भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया जाना क्या कानूनी था?
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10–11 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने हजारों प्रदर्शनकारियों, छात्र नेताओं, पत्रकारों, वकीलों, नेतृत्वक दलों के नेताओं और यहां तक कि प्रदर्शन में शामिल नहीं रहे लोगों को भी हिरासत में ले लिया. मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision, SIR) में कथित अनियमितताओं के विरोध में प्रदर्शन होना था. इसे रोकने के लिए सुरक्षा बलों ने राष्ट्रीय राजधानी के कई हिस्सों में आवाजाही और सार्वजनिक गतिविधियों पर कड़ी पाबंदियां लगा दी थीं. हालांकि, हिरासत में लेने की कार्रवाई केवल प्रदर्शन स्थल के आसपास मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रही. यूट्यूबर ध्रुव राठी और स्वतंत्र पत्रकार हर्ष यादव समेत कई लोगों को प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही उनके घरों और होटलों से उठा लिया गया. व्यंग्यात्मक नेतृत्वक समूह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं को दिल्ली पहुंचने पर विमान के भीतर से ही हिरासत में ले लिया गया. इसके बाद से संयुक्त राष्ट्र, वकीलों और पत्रकार संगठनों ने दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई की आलोचना की है. पत्रकार सुरक्षा समिति (Committee for the Protection of Journalists, CPJ) और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (Reporters Without Borders, RSF) जैसे अधिकार संगठनों ने प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने, परेशान किए जाने और रिपोर्टिंग से रोके जाने की करीब 40 घटनाएं दर्ज की हैं. 28 वर्षीय पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा को 11 अक्टूबर को प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते समय हिरासत में लिया गया था. फोटो: Asian Dispatch/उल्टा चश्मा (uc) 11 अक्टूबर को हिंदुस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने भी विशेष सुनवाई की. वकीलों के संगठनों ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की थी. आरोप था कि पुलिस ने न्यायालय के उन पूर्व आदेशों का उल्लंघन किया, जिनमें मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, इंटरनेट बंद करने और बड़े पैमाने पर एहतियाती हिरासत से बचने के निर्देश दिए गए थे. न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अपने अंतरिम आदेश में दोहराया कि इंटरनेट सेवाएं बिना किसी बाधा के चालू रहनी चाहिए, किसी को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए और वकीलों तथा पत्रकारों को बिना किसी रुकावट के अपना काम करने दिया जाना चाहिए. रविवार को हुई सुनवाई के बाद 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से संबंधित कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई हैं. इस मामले पर 15 अक्टूबर को सुनवाई होगी. न्यायालय ने दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए तलब किया है. पुलिस एहतियाती कार्रवाई तब कर सकती है, जब उसके पास यह मानने का वास्तविक और उचित आधार हो कि कोई विशेष अपराध या अशांति हो सकती है। लेकिन एहतियाती शक्तियां पुलिस को असीमित अधिकार नहीं देतीं कि वह लोगों को केवल इसलिए हिरासत में ले ले, क्योंकि वे कार्यकर्ता हैं, नेतृत्वक विरोधी हैं या शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के संदेह में हैं। — विकास पाहवा, वरिष्ठ अधिवक्ता कानूनी विशेषज्ञों ने इन हिरासतों को ‘गैरकानूनी‘ बताते हुए दिल्ली पुलिस की उस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई. उनका कहना है कि हिंसा की आशंका को लेकर ‘उचित आशंका‘ का तर्क देकर प्रदर्शनों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता. चलो संसद: हिंदुस्तान में शिक्षा सुधारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों में गुस्सा प्रदर्शन पर रोक: गलत फैसला पूर्व आईपीएस अधिकारी अमोद कंठ ने कहा कि निषेधाज्ञा केवल सीमित परिस्थितियों में और सीमित उच्च-सुरक्षा वाले क्षेत्रों में लागू की जा सकती है. इसके बावजूद इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों के एकत्र होने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा सकता है. संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में कहा गया है कि प्रदर्शन करना और असहमति व्यक्त करना मौलिक अधिकार हैं, हालांकि इन पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. कंठ ने एशियन डिस्पैच से कहा, ‘प्रशासन, कोई भी राज्य या पुलिस इन मौलिक अधिकारों को छीन नहीं सकती.’ संसद के निकट स्थित जंतर-मंतर के संदर्भ में, जिसे अब निर्धारित प्रदर्शन स्थल का दर्जा प्राप्त नहीं है, कंठ ने कहा, ‘प्रदर्शन सत्ता के केंद्र के नजदीक होते हैं, ताकि संसद को पता चल सके कि नागरिकों की शिकायतें क्या हैं.’ सीजेपी के नेताओं ने 2 अक्टूबर को प्रदर्शन की घोषणा की थी. इसके बाद दिल्ली पुलिस ने हिंदुस्तानीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी थी. यह धारा अधिकारियों को उन परिस्थितियों में आदेश जारी करने का अधिकार देती है, जहां ‘इस धारा के तहत कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त आधार हो और तत्काल रोकथाम या शीघ्र उपचार आवश्यक हो.’ हालांकि, पुलिस ने कार्रवाई को इस हद तक बढ़ा दिया कि लोगों को उनके घरों, होटलों, यहां तक कि ट्रेनों और विमानों से भी हिरासत में लिया गया. आपराधिक बचाव के मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने जोर देकर कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए हिरासत में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि अधिकारियों को उसका प्रदर्शन असुविधाजनक लगता है या वे उसके संदेश से सहमत नहीं हैं. उन्होंने बीएनएसएस की धारा 172 का भी उल्लेख किया, जो पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करने से संबंधित है. उन्होंने बताया कि यह धारा पुलिस को ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लेने की अनुमति देती है, जो सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिए गए वैध पुलिस निर्देश का विरोध करता है, उसे मानने से इनकार करता है या उसकी अवहेलना करता है. चिंता की बात यह है कि इस प्रावधान में ‘मामूली मामले’ (petty case) की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है. इससे पुलिस को शुरुआती स्तर पर यह तय करने का काफी विवेकाधिकार मिल जाता है कि किसी व्यक्ति को कब हिरासत में लिया जाए या वहां से हटाया जाए. प्रदर्शनों के संदर्भ में इससे वास्तविक खतरा पैदा होता है कि लोगों को केवल पुलिस के निर्देशों का पालन करने से इनकार करने के कारण हिरासत में लिया जा सकता है, भले ही उनका आचरण सामान्य आपराधिक कानून के तहत गिरफ्तारी को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त न हो. — विकास पाहवा, वरिष्ठ अधिवक्ता इस धारा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है. हालांकि, पाहवा ने

