अदालत को करना है.
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