राजीव पांडेय, रांची
राज्य में स्वाइन फ्लू (एच1एन1 वायरस) से ग्रसित मरीजों की बढ़ती संख्या स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय बन गयी है. विभाग ने राज्य के प्रशासनी और निजी अस्पतालों को सतर्कता बढ़ाने और स्वाइन फ्लू के मरीजों के लिए आइसोलेशन वार्ड तैयार करने के निर्देश दिये हैं. इधर, राज्य में अब तक स्वाइन फ्लू के 36 मरीजों के मिलने की पुष्टि हो चुकी है. इनमें 18 यानी 50 फीसदी किशोर या छोटे शिशु हैं.
दिल्ली समेत पांच राज्यों से लौटे लोगों में संक्रमण की पुष्टि
दिल्ली, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान में स्वाइन फ्लू के मामले ज्यादा हैं. वहां से आनेवाले लोग पहले सामान्य फ्लू से पीड़ित हो रहे हैं. जब उनकी जांच करायी जा रही है, तो उनमें स्वाइन फ्लू के संक्रमण की पुष्टि हो रही है. दिल्ली से आये रिम्स के डॉक्टर को पहले सामान्य फ्लू हुआ था. जब उन्होंने जांच करायी तो उनमें स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई. राहत की बात यह है कि कई मरीज स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं. स्वाइन फ्लू के मरीजों की संख्या की पुष्टि रिम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभाग, एमजीएम कॉलेज जमशेदपुर और रांची स्थित निजी पैथोलॉजी माइक्रोप्रेक्सिस (निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के सैंपल की जांच के आधार पर) हुई है. हालांकि, स्वास्थ्य विभाग को अब तक रिम्स से आठ और एमजीएम कॉलेज से तीन संक्रमितों के ही आंकड़े मिले हैं.
कमजोर इम्युनिटी वाले शिशु-किशोर संक्रमण की चपेट में
दिल्ली और अन्य संक्रमित राज्यों से आये मरीजों में हो रही स्वाइन फ्लू की पुष्टि संदिग्ध मरीज के सैंपल की जांच के लिए विभाग ने रांची में रिम्स और जमशेदपुर में एमजीएम को अधिकृत किया है. रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की वजह से आसानी से संक्रमित हो जाते हैं. नवजात, छोटे शिशु और किशोर 31 अगस्त तक 30 सैंपल की जांच हुई.
सोमवार को ‘नया विचार’ ने रिम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में संदिग्ध मरीजों के सैंपलों की जांच का आंकड़ा खंगाला. साथ ही विभागाध्यक्ष डॉ मनोज कुमार से स्वाइन फ्लू के फैलाव की वजह और इसके प्रभाव की जानकारी ली. विभागाध्यक्ष ने बताया कि चूंकि नवजात व छोटे बच्चों और किशोरों की रोग प्रतिरोधक (इम्युनिटी) कमजोर होती है. इसलिए वे बड़ी आसानी से किसी भी वायरस की चपेट में जल्दी आ जाते हैं. वहीं, वयस्क लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है, क्योंकि वे पहले भी इस तरह के संक्रमण के चपेट आ चुके होते हैं.
रिम्स में 30 सैंपल में आठ पॉजिटिव
रिम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में 31 अगस्त तक 30 सैंपल की जांच हो चुकी थी. इनमें से आठ पॉजिटिव पाये गये. इनमें से छह संक्रमितों की उम्र आठ वर्ष से 14 वर्ष के बीच है. एक मरीज मेडिसिन ओपीडी में डॉ अजीत डुंगडुंग के परामर्श पर सैंपल देने आये थे. वहीं, एक मरीज क्रिटिकल केयर में डॉ प्रदीप भट्टाचार्या की देखरेख में भर्ती थे, जिनको संदिग्ध पाये जाने पर जांच के लिए सैंपल भेजा गया था. स्वास्थ्य विभाग ने कहा निजी लैब और अस्पताल नहीं दे रहे जानकारी स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि निजी लैब और निजी अस्पताल स्वाइन फ्लू के संक्रमित मरीजों की जानकारी साझा नहीं कर रहे हैं.
ऐसे में संक्रमित मरीजों का सही आंकड़ा नहीं मिल पा रहा है. हालांकि, सभी निजी लैब और अस्पतालों को निर्देश दिया गया है कि वे संक्रमित मरीज की पूरी जानकारी आइडीएसपी को करायें. स्वास्थ्य विभाग ने जिलों को निर्देश दिया है कि अस्पताल में स्वाइन फ्लू के संदिग्ध मरीज मिलें, तो उनके सैंपलों की तत्काल जांच करायी जाये. जरूरत पड़ने पर सैंपलों को रिम्स या एमजीएम दोनों में, जो नजदीक हो वहां के लैब में भेजें.
घबराने की जरूरत नहीं : डॉ मनोज कुमार
रिम्स के डॉ मनोज कुमार, विभागाध्यक्ष, माइक्रोबायोलॉजी ने बताया कि स्वाइन फ्लू भी सामान्य वायरल की तरह ही है. इसमे शरीर का तापमान 104 या 105 हो सकता है, इसलिए ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है. तीन दिनों में वायरस कमजोर पड़ने लगता है और सावधानी बरतने पर स्वतः ठीक हो जाता है. हालाकि, लक्षण के आधार पर बुखार और सर्दी-खासी की दवा लेनी चाहिए.
झारखंड के लोगों के फेफड़े मजबूत हैं: डॉ प्रदीप भट्टाचार्य
झारखंड के लोगों के फेफड़े मजबूत हैं रिम्स के क्रिटिकल केयर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया कि दिल्ली में प्रदूषण ज्यादा है, इसलिए वहां के लोगों के फेफड़े कमजोर हो गये हैं. ऐसे में बदलते मौसम में वहां के लोगों को कोई नया वायरस आसानी से अपनी चपेट में लेता है. वहीं, झारखंड में दिल्ली सहित अन्य महानगरों के मुकाबले प्रदूषण कम है, इसलिए यहां लोगों के फेफड़े तंदुरुस्त है. यही वजह है कि यहां संक्रमण का फैलाव कम है. सावधानी बरतने पर स्थिति नियंत्रित रहेगी.
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