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NDA में चिराग का ‘प्रेशर गेम’, ‘समर्थन है, समर्पण नहीं’ के जरिए क्या साधना चाहते हैं मोदी के हनुमान

NDA Alliance Politics केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान के “बिहार एनडीए प्रशासन का हिस्सा होने पर शर्म आती है” वाले बयान के बाद गठबंधन की नेतृत्व को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं. चिराग के इस बयान को नेतृत्वक जानकार केवल बिहार की कानून-व्यवस्था पर प्रशासन के खिलाफ हमला नहीं मान रहे. उनके मुताबिक, चिराग ने सार्वजनिक तौर पर प्रशासन पर दबाव बनाने के साथ-साथ अपनी पार्टी की लंबित मांगों को लेकर भी एक स्पष्ट नेतृत्वक संदेश देने की कोशिश की है. चिराग पासवान के बयान को इस संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि लोजपा (रामविलास) एनडीए का समर्थन कर रही है, लेकिन गठबंधन में अपने मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं है. यानी सहयोगी दल से समर्थन की उम्मीद की जा सकती है, समर्पण की नहीं.

चौकीदार-दफादार भर्ती समेत कई मांगें लंबित

लोजपा (रामविलास) की कई मांगें लंबे समय से बिहार प्रशासन के स्तर पर लंबित हैं. इनमें चौकीदार और दफादार के पदों पर भर्ती, पार्टी के संस्थापक दिवंगत राम विलास पासवान की प्रतिमा स्थापित करना और पटना की किसी प्रमुख सड़क का नाम उनके नाम पर करना जैसी मांगें शामिल हैं. पार्टी नेताओं का कहना है कि इन मांगों को लेकर वरिष्ठ नेताओं की ओर से प्रशासन को कई बार पत्र भी लिखा गया है. लेकिन करीब नौ महीने बीतने के बाद भी इन पर ठोस पहल नहीं हुई है. पार्टी नेताओं के मुताबिक, प्रशासन की ओर से लगातार मामले को देखने और कार्रवाई का आश्वासन दिया जा रहा है.

ऐसे में चिराग पासवान का कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर प्रशासन के खिलाफ खुलकर बोलना अपनी लंबित मांगों को लेकर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. पार्टी के भीतर इसे इस संदेश से जोड़कर देखा जा रहा है कि लोजपा (रामविलास) एनडीए में है, प्रशासन का समर्थन करती है, लेकिन अपनी नेतृत्वक जमीन और समर्थकों से जुड़े मुद्दों पर पीछे हटने को तैयार नहीं है.

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चौकीदार-दफादार भर्ती पर क्यों अड़ी है लोजपा (आर)?

चौकीदार और दफादार के पदों पर भर्ती का मुद्दा लोजपा (रामविलास) के लिए खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है. पार्टी से जुड़े नेताओं का दावा है कि इन पदों पर भर्ती की मांग करने वालों में बड़ी संख्या उसके समर्थकों की है. लंबे समय से पार्टी का समर्थन करने वाले इन लोगों के बीच अब नाराजगी बढ़ रही है. पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रशासन में रहने के बावजूद यदि उनकी मांग पूरी नहीं होती है, तो इसका असर पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है. कुछ समर्थकों की नाराजगी इस बात को लेकर भी सामने आ रही है कि वे लगातार पार्टी के साथ खड़े रहे, लेकिन उनकी मांग पूरी नहीं हो रही है.बिहार की नेतृत्व में पासवान समुदाय को लोजपा (रामविलास) का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है. ऐसे में पार्टी इस मुद्दे पर कोई नेतृत्वक समझौता करने के बजाय प्रशासन पर दबाव बढ़ाना चाहती है. इसी रणनीति के तहत चिराग का कानून-व्यवस्था के सवाल पर मुखर होना भी देखा जा रहा है.

स्त्रीओं की सुरक्षा पर प्रशासन को घेरा

चिराग पासवान ने एक प्राइवेट यूट्यूब चैनल के साथ बातचीत में बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर प्रशासन पर तीखा हमला किया. उन्होंने कहा कि स्त्रीएं अब घर से बाहर निकलने में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं. उनकी यह टिप्पणी जमुई और समस्तीपुर में स्त्रीओं से जुड़ी घटनाओं के सामने आने के बाद आयी. इन घटनाओं को लेकर प्रशासन की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठे हैं. चिराग के हमले ने एनडीए के भीतर इस मुद्दे को और नेतृत्वक बना दिया है. लोजपा (रामविलास) के पास लोकसभा में पांच सांसद हैं, जबकि बिहार विधानसभा में पार्टी के 19 विधायक हैं. ऐसे में चिराग के बयान को केवल एक सहयोगी दल के नेता की नाराजगी के तौर पर नहीं देखा जा रहा है.

NDA में रहते हुए अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश

चिराग पासवान एनडीए में रहते हुए इससे पहले भी कई मौकों पर अपनी ही प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं. भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में भी उन्होंने बिहार की सम्राट चौधरी प्रशासन पर तीखा हमला बोला था. इससे साफ है कि एनडीए में रहते हुए चिराग अपनी नेतृत्वक पहचान को अलग बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. नेतृत्वक जानकारों का मानना है कि गठबंधन के भीतर रहते हुए प्रशासन की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठाना चिराग की नेतृत्व का हिस्सा रहा है. इससे उन्हें अपनी पार्टी के समर्थकों के बीच अलग नेतृत्वक पहचान बनाए रखने में मदद मिलती है. साथ ही, उन राज्यों में सीटों और नेतृत्वक हिस्सेदारी को लेकर बातचीत की गुंजाइश भी बढ़ती है, जहां भाजपा को सहयोगियों की जरूरत पड़ सकती है.

2020 में NDA से अलग होकर चुनाव लड़ चुके हैं चिराग

चिराग पासवान की नेतृत्व में एनडीए के भीतर रहते हुए अलग रुख अपनाने का इतिहास पुराना है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था. उस समय लोजपा ने मुख्य रूप से नीतीश कुमार की जदयू को निशाना बनाया था. हालांकि लोजपा को उस चुनाव में केवल एक सीट पर जीत मिली, लेकिन पार्टी के अलग चुनाव लड़ने से जदयू को कई सीटों पर नुकसान हुआ. इससे यह भी सामने आया कि चिराग अपने दम पर बिहार के चुनावी समीकरण को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.

पार्टी में टूट के बाद भी चिराग अपने पिता राम विलास पासवान के पारंपरिक पासवान वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखने में सफल रहे. इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में साफ दिखाई दिया, जब लोजपा (रामविलास) ने एनडीए के साथ रहते हुए अपने हिस्से की सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज की. इसके बाद से चिराग लगातार अपनी अलग नेतृत्वक पहचान बनाए रखने की कोशिश करते रहे हैं. केंद्र की सिविल सेवाओं में लेटरल एंट्री की नीति के कुछ पहलुओं पर उन्होंने आपत्ति जतायी, जाति जनगणना को लेकर सवाल उठाये और बिहार में शासन-व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी ही प्रशासन के खिलाफ आवाज उठायी.

चिराग की नेतृत्व का क्या है बड़ा प्लान?

ऐसे में बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर चिराग पासवान का मौजूदा हमला केवल किसी एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं माना जा सकता. इसके पीछे एनडीए प्रशासन में अपनी पार्टी की हिस्सेदारी और प्रभाव बनाए रखने के साथ-साथ अपने पारंपरिक वोट बैंक को संदेश देने की रणनीति भी दिखाई देती है. साथ ही, बिहार से बाहर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लोजपा (रामविलास) के विस्तार की तैयारी भी चिराग की इस नेतृत्व का एक अहम हिस्सा हो सकती है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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