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August 15, 2026

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स्वतंत्रता सेनानी जिनका नाम इतिहास की किताबों में भी नहीं मिलता, पढ़ें इनकी अनसुनी कहानियां

Unsung Heroes of India: हिंदुस्तान की आजादी की कहानी सिर्फ महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आजाद जैसे प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है. देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानी भी हुए, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया, जेल गए और अपनी जान तक कुर्बान कर दी. इनमें से कई नाम आज भी आम लोगों के बीच ज्यादा चर्चित नहीं हैं. स्वतंत्रता दिवस के खास मौके (Independence Day Special) पर जानिए ऐसे ही 5 गुमनाम और कम चर्चित स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियां (Freedom Fighter Stories), जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया. हिंदुस्तान के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी कौन थे? आजादी के आंदोलन में अलग-अलग वर्गों और क्षेत्रों के लोगों ने हिस्सा लिया. आदिवासी समुदायों से लेकर किसान, स्त्रीएं, मजदूर, छात्र और क्रांतिकारी तक अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए. कई स्थानीय नायकों का संघर्ष अपने क्षेत्र तक सीमित रहा, जिसकी वजह से उनके नाम राष्ट्रीय इतिहास की लोकप्रिय किताबों में ज्यादा जगह नहीं बना पाए. मातंगिनी हाजरा: 73 साल की उम्र में तिरंगा लेकर निकलीं पश्चिम बंगाल की मातंगिनी हाजरा हिंदुस्तान छोड़ो आंदोलन की प्रमुख स्त्री सेनानियों में शामिल थीं. 1942 में उन्होंने तिरंगा हाथ में लेकर जुलूस का नेतृत्व किया. ब्रिटिश पुलिस की गोली लगने के बाद भी वे आगे बढ़ती रहीं और शहीद हो गईं. उन्हें आज भी बंगाल में सम्मान के साथ याद किया जाता है. ये भी पढ़ें: स्कूल हो या कॉलेज, इस स्वतंत्रता दिवस, इन 30 स्लोगन से बनाएं पोस्टर पीर अली खान: किताबें बेचने से क्रांति तक का सफर बिहार के पीर अली खान 1857 के विद्रोह से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं. वे पटना में पुस्तक विक्रेता के रूप में काम करते थे और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे. अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर फांसी दे दी. उनका नाम बिहार के 1857 के विद्रोह के इतिहास में खास महत्व रखता है. प्रीतिलता वाडेदार: चटगांव की साहसी क्रांतिकारी प्रीतिलता वाडेदार बंगाल की क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ी थीं. 1932 में उन्होंने चटगांव के पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर क्रांतिकारी कार्रवाई का नेतृत्व किया. ब्रिटिश पुलिस से घिरने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने सायनाइड खा लिया और शहीद हो गईं. आदिवासी और क्षेत्रीय संघर्षों के नायक तीलू रौतेली: कम उम्र में उठाया हथियार उत्तराखंड की तीलू रौतेली को गढ़वाल की वीरांगना के रूप में याद किया जाता है. लोक परंपराओं और क्षेत्रीय इतिहास में उनके साहस और संघर्ष की कई कहानियां मिलती हैं. उन्होंने कम उम्र में ही अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए हथियार उठाया और कई संघर्षों में हिस्सा लिया. वीर कुंवर सिंह: 80 साल की उम्र में अंग्रेजों से लोहा बिहार के जगदीशपुर के वीर कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह के प्रमुख योद्धाओं में थे. करीब 80 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला. युद्ध के दौरान घायल हुए अपने हाथ को लेकर उनसे जुड़ी वीरता की कहानी आज भी लोकप्रिय है. उनका संघर्ष बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है. गुमनाम Freedom Fighter को जानना क्यों जरूरी? हिंदुस्तान की स्वतंत्रता की कहानी कई छोटे-बड़े आंदोलनों और असंख्य लोगों के बलिदान से बनी है. प्रसिद्ध नेताओं के साथ उन स्थानीय और क्षेत्रीय सेनानियों को याद करना भी जरूरी है, जिन्होंने अपने स्तर पर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी. इन गुमनाम नायकों की कहानियां नई पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापकता और विविधता समझने में मदद करती हैं. ये भी पढ़ें: Independence Day 2026: स्कूली बच्चों के लिए स्वतंत्रता दिवस पर 10 लाइन, निबंध में कर सकते हैं शामिल The post स्वतंत्रता सेनानी जिनका नाम इतिहास की किताबों में भी नहीं मिलता, पढ़ें इनकी अनसुनी कहानियां appeared first on Naya Vichar.

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श्रीलंका के खिलाफ 157 रन बनाते ही शुभमन गिल रचेंगे इतिहास, WTC में 3000 रन बनाने वाले बनेंगे पहले भारतीय

Shubman Gill Record: श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से शुरू होने वाली दो टेस्ट मैचों की सीरीज में हिंदुस्तानीय कप्तान शुभमन गिल की नजर सिर्फ टीम को जीत दिलाने पर नहीं होगी. गिल के पास इस सीरीज में बल्ले से इतिहास रचने का भी शानदार मौका है. वह वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) में दो बड़े रिकॉर्ड अपने नाम कर सकते हैं. 157 रन बनाते ही WTC में पूरा करेंगे 3000 रन गिल अगर श्रीलंका के खिलाफ दोनों टेस्ट मैचों में 157 रन बना लेते हैं, तो वह WTC इतिहास में 3,000 रन पूरे करने वाले पहले हिंदुस्तानीय बल्लेबाज बन जाएंगे. गिल ने अब तक WTC में 40 मैचों की 73 पारियों में 2,843 रन बनाए हैं. उन्हें 3,000 रन पूरे करने के लिए सिर्फ 157 रन की जरूरत है. हिंदुस्तानीय बल्लेबाजों में WTC में सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में गिल फिलहाल पहले स्थान पर हैं. उनके बाद ऋषभ पंत के 2,780 और पूर्व कप्तान रोहित शर्मा के 2,716 रन हैं. वो तीसरे स्थान पर मौजूद हैं. विराट कोहली 2,617 रन के साथ चौथे स्थान पर हैं. WTC में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड इंग्लैंड के जो रूट के नाम है. रूट ने अब तक 77 मैचों में 6,651 रन बनाए हैं. ये भी पढ़ें: IND vs SL Live Streaming: फ्री में कैसे देखें हिंदुस्तान-श्रीलंका का पहला टेस्ट मैच? WTC में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले हिंदुस्तानीय खिलाड़ी मैच पारी रन शुभमन गिल 40 73 2,843 ऋषभ पंत 40 71 2,780 रोहित शर्मा 40 69 2,716 विराट कोहली 46 79 2,617 रवींद्र जडेजा 48 73 2,610 यशस्वी जायसवाल 28 53 2,511 केएल राहुल 33 62 2,148 कप्तान के तौर पर भी बना सकते हैं ये रिकॉर्ड शुभमन गिल के पास सिर्फ 3,000 WTC रन पूरे करने का ही मौका नहीं है. वह मौजूदा WTC चक्र में बतौर हिंदुस्तानीय कप्तान 1,000 रन पूरे करने वाले पहले खिलाड़ी भी बन सकते हैं. गिल ने 2025-27 WTC चक्र में हिंदुस्तान की कप्तानी करते हुए आठ मैचों में अब तक 950 रन बनाए हैं. यानी वह इस खास उपलब्धि से सिर्फ 50 रन दूर हैं. ये भी पढ़ें: 15 अगस्त को 7:29 में धोनी ने लिया था संन्यास, 6 साल बाद भी कायम है ‘कैप्टन कूल’ का ये रिकॉर्ड WTC के एक चक्र में हिंदुस्तानीय कप्तानों के सबसे ज्यादा रन खिलाड़ी मैच रन सर्वोच्च स्कोर 100/50 चक्र शुभमन गिल 8 950 269 5/1 2025-27 विराट कोहली 15 934 254* 2/5 2019-21 रोहित शर्मा 17 864 131 3/4 2023-25 विराट कोहली 7 415 79 0/3 2021-23 रोहित शर्मा 7 390 120 1/0 2021-23 अब तक तीन हिंदुस्तानीय बल्लेबाज एक WTC चक्र में 1,000 से ज्यादा रन बना चुके हैं. इनमें अजिंक्य रहाणे, रोहित शर्मा और यशस्वी जायसवाल शामिल हैं. अगर गिल श्रीलंका सीरीज में 50 रन बना लेते हैं, तो वह इस सूची में शामिल होने वाले चौथे हिंदुस्तानीय बन जाएंगे. ये भी पढ़ें: कुलदीप यादव के समर्थन में उतरे मुरली कार्तिक, रोहित-द्रविड़ के दौर को लेकर कही ये बात WTC के एक चक्र में हिंदुस्तानीय खिलाड़ियों के सबसे ज्यादा रन खिलाड़ी मैच रन सर्वोच्च स्कोर 100/50 चक्र यशस्वी जायसवाल 19 1,798 214* 4/10 2023-25 अजिंक्य रहाणे 18 1,159 115 3/6 2019-21 रोहित शर्मा 12 1,094 212 4/2 2019-21 शुभमन गिल 16 972 119* 3/3 2023-25 शुभमन गिल 8 950 269 5/1 2025-27 WTC के एक चक्र में कप्तान के तौर पर सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड भी जो रूट के नाम है. उन्होंने 2019-21 WTC चक्र में इंग्लैंड की कप्तानी करते हुए 20 मैचों में 1,660 रन बनाए थे. अब तक सिर्फ चार कप्तान जो रूट, बाबर आजम, दिमुथ करुणारत्ने और बेन स्टोक्स एक WTC चक्र में कप्तान के तौर पर 1,000 से ज्यादा रन बना पाए हैं. श्रीलंका के खिलाफ सीरीज में गिल के पास इस खास क्लब में शामिल होने का मौका है. ये भी पढ़ें: IND vs SL: पहले टेस्ट के लिए श्रीलंका टीम का ऐलान, ढाई साल बाद हुई डिकवेला की वापसी The post श्रीलंका के खिलाफ 157 रन बनाते ही शुभमन गिल रचेंगे इतिहास, WTC में 3000 रन बनाने वाले बनेंगे पहले हिंदुस्तानीय appeared first on Naya Vichar.

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श्रीलंका के खिलाफ 157 रन बनाते ही शुभमन गिल रचेंगे इतिहास, WTC में 3000 रन बनाने वाले बनेंगे पहले भारतीय

Shubman Gill Record: श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से शुरू होने वाली दो टेस्ट मैचों की सीरीज में हिंदुस्तानीय कप्तान शुभमन गिल की नजर सिर्फ टीम को जीत दिलाने पर नहीं होगी. गिल के पास इस सीरीज में बल्ले से इतिहास रचने का भी शानदार मौका है. वह वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) में दो बड़े रिकॉर्ड अपने नाम कर सकते हैं. 157 रन बनाते ही WTC में पूरा करेंगे 3000 रन गिल अगर श्रीलंका के खिलाफ दोनों टेस्ट मैचों में 157 रन बना लेते हैं, तो वह WTC इतिहास में 3,000 रन पूरे करने वाले पहले हिंदुस्तानीय बल्लेबाज बन जाएंगे. गिल ने अब तक WTC में 40 मैचों की 73 पारियों में 2,843 रन बनाए हैं. उन्हें 3,000 रन पूरे करने के लिए सिर्फ 157 रन की जरूरत है. हिंदुस्तानीय बल्लेबाजों में WTC में सबसे ज्यादा रन बनाने के मामले में गिल फिलहाल पहले स्थान पर हैं. उनके बाद ऋषभ पंत के 2,780 और पूर्व कप्तान रोहित शर्मा के 2,716 रन हैं. वो तीसरे स्थान पर मौजूद हैं. विराट कोहली 2,617 रन के साथ चौथे स्थान पर हैं. WTC में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड इंग्लैंड के जो रूट के नाम है. रूट ने अब तक 77 मैचों में 6,651 रन बनाए हैं. ये भी पढ़ें: IND vs SL Live Streaming: फ्री में कैसे देखें हिंदुस्तान-श्रीलंका का पहला टेस्ट मैच? WTC में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले हिंदुस्तानीय खिलाड़ी मैच पारी रन शुभमन गिल 40 73 2,843 ऋषभ पंत 40 71 2,780 रोहित शर्मा 40 69 2,716 विराट कोहली 46 79 2,617 रवींद्र जडेजा 48 73 2,610 यशस्वी जायसवाल 28 53 2,511 केएल राहुल 33 62 2,148 कप्तान के तौर पर भी बना सकते हैं ये रिकॉर्ड शुभमन गिल के पास सिर्फ 3,000 WTC रन पूरे करने का ही मौका नहीं है. वह मौजूदा WTC चक्र में बतौर हिंदुस्तानीय कप्तान 1,000 रन पूरे करने वाले पहले खिलाड़ी भी बन सकते हैं. गिल ने 2025-27 WTC चक्र में हिंदुस्तान की कप्तानी करते हुए आठ मैचों में अब तक 950 रन बनाए हैं. यानी वह इस खास उपलब्धि से सिर्फ 50 रन दूर हैं. ये भी पढ़ें: 15 अगस्त को 7:29 में धोनी ने लिया था संन्यास, 6 साल बाद भी कायम है ‘कैप्टन कूल’ का ये रिकॉर्ड WTC के एक चक्र में हिंदुस्तानीय कप्तानों के सबसे ज्यादा रन खिलाड़ी मैच रन सर्वोच्च स्कोर 100/50 चक्र शुभमन गिल 8 950 269 5/1 2025-27 विराट कोहली 15 934 254* 2/5 2019-21 रोहित शर्मा 17 864 131 3/4 2023-25 विराट कोहली 7 415 79 0/3 2021-23 रोहित शर्मा 7 390 120 1/0 2021-23 अब तक तीन हिंदुस्तानीय बल्लेबाज एक WTC चक्र में 1,000 से ज्यादा रन बना चुके हैं. इनमें अजिंक्य रहाणे, रोहित शर्मा और यशस्वी जायसवाल शामिल हैं. अगर गिल श्रीलंका सीरीज में 50 रन बना लेते हैं, तो वह इस सूची में शामिल होने वाले चौथे हिंदुस्तानीय बन जाएंगे. ये भी पढ़ें: कुलदीप यादव के समर्थन में उतरे मुरली कार्तिक, रोहित-द्रविड़ के दौर को लेकर कही ये बात WTC के एक चक्र में हिंदुस्तानीय खिलाड़ियों के सबसे ज्यादा रन खिलाड़ी मैच रन सर्वोच्च स्कोर 100/50 चक्र यशस्वी जायसवाल 19 1,798 214* 4/10 2023-25 अजिंक्य रहाणे 18 1,159 115 3/6 2019-21 रोहित शर्मा 12 1,094 212 4/2 2019-21 शुभमन गिल 16 972 119* 3/3 2023-25 शुभमन गिल 8 950 269 5/1 2025-27 WTC के एक चक्र में कप्तान के तौर पर सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड भी जो रूट के नाम है. उन्होंने 2019-21 WTC चक्र में इंग्लैंड की कप्तानी करते हुए 20 मैचों में 1,660 रन बनाए थे. अब तक सिर्फ चार कप्तान जो रूट, बाबर आजम, दिमुथ करुणारत्ने और बेन स्टोक्स एक WTC चक्र में कप्तान के तौर पर 1,000 से ज्यादा रन बना पाए हैं. श्रीलंका के खिलाफ सीरीज में गिल के पास इस खास क्लब में शामिल होने का मौका है. ये भी पढ़ें: IND vs SL: पहले टेस्ट के लिए श्रीलंका टीम का ऐलान, ढाई साल बाद हुई डिकवेला की वापसी The post श्रीलंका के खिलाफ 157 रन बनाते ही शुभमन गिल रचेंगे इतिहास, WTC में 3000 रन बनाने वाले बनेंगे पहले हिंदुस्तानीय appeared first on Naya Vichar.

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झारखंड के 5 ‘आदिवासी सूरमा’ जिनसे कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत, एक ने तो कलेक्टर को ही तीर से मारकर कर दिया था ढेर

रांची: स्वतंत्रता दिवस का पावन अवसर केवल देश की आजादी का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि उन अनगिनत वीरों को नमन करने का समय है जिन्होंने हिंदुस्तान की स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दे दिया था. देश की आजादी की जब भी बात होती है, तो झारखंड की माटी और यहां के आदिवासी जननायकों का बड़ा योगदान है. अंग्रेजों के दमनकारी शासन, जल-जंगल-जमीन की लूट और शोषण के खिलाफ जब पूरा देश धीरे-धीरे गोलबंद हो रहा था, उससे पहले ही झारखंड के जंगलों में क्रांति की ज्वाला धधक उठी थी. 15 अगस्त के इस ऐतिहासिक अवसर पर आज हम झारखंड के उन 5 महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को याद करेंगे, जिनके नाम से ही ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों और सेना के पसीने छूट जाते थे. भगवान बिरसा मुंडा: जिन्होंने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव झारखंड के छोटानागपुर की धरती पर जन्मे ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए थे. 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी मुंडारी ‘खुंटकट्टी’ व्यवस्था की समाप्ति और जमींदारों के शोषण के खिलाफ ‘उलगुलान’ का शंखनाद किया था. बिरसा मुंडा के कुशल नेतृत्व, छापामार युद्ध रणनीति और विशाल जनसमर्थन से अंग्रेज अफसर इतने खौफजदा थे कि उन्हें बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए अपनी पूरी सेना झोंकनी पड़ी थी. मात्र 25 वर्ष की में अंग्रेजों की हिरासत में उनकी शहादत हो गई, लेकिन उनका उलगुलान आज भी हर हिंदुस्तानीय को अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देता है. बाबा तिलका मांझी: जिन्होंने ब्रिटिश कलेक्टर को तीर से मार गिराया था 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी लगभग आठ दशक पहले अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बाबा तिलका मांझी हिंदुस्तान के पहले आदिवासी क्रांतिकारी थे. उन्होंने 1784 में संथाल परगना के जंगलों से ‘तिलका आंदोलन’ का नेतृत्व किया था. बाबा तिलका मांझी के अद्भुत अचूक निशानेबाजी और अदम्य साहस का खौफ अंग्रेजों में इस कदर था कि भागलपुर का क्रूर ब्रिटिश कलेक्टर क्लीवलैंड उनके नाम से ही थर्राता था. तिलका मांझी ने एक ताड़ के पेड़ पर छिपकर क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर से ढेर कर दिया था. इस घटना ने पूरे ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया था और बाद में अंग्रेजों ने छल-बल से उन्हें गिरफ्तार कर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी थी. ये भी पढ़ें: पारसनाथ पहाड़ पर निर्माण की वैधता जांचेगा प्रशासन, हाईकोर्ट ने डीसी को दिया स्थल निरीक्षण का निर्देश सिदो-कान्हू: जिनके एक आह्वान पर उठ खड़े हुए थे 30 हजार योद्धा 30 जून 1855 को शुरू हुआ ‘संथाल हूल’ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हिंदुस्तान का सबसे संगठित और भीषण आदिवासी विद्रोह माना जाता है. भोगनाडीह की माटी में जन्मे दो सगे भाइयों, सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने संथाल परगना में अंग्रेजों, महाजनों और दलालों के गठजोड़ के खिलाफ बिगुल फूंका था. सिदो-कान्हू के एक आह्वान पर पारंपरिक हथियारों (धनुष-बाण और कुल्हाड़ी) से लैस 30,000 से अधिक संथाल आदिवासी एकजुट हो गए थे. उनके इस विशाल जनसैलाब और आक्रामक रणनीति से अंग्रेज अफसर इतने डर गए थे कि भागलपुर से लेकर बीरभूम तक ब्रिटिश शासन की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी. बाद में उन्हें मार्शल लॉ लगाना पड़ा था. जतरा टाना भगत: अहिंसा और ‘टाना आंदोलन’ के जननायक गुमला जिले के चिंगरी नवटोली में जन्मे जतरा टाना भगत ने अंग्रेजों के खिलाफ एक अनोखा और अभूतपूर्व आंदोलन चलाया था. 1914 में उन्होंने ‘टाना भगत आंदोलन’ की शुरुआत की, जो धार्मिक और सांस्कृतिक सुधार के साथ-साथ अंग्रेजों के खिलाफ एक सशक्त अहिंसक सत्याग्रह था. जतरा भगत के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों को लगान (टैक्स) देने, जमींदारों की बेगारी करने और ब्रिटिश सामानों का उपयोग करने से साफ इनकार कर दिया था. बिना एक भी हथियार उठाए केवल आत्मबल और पूर्ण असहयोग के दम पर उन्होंने अंग्रेजों के राजस्व तंत्र की कमर तोड़ दी थी. उनके विचारों के प्रभाव से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर कड़ी प्रताड़ना दी थी, जिसके बाद वे शहीद हो गए. वीर बुधु भगत: ‘कोल विद्रोह’ के अमर सेनानी रांची के चान्हो (सिल्ली/टीको) क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले वीर बुधु भगत 1831-32 के ऐतिहासिक ‘कोल विद्रोह’ के मुख्य सूत्रधार थे. उन्होंने छोटानागपुर के पठारी इलाकों में ब्रिटिश शासन और दमनकारी नीतियों के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट कर गुरिल्ला युद्ध लड़ा था. बुधु भगत की युद्ध कला, अदम्य साहस और जनता में उनकी जबरदस्त पैठ का अंग्रेजों में इतना खौफ था कि कैप्टन इमपे जैसे अधिकारियों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए तत्कालीन समय में 1,000 रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित किया था. अंग्रेजों की पूरी सैन्य टुकड़ी ने जब उन्हें घेरा, तो वे अपने पुत्रों और सैकड़ों समर्थकों के साथ अंतिम सांस तक लड़ते हुए शहीद हो गए थे. ये भी पढ़ें: सारण में स्वतंत्रता दिवस समारोह का फुल ड्रेस रिहर्सल, 11 प्लाटून ने किया परेड का अभ्यास The post झारखंड के 5 ‘आदिवासी सूरमा’ जिनसे कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत, एक ने तो कलेक्टर को ही तीर से मारकर कर दिया था ढेर appeared first on Naya Vichar.

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झारखंड के 5 ‘आदिवासी सूरमा’ जिनसे कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत, एक ने तो कलेक्टर को ही तीर से मारकर कर दिया था ढेर

रांची: स्वतंत्रता दिवस का पावन अवसर केवल देश की आजादी का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि उन अनगिनत वीरों को नमन करने का समय है जिन्होंने हिंदुस्तान की स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दे दिया था. देश की आजादी की जब भी बात होती है, तो झारखंड की माटी और यहां के आदिवासी जननायकों का बड़ा योगदान है. अंग्रेजों के दमनकारी शासन, जल-जंगल-जमीन की लूट और शोषण के खिलाफ जब पूरा देश धीरे-धीरे गोलबंद हो रहा था, उससे पहले ही झारखंड के जंगलों में क्रांति की ज्वाला धधक उठी थी. 15 अगस्त के इस ऐतिहासिक अवसर पर आज हम झारखंड के उन 5 महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को याद करेंगे, जिनके नाम से ही ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों और सेना के पसीने छूट जाते थे. भगवान बिरसा मुंडा: जिन्होंने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव झारखंड के छोटानागपुर की धरती पर जन्मे ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए थे. 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी मुंडारी ‘खुंटकट्टी’ व्यवस्था की समाप्ति और जमींदारों के शोषण के खिलाफ ‘उलगुलान’ का शंखनाद किया था. बिरसा मुंडा के कुशल नेतृत्व, छापामार युद्ध रणनीति और विशाल जनसमर्थन से अंग्रेज अफसर इतने खौफजदा थे कि उन्हें बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए अपनी पूरी सेना झोंकनी पड़ी थी. मात्र 25 वर्ष की में अंग्रेजों की हिरासत में उनकी शहादत हो गई, लेकिन उनका उलगुलान आज भी हर हिंदुस्तानीय को अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देता है. बाबा तिलका मांझी: जिन्होंने ब्रिटिश कलेक्टर को तीर से मार गिराया था 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी लगभग आठ दशक पहले अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बाबा तिलका मांझी हिंदुस्तान के पहले आदिवासी क्रांतिकारी थे. उन्होंने 1784 में संथाल परगना के जंगलों से ‘तिलका आंदोलन’ का नेतृत्व किया था. बाबा तिलका मांझी के अद्भुत अचूक निशानेबाजी और अदम्य साहस का खौफ अंग्रेजों में इस कदर था कि भागलपुर का क्रूर ब्रिटिश कलेक्टर क्लीवलैंड उनके नाम से ही थर्राता था. तिलका मांझी ने एक ताड़ के पेड़ पर छिपकर क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर से ढेर कर दिया था. इस घटना ने पूरे ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया था और बाद में अंग्रेजों ने छल-बल से उन्हें गिरफ्तार कर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी थी. ये भी पढ़ें: पारसनाथ पहाड़ पर निर्माण की वैधता जांचेगा प्रशासन, हाईकोर्ट ने डीसी को दिया स्थल निरीक्षण का निर्देश सिदो-कान्हू: जिनके एक आह्वान पर उठ खड़े हुए थे 30 हजार योद्धा 30 जून 1855 को शुरू हुआ ‘संथाल हूल’ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हिंदुस्तान का सबसे संगठित और भीषण आदिवासी विद्रोह माना जाता है. भोगनाडीह की माटी में जन्मे दो सगे भाइयों, सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने संथाल परगना में अंग्रेजों, महाजनों और दलालों के गठजोड़ के खिलाफ बिगुल फूंका था. सिदो-कान्हू के एक आह्वान पर पारंपरिक हथियारों (धनुष-बाण और कुल्हाड़ी) से लैस 30,000 से अधिक संथाल आदिवासी एकजुट हो गए थे. उनके इस विशाल जनसैलाब और आक्रामक रणनीति से अंग्रेज अफसर इतने डर गए थे कि भागलपुर से लेकर बीरभूम तक ब्रिटिश शासन की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी. बाद में उन्हें मार्शल लॉ लगाना पड़ा था. जतरा टाना भगत: अहिंसा और ‘टाना आंदोलन’ के जननायक गुमला जिले के चिंगरी नवटोली में जन्मे जतरा टाना भगत ने अंग्रेजों के खिलाफ एक अनोखा और अभूतपूर्व आंदोलन चलाया था. 1914 में उन्होंने ‘टाना भगत आंदोलन’ की शुरुआत की, जो धार्मिक और सांस्कृतिक सुधार के साथ-साथ अंग्रेजों के खिलाफ एक सशक्त अहिंसक सत्याग्रह था. जतरा भगत के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों को लगान (टैक्स) देने, जमींदारों की बेगारी करने और ब्रिटिश सामानों का उपयोग करने से साफ इनकार कर दिया था. बिना एक भी हथियार उठाए केवल आत्मबल और पूर्ण असहयोग के दम पर उन्होंने अंग्रेजों के राजस्व तंत्र की कमर तोड़ दी थी. उनके विचारों के प्रभाव से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर कड़ी प्रताड़ना दी थी, जिसके बाद वे शहीद हो गए. वीर बुधु भगत: ‘कोल विद्रोह’ के अमर सेनानी रांची के चान्हो (सिल्ली/टीको) क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले वीर बुधु भगत 1831-32 के ऐतिहासिक ‘कोल विद्रोह’ के मुख्य सूत्रधार थे. उन्होंने छोटानागपुर के पठारी इलाकों में ब्रिटिश शासन और दमनकारी नीतियों के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट कर गुरिल्ला युद्ध लड़ा था. बुधु भगत की युद्ध कला, अदम्य साहस और जनता में उनकी जबरदस्त पैठ का अंग्रेजों में इतना खौफ था कि कैप्टन इमपे जैसे अधिकारियों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए तत्कालीन समय में 1,000 रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित किया था. अंग्रेजों की पूरी सैन्य टुकड़ी ने जब उन्हें घेरा, तो वे अपने पुत्रों और सैकड़ों समर्थकों के साथ अंतिम सांस तक लड़ते हुए शहीद हो गए थे. ये भी पढ़ें: सारण में स्वतंत्रता दिवस समारोह का फुल ड्रेस रिहर्सल, 11 प्लाटून ने किया परेड का अभ्यास The post झारखंड के 5 ‘आदिवासी सूरमा’ जिनसे कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत, एक ने तो कलेक्टर को ही तीर से मारकर कर दिया था ढेर appeared first on Naya Vichar.

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स्वतंत्रता दिवस पर रिलायंस डिजिटल लाया डिस्को सेल; स्मार्टफोन्स, टीवी और लैपटॉप्स पर तगड़ी छूट, जानें ऑफर्स

अगर आप इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने घर के लिए नया स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, लैपटॉप या कोई होम अप्लायंस खरीदने का विचार कर रहे हैं, तो आपके लिए एक शानदार मौका आ गया है. देश की प्रमुख रिटेल कंपनी रिलायंस डिजिटल ने अपनी स्पेशल D.I.S.C.O. (Digital India Sale Crazy Offers) सेल का ऐलान कर दिया है. 16 अगस्त तक चलने वाली इस खास सेल में ग्राहकों को एक्सचेंज बोनस से लेकर बैंक कार्ड्स और UPI पेमेंट पर तगड़ा डिस्काउंट दिया जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स की खरीदारी पर बचत को दोगुना करने के लिए कंपनी नो-कॉस्ट ईएमआई और एडिशनल वारंटी जैसी सुविधाएं भी दे रही है. एक्सचेंज और बैंक डिस्काउंट से होगी ₹45,000 तक की बचत रिलायंस डिजिटल की इस लिमिटेड टाइम सेल में ग्राहकों को पुराने इलेक्ट्रॉनिक्स को बदलने पर ₹15,000 तक का अतिरिक्त एक्सचेंज बोनस मिल रहा है. इसके साथ ही विभिन्न बैंकों के क्रेडिट और डेबिट कार्ड, पेपर फाइनेंस और यूपाआई (UPI) के जरिए भुगतान करने पर ₹30,000 तक की सीधी छूट का फायदा उठाया जा सकता है. यानी अगर सही कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल किया जाए तो कुल मिलाकर ₹45,000 तक की बड़ी बचत संभव है. कई चुनिंदा कैटेगरी के प्रोडक्ट्स पर कंपनी एक साल की एक्सटेंडेड वारंटी भी बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के दे रही है. किफायती स्मार्टफोन, ईयरबड्स और एक्सेसरीज पर धमाकेदार डील्स स्मार्टफोन सेगमेंट में एंट्री-लेवल से लेकर फ्लैगशिप डिवाइसेस तक पर बेहतरीन ऑफर्स मौजूद हैं. सेल में 4G स्मार्टफोन्स की शुरुआती कीमत ₹10,999 रखी गई है, जबकि 5G कनेक्टिविटी वाले स्मार्टफोन्स ₹13,999 की शुरुआती कीमत में खरीदे जा सकते हैं. प्रीमियम स्मार्टफोन्स पर ₹10,000 तक का एक्सचेंज बोनस और 30 महीने तक की नो-कॉस्ट EMI का विकल्प दिया जा रहा है. अगर आप हेडफोन, ईयरबड्स या ब्लूटूथ स्पीकर्स जैसी एक्सेसरीज खरीदना चाहते हैं, तो UPI से पेमेंट करने पर 10 फीसदी की अतिरिक्त छूट पा सकते हैं. 65-इंच 4K टीवी और होम अप्लायंसेज पर आधी से ज्यादा छूट बड़े स्क्रीन वाले स्मार्ट टीवी के शौकीनों के लिए यह सेल बेहद खास रहने वाली है. रिलायंस डिजिटल पर 65 इंच का शानदार 4K UHD गूगल टीवी अब महज ₹39,990 की शुरुआती कीमत पर उपलब्ध कराया गया है. इसके अलावा, होम अप्लायंसेज में साइड-बाय-साइड रेफ्रिजरेटर ₹39,990 और एडवांस्ड वॉशर-ड्रायर ₹55,990 से शुरू हो रहे हैं. एक अन्य प्रीमियम ऑफर के तहत ₹50,000 या उससे ज्यादा की खरीदारी करने वाले ग्राहकों को ₹43,900 का डायसन बिग बॉल वैक्यूम क्लीनर सिर्फ ₹13,900 में लेने का अवसर मिल रहा है. लैपटॉप पर 3 साल की वारंटी और भारी एक्सचेंज बेनिफिट वर्किंग प्रोफेशन्ल्स और स्टूडेंट्स के लिए लैपटॉप्स की रेंज ₹39,999 से शुरू होती है. सेल के दौरान लैपटॉप खरीदने पर तीन साल तक की ब्रांड वारंटी के साथ-साथ पुरानी डिवाइस के बदले ₹5,000 तक का अतिरिक्त एक्सचेंज बेनिफिट दिया जा रहा है. इन सभी डील्स और ऑफर्स का लाभ देशभर के रिलायंस डिजिटल स्टोर्स, माय जियो स्टोर्स और आधिकारिक वेबसाइट से ऑनलाइन शॉपिंग करके उठाया जा सकता है. ये भी पढ़ें: Google Pixel 11 सीरीज खरीदने के लिए कौन सा देश सबसे सस्ता? हिंदुस्तान, अमेरिका, जापान और UK की कीमत देखें The post स्वतंत्रता दिवस पर रिलायंस डिजिटल लाया डिस्को सेल; स्मार्टफोन्स, टीवी और लैपटॉप्स पर तगड़ी छूट, जानें ऑफर्स appeared first on Naya Vichar.

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स्वतंत्रता दिवस पर रिलायंस डिजिटल लाया डिस्को सेल; स्मार्टफोन्स, टीवी और लैपटॉप्स पर तगड़ी छूट, जानें ऑफर्स

अगर आप इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने घर के लिए नया स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, लैपटॉप या कोई होम अप्लायंस खरीदने का विचार कर रहे हैं, तो आपके लिए एक शानदार मौका आ गया है. देश की प्रमुख रिटेल कंपनी रिलायंस डिजिटल ने अपनी स्पेशल D.I.S.C.O. (Digital India Sale Crazy Offers) सेल का ऐलान कर दिया है. 16 अगस्त तक चलने वाली इस खास सेल में ग्राहकों को एक्सचेंज बोनस से लेकर बैंक कार्ड्स और UPI पेमेंट पर तगड़ा डिस्काउंट दिया जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स की खरीदारी पर बचत को दोगुना करने के लिए कंपनी नो-कॉस्ट ईएमआई और एडिशनल वारंटी जैसी सुविधाएं भी दे रही है. एक्सचेंज और बैंक डिस्काउंट से होगी ₹45,000 तक की बचत रिलायंस डिजिटल की इस लिमिटेड टाइम सेल में ग्राहकों को पुराने इलेक्ट्रॉनिक्स को बदलने पर ₹15,000 तक का अतिरिक्त एक्सचेंज बोनस मिल रहा है. इसके साथ ही विभिन्न बैंकों के क्रेडिट और डेबिट कार्ड, पेपर फाइनेंस और यूपाआई (UPI) के जरिए भुगतान करने पर ₹30,000 तक की सीधी छूट का फायदा उठाया जा सकता है. यानी अगर सही कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल किया जाए तो कुल मिलाकर ₹45,000 तक की बड़ी बचत संभव है. कई चुनिंदा कैटेगरी के प्रोडक्ट्स पर कंपनी एक साल की एक्सटेंडेड वारंटी भी बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के दे रही है. किफायती स्मार्टफोन, ईयरबड्स और एक्सेसरीज पर धमाकेदार डील्स स्मार्टफोन सेगमेंट में एंट्री-लेवल से लेकर फ्लैगशिप डिवाइसेस तक पर बेहतरीन ऑफर्स मौजूद हैं. सेल में 4G स्मार्टफोन्स की शुरुआती कीमत ₹10,999 रखी गई है, जबकि 5G कनेक्टिविटी वाले स्मार्टफोन्स ₹13,999 की शुरुआती कीमत में खरीदे जा सकते हैं. प्रीमियम स्मार्टफोन्स पर ₹10,000 तक का एक्सचेंज बोनस और 30 महीने तक की नो-कॉस्ट EMI का विकल्प दिया जा रहा है. अगर आप हेडफोन, ईयरबड्स या ब्लूटूथ स्पीकर्स जैसी एक्सेसरीज खरीदना चाहते हैं, तो UPI से पेमेंट करने पर 10 फीसदी की अतिरिक्त छूट पा सकते हैं. 65-इंच 4K टीवी और होम अप्लायंसेज पर आधी से ज्यादा छूट बड़े स्क्रीन वाले स्मार्ट टीवी के शौकीनों के लिए यह सेल बेहद खास रहने वाली है. रिलायंस डिजिटल पर 65 इंच का शानदार 4K UHD गूगल टीवी अब महज ₹39,990 की शुरुआती कीमत पर उपलब्ध कराया गया है. इसके अलावा, होम अप्लायंसेज में साइड-बाय-साइड रेफ्रिजरेटर ₹39,990 और एडवांस्ड वॉशर-ड्रायर ₹55,990 से शुरू हो रहे हैं. एक अन्य प्रीमियम ऑफर के तहत ₹50,000 या उससे ज्यादा की खरीदारी करने वाले ग्राहकों को ₹43,900 का डायसन बिग बॉल वैक्यूम क्लीनर सिर्फ ₹13,900 में लेने का अवसर मिल रहा है. लैपटॉप पर 3 साल की वारंटी और भारी एक्सचेंज बेनिफिट वर्किंग प्रोफेशन्ल्स और स्टूडेंट्स के लिए लैपटॉप्स की रेंज ₹39,999 से शुरू होती है. सेल के दौरान लैपटॉप खरीदने पर तीन साल तक की ब्रांड वारंटी के साथ-साथ पुरानी डिवाइस के बदले ₹5,000 तक का अतिरिक्त एक्सचेंज बेनिफिट दिया जा रहा है. इन सभी डील्स और ऑफर्स का लाभ देशभर के रिलायंस डिजिटल स्टोर्स, माय जियो स्टोर्स और आधिकारिक वेबसाइट से ऑनलाइन शॉपिंग करके उठाया जा सकता है. ये भी पढ़ें: Google Pixel 11 सीरीज खरीदने के लिए कौन सा देश सबसे सस्ता? हिंदुस्तान, अमेरिका, जापान और UK की कीमत देखें The post स्वतंत्रता दिवस पर रिलायंस डिजिटल लाया डिस्को सेल; स्मार्टफोन्स, टीवी और लैपटॉप्स पर तगड़ी छूट, जानें ऑफर्स appeared first on Naya Vichar.

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दुनिया जब दो ध्रुवों में बंट रही थी, भारत ने चुनी अपनी राह: Cold War ने कैसे बदली भारत की विदेश नीति?

India during cold war : 15 अगस्त 1947 – दिल्ली में आधी रात का वक्त था. सदियों की गुलामी के बाद हिंदुस्तान स्वतंत्र होने जा रहा था. लेकिन उस रात दुनिया सिर्फ हिंदुस्तान की आजादी नहीं देख रही थी. अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व भी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जिसने अगले चार दशकों का इतिहास लिखना था. द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म हुए अभी दो साल ही हुए थे. नाजी जर्मनी हार चुका था, लेकिन युद्ध के बाद के सहयोगी अब एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन रहे थे. अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में सामने आ चुके थे. यूरोप में तनाव बढ़ रहा था, परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू हो चुकी थी और दुनिया धीरे-धीरे दो शक्ति-गुटों में बंट रही थी. इसी वह वक्त था जब हिंदुस्तान ने आजादी हासिल की. सवाल सिर्फ यह नहीं था कि हिंदुस्तान अपने देश को कैसे संभालेगा. सवाल यह भी था कि नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हिंदुस्तान किस तरफ खड़ा होगा? उस समय इसका जवाब आसान नहीं था. एक ओर अमेरिका था, जिसके पास विशाल आर्थिक और सैन्य ताकत थी. दूसरी ओर सोवियत संघ था, जो समाजवादी व्यवस्था के साथ दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था. हिंदुस्तान ने दोनों में से किसी एक को नहीं चुना. यही फैसला आगे चलकर हिंदुस्तानीय विदेश नीति की सबसे चर्चित पहचान बना. आजादी के बाद पहला बड़ा फैसला जवाहरलाल नेहरू के सामने विदेश नीति की चुनौती असाधारण थी. हिंदुस्तान अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से निकला था. देश का विभाजन हो चुका था, लाखों लोग विस्थापित हुए थे और वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर थी. ऐसे में किसी सैन्य गुट में शामिल होकर महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा बनना हिंदुस्तान के लिए कितना फायदेमंद होता, यह बड़ा सवाल था. नेहरू का जवाब था – हिंदुस्तान को अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए. 14-15 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में नेहरू ने कहा था: “At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom.” यह सिर्फ एक यादगार पंक्ति नहीं थी. उसी भाषण में नेहरू ने आजादी को हिंदुस्तान की सीमाओं से आगे मानवता की सेवा से जोड़ा था. स्वतंत्र हिंदुस्तान को वह ऐसी भूमिका में देख रहे थे, जहां उसकी आजादी का मतलब दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ जिम्मेदारी से जुड़ना था. यही सोच कुछ ही वर्षों में हिंदुस्तान की विदेश नीति में साफ दिखाई देने लगी. दुनिया दो हिस्सों में बंट रही थी Cold War (शीत युद्ध) को सिर्फ अमेरिका बनाम सोवियत संघ कहना अधूरा होगा. असल में यह दो अलग नेतृत्वक और आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच वैश्विक प्रतिस्पर्धा थी. अमेरिका पश्चिमी देशों के साथ अपना प्रभाव बढ़ा रहा था. सोवियत संघ पूर्वी यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा था. NATO जैसे सैन्य गठबंधन बने. बाद में वारसा पैक्ट (Warsaw Pact) भी अस्तित्व में आया. एशिया और अफ्रीका के लिए यह परिस्थिति और कठिन थी. इन महाद्वीपों के कई देश औपनिवेशिक शासन से निकल रहे थे. उन्हें विकास के लिए आर्थिक मदद चाहिए थी और सुरक्षा के लिए सैन्य सहयोग भी. लेकिन इसके साथ एक खतरा भी था – कहीं नई आजादी किसी नए शक्ति-गुट की निर्भरता में न बदल जाए. हिंदुस्तान इसी समस्या का अपना समाधान तलाश रहा था. गुट निरपेक्ष का विचार हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) नीति का अर्थ यह नहीं था कि वह अमेरिका और सोवियत संघ से संबंध नहीं रखेगा. बल्कि उल्टा हिंदुस्तान दोनों से संबंध रखना चाहता था, लेकिन किसी सैन्य गुट में शामिल होकर अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता नहीं खोना चाहता था. विदेश मंत्रालय के अनुसार, Non-Alignment की हिंदुस्तानीय सोच का मूल उद्देश्य स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता को बनाए रखना था. इस नीति की जड़ें हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन में भी देखी जा सकती हैं. औपनिवेशिक शासन का अनुभव कर चुके हिंदुस्तान के लिए विदेश नीति की स्वतंत्रता सिर्फ रणनीतिक मुद्दा नहीं थी; यह नेतृत्वक स्वतंत्रता का विस्तार भी थी. यही कारण था कि हिंदुस्तान ने Cold War को केवल दो महाशक्तियों के बीच चुनाव के रूप में देखने से इनकार कर दिया. बांडुंग से बेलग्रेड तक  हिंदुस्तान अकेला नहीं था, एशिया और अफ्रीका के दूसरे देश जिन्हें 1947 के आसपास ही आजादी मिली थी, वे भी चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व में उनकी अपनी आवाज हो. अप्रैल 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग में 29 एशियाई और अफ्रीकी देशों का सम्मेलन हुआ. यह सम्मेलन Cold War के दोनों ध्रुवों से अलग एक तीसरी नेतृत्वक आवाज के उभरने का महत्वपूर्ण पड़ाव बना. बांडुंग (Bandung) में उपनिवेशवाद के विरोध, नस्लीय भेदभाव, आर्थिक विकास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया. इसके बाद सितंबर 1961 में युगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला Non-Aligned सम्मेलन हुआ. हिंदुस्तान, युगोस्लाविया, इजिप्ट, इंडोनेशिया और घाना सहित 25 देशों ने इसमें हिस्सा लिया. यहीं गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के रूप में सामने आया. इसलिए 1947 और 1961 के बीच का अंतर समझना जरूरी है. हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष नीति पहले से विकसित हो रही थी, जबकि NAM 1961 में औपचारिक रूप से स्थापित हुआ. लेकिन दुनिया इतनी सरल नहीं थी Non-Alignment के बावजूद हिंदुस्तान और सोवियत संघ के संबंध लगातार मजबूत होते गए. इसके पीछे कई कारण थे. हिंदुस्तान को औद्योगिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर तकनीकी और आर्थिक सहयोग चाहिए था. रक्षा क्षेत्र में भी उसे हथियार और तकनीक की जरूरत थी. दूसरी ओर पाकिस्तान का अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध मजबूत हो रहा था. फिर 1962 में चीन के साथ हिंदुस्तान का युद्ध हुआ. इन घटनाओं ने हिंदुस्तान की सुरक्षा चिंताओं को बदल दिया. सोवियत संघ हिंदुस्तान के लिए तेजी से महत्वपूर्ण साझेदार बनने लगा. लेकिन हिंदुस्तान को सोवियत कैंप का हिस्सा कहना फिर भी सही नहीं होगा. हिंदुस्तान ने अमेरिका से भी संबंध बनाए रखे. अमेरिकी सहायता हिंदुस्तान की खाद्य सुरक्षा और विकास के कई दौर में महत्वपूर्ण रही. वहीं सोवियत संघ के साथ भारी उद्योग, रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा. यानी हिंदुस्तान की नीति साफ थी- जहां से देश को फायदा मिले, वहां सहयोग करो, लेकिन विदेश नीति से जुड़े बड़े फैसलों

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दुनिया जब दो ध्रुवों में बंट रही थी, भारत ने चुनी अपनी राह: Cold War ने कैसे बदली भारत की विदेश नीति?

India during cold war : 15 अगस्त 1947 – दिल्ली में आधी रात का वक्त था. सदियों की गुलामी के बाद हिंदुस्तान स्वतंत्र होने जा रहा था. लेकिन उस रात दुनिया सिर्फ हिंदुस्तान की आजादी नहीं देख रही थी. अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व भी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जिसने अगले चार दशकों का इतिहास लिखना था. द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म हुए अभी दो साल ही हुए थे. नाजी जर्मनी हार चुका था, लेकिन युद्ध के बाद के सहयोगी अब एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन रहे थे. अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के रूप में सामने आ चुके थे. यूरोप में तनाव बढ़ रहा था, परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू हो चुकी थी और दुनिया धीरे-धीरे दो शक्ति-गुटों में बंट रही थी. इसी वह वक्त था जब हिंदुस्तान ने आजादी हासिल की. सवाल सिर्फ यह नहीं था कि हिंदुस्तान अपने देश को कैसे संभालेगा. सवाल यह भी था कि नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हिंदुस्तान किस तरफ खड़ा होगा? उस समय इसका जवाब आसान नहीं था. एक ओर अमेरिका था, जिसके पास विशाल आर्थिक और सैन्य ताकत थी. दूसरी ओर सोवियत संघ था, जो समाजवादी व्यवस्था के साथ दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था. हिंदुस्तान ने दोनों में से किसी एक को नहीं चुना. यही फैसला आगे चलकर हिंदुस्तानीय विदेश नीति की सबसे चर्चित पहचान बना. आजादी के बाद पहला बड़ा फैसला जवाहरलाल नेहरू के सामने विदेश नीति की चुनौती असाधारण थी. हिंदुस्तान अभी-अभी औपनिवेशिक शासन से निकला था. देश का विभाजन हो चुका था, लाखों लोग विस्थापित हुए थे और वित्तीय स्थिति बेहद कमजोर थी. ऐसे में किसी सैन्य गुट में शामिल होकर महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा बनना हिंदुस्तान के लिए कितना फायदेमंद होता, यह बड़ा सवाल था. नेहरू का जवाब था – हिंदुस्तान को अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए. 14-15 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में नेहरू ने कहा था: “At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom.” यह सिर्फ एक यादगार पंक्ति नहीं थी. उसी भाषण में नेहरू ने आजादी को हिंदुस्तान की सीमाओं से आगे मानवता की सेवा से जोड़ा था. स्वतंत्र हिंदुस्तान को वह ऐसी भूमिका में देख रहे थे, जहां उसकी आजादी का मतलब दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ जिम्मेदारी से जुड़ना था. यही सोच कुछ ही वर्षों में हिंदुस्तान की विदेश नीति में साफ दिखाई देने लगी. दुनिया दो हिस्सों में बंट रही थी Cold War (शीत युद्ध) को सिर्फ अमेरिका बनाम सोवियत संघ कहना अधूरा होगा. असल में यह दो अलग नेतृत्वक और आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच वैश्विक प्रतिस्पर्धा थी. अमेरिका पश्चिमी देशों के साथ अपना प्रभाव बढ़ा रहा था. सोवियत संघ पूर्वी यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा था. NATO जैसे सैन्य गठबंधन बने. बाद में वारसा पैक्ट (Warsaw Pact) भी अस्तित्व में आया. एशिया और अफ्रीका के लिए यह परिस्थिति और कठिन थी. इन महाद्वीपों के कई देश औपनिवेशिक शासन से निकल रहे थे. उन्हें विकास के लिए आर्थिक मदद चाहिए थी और सुरक्षा के लिए सैन्य सहयोग भी. लेकिन इसके साथ एक खतरा भी था – कहीं नई आजादी किसी नए शक्ति-गुट की निर्भरता में न बदल जाए. हिंदुस्तान इसी समस्या का अपना समाधान तलाश रहा था. गुट निरपेक्ष का विचार हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) नीति का अर्थ यह नहीं था कि वह अमेरिका और सोवियत संघ से संबंध नहीं रखेगा. बल्कि उल्टा हिंदुस्तान दोनों से संबंध रखना चाहता था, लेकिन किसी सैन्य गुट में शामिल होकर अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता नहीं खोना चाहता था. विदेश मंत्रालय के अनुसार, Non-Alignment की हिंदुस्तानीय सोच का मूल उद्देश्य स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता को बनाए रखना था. इस नीति की जड़ें हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन में भी देखी जा सकती हैं. औपनिवेशिक शासन का अनुभव कर चुके हिंदुस्तान के लिए विदेश नीति की स्वतंत्रता सिर्फ रणनीतिक मुद्दा नहीं थी; यह नेतृत्वक स्वतंत्रता का विस्तार भी थी. यही कारण था कि हिंदुस्तान ने Cold War को केवल दो महाशक्तियों के बीच चुनाव के रूप में देखने से इनकार कर दिया. बांडुंग से बेलग्रेड तक  हिंदुस्तान अकेला नहीं था, एशिया और अफ्रीका के दूसरे देश जिन्हें 1947 के आसपास ही आजादी मिली थी, वे भी चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व में उनकी अपनी आवाज हो. अप्रैल 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग में 29 एशियाई और अफ्रीकी देशों का सम्मेलन हुआ. यह सम्मेलन Cold War के दोनों ध्रुवों से अलग एक तीसरी नेतृत्वक आवाज के उभरने का महत्वपूर्ण पड़ाव बना. बांडुंग (Bandung) में उपनिवेशवाद के विरोध, नस्लीय भेदभाव, आर्थिक विकास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया. इसके बाद सितंबर 1961 में युगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला Non-Aligned सम्मेलन हुआ. हिंदुस्तान, युगोस्लाविया, इजिप्ट, इंडोनेशिया और घाना सहित 25 देशों ने इसमें हिस्सा लिया. यहीं गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के रूप में सामने आया. इसलिए 1947 और 1961 के बीच का अंतर समझना जरूरी है. हिंदुस्तान की गुटनिरपेक्ष नीति पहले से विकसित हो रही थी, जबकि NAM 1961 में औपचारिक रूप से स्थापित हुआ. लेकिन दुनिया इतनी सरल नहीं थी Non-Alignment के बावजूद हिंदुस्तान और सोवियत संघ के संबंध लगातार मजबूत होते गए. इसके पीछे कई कारण थे. हिंदुस्तान को औद्योगिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर तकनीकी और आर्थिक सहयोग चाहिए था. रक्षा क्षेत्र में भी उसे हथियार और तकनीक की जरूरत थी. दूसरी ओर पाकिस्तान का अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध मजबूत हो रहा था. फिर 1962 में चीन के साथ हिंदुस्तान का युद्ध हुआ. इन घटनाओं ने हिंदुस्तान की सुरक्षा चिंताओं को बदल दिया. सोवियत संघ हिंदुस्तान के लिए तेजी से महत्वपूर्ण साझेदार बनने लगा. लेकिन हिंदुस्तान को सोवियत कैंप का हिस्सा कहना फिर भी सही नहीं होगा. हिंदुस्तान ने अमेरिका से भी संबंध बनाए रखे. अमेरिकी सहायता हिंदुस्तान की खाद्य सुरक्षा और विकास के कई दौर में महत्वपूर्ण रही. वहीं सोवियत संघ के साथ भारी उद्योग, रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ा. यानी हिंदुस्तान की नीति साफ थी- जहां से देश को फायदा मिले, वहां सहयोग करो, लेकिन विदेश नीति से जुड़े बड़े फैसलों

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7.7 तीव्रता के भूकंप से दहला इंडोनेशिया, सुनामी का अलर्ट; घरों और इमारतों को नुकसान

इंडोनेशिया के फ्लोरेस क्षेत्र में शनिवार सुबह आए 7.7 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने लोगों में दहशत पैदा कर दी. भूकंप के झटकों से कई घरों और दूसरी इमारतों को नुकसान पहुंचा, जिसके बाद देश के कई तटीय इलाकों में सुनामी की चेतावनी जारी कर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा गया. शुरुआती जानकारी के मुताबिक अभी तक किसी के मारे जाने की समाचार नहीं है. सुबह-सुबह आया 7.7 तीव्रता का भूकंप अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार, भूकंप स्थानीय समयानुसार सुबह 5:58 बजे आया. इसकी तीव्रता 7.7 मापी गई और भूकंप का केंद्र जमीन से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था. भूकंप का केंद्र इंडोनेशिया के पूर्वी नुसा तेंगारा प्रांत में आने वाले एंडे शहर से करीब 68 किलोमीटर उत्तर-उत्तर-पश्चिम में स्थित था. इसका असर फ्लोरेस द्वीप के बड़े हिस्से में महसूस किया गया. मुख्य भूकंप के बाद कई झटके और आफ्टरशॉक्स भी महसूस किए गए, जिससे लोगों की चिंता और बढ़ गई. चार प्रांतों में सुनामी की चेतावनी भूकंप के बाद इंडोनेशिया की मौसम विज्ञान, जलवायु विज्ञान और भूभौतिकी एजेंसी ने कई तटीय क्षेत्रों के लिए सुनामी चेतावनी जारी की. इसमें पूर्वी नुसा तेंगारा, पश्चिमी नुसा तेंगारा, दक्षिण सुलावेसी और दक्षिण-पूर्वी सुलावेसी प्रांत शामिल हैं. प्रशासन ने प्रभावित तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों से समुद्र तटों और नदी के किनारों से दूर रहने तथा सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर चले जाने की अपील की. कई इमारतों को नुकसान, लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागे फ्लोरेस द्वीप पर भूकंप के झटकों के बाद कई जगहों से घरों और सार्वजनिक सुविधाओं को नुकसान पहुंचने की शुरुआती जानकारी सामने आई. हालांकि, अधिकारियों ने तत्काल यह नहीं बताया कि कुल कितनी इमारतें क्षतिग्रस्त हुई हैं. भूकंप के बाद स्थानीय लोगों में काफी डर देखा गया और संभावित सुनामी से बचने के लिए कई लोग तटीय इलाकों से दूर चले गए. इंडोनेशिया में भूकंप का खतरा क्यों ज्यादा? करीब 17,000 से अधिक द्वीपों वाले इंडोनेशिया दुनिया के सबसे अधिक भूकंप और ज्वालामुखी प्रभावित देशों में शामिल है. इसकी एक बड़ी वजह इस देश की भौगोलिक स्थिति है. इंडोनेशिया प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में स्थित है. यह ऐसा इलाका है जहां बड़ी संख्या में ज्वालामुखी और सक्रिय भूगर्भीय भ्रंश रेखाएं मौजूद हैं. इसी वजह से यहां लगातार भूकंपीय गतिविधियां और ज्वालामुखी विस्फोट होते रहते हैं. ये भी पढ़ें:- चीन में सोशल सिक्योरिटी भुगतान पर सख्ती, कंपनियों पर बढ़ा दबाव; टैक्स-पेरोल डेटा से हो रही जांच 1992 में फ्लोरेस में आई सुनामी ने मचाई थी भारी तबाही फ्लोरेस क्षेत्र के लिए शनिवार का भूकंप इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाला था क्योंकि इस इलाके में पहले भी विनाशकारी भूकंप और सुनामी आ चुकी है. दिसंबर 1992 में फ्लोरेस के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में करीब 7.0 तीव्रता का भूकंप आया था. इसके बाद उठी सुनामी ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी और करीब 2,500 लोगों की मौत हुई थी. ऐसे में शनिवार को आए 7.7 तीव्रता के भूकंप के बाद सुनामी की चेतावनी ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी. उथले भूकंप सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूकंप धरती की सतह से करीब 700 किलोमीटर नीचे तक आ सकते हैं. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, भूकंप की गहराई को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जाता है- उथले (शैलो), मध्यम गहराई वाले (इंटरमीडिएट) और गहरे (डीप) भूकंप. इनमें उथले भूकंप ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं. इसकी वजह यह है कि इनसे निकलने वाली भूकंपीय तरंगों को धरती की सतह तक पहुंचने के लिए कम दूरी तय करनी पड़ती है. इसलिए सतह पर झटके ज्यादा तेज महसूस हो सकते हैं. तेज झटकों के कारण इमारतों और अन्य ढांचों को ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है. इसके अलावा, जान-माल के नुकसान का खतरा भी बढ़ जाता है. इसके मुकाबले गहरे भूकंपों की तरंगों को सतह तक पहुंचने में ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे कई बार सतह पर झटकों का असर अपेक्षाकृत कम हो सकता है. ये भी पढ़ें:- PoJK में क्यों भड़का पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा? मुजफ्फराबाद से हाजिरा तक सड़कों पर उतरी जनता The post 7.7 तीव्रता के भूकंप से दहला इंडोनेशिया, सुनामी का अलर्ट; घरों और इमारतों को नुकसान appeared first on Naya Vichar.

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