Hot News

दवा नहीं सांसों का सौदा: झारखंड में ब्रांडेड के चक्कर में जेब हो रही खाली, जनऔषधि में 90 प्रतिशत तक सस्ती दवाएं

रांची : कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में लगने वाले भारी-भरकम खर्च के बीच मरीजों के लिए बड़ी राहत का विकल्प मौजूद है, लेकिन जागरूकता की कमी और प्रशासनिक लचर व्यवस्था के कारण मरीज इसका पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं. ‘नया विचार’ की खास पड़ताल में यह बात सामने आई है कि ‘प्रधानमंत्री हिंदुस्तानीय जनऔषधि परियोजना’ के तहत कैंसर की दवाएं नामी ब्रांडेड कंपनियों की तुलना में 50 से 90 प्रतिशत तक सस्ती मिलती हैं. हालांकि, झारखंड के रिम्स (RIMS) समेत तमाम जनऔषधि केंद्रों पर इन दवाओं की नियमित सप्लाई न होने से मजबूरन मरीजों की जेब पर डाका पड़ रहा है.

कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर

नया विचार द्वारा की गई पड़ताल के अनुसार, कैंसर की दवाओं की कीमतों में चौंकाने वाला अंतर देखा गया है. ब्रेन ट्यूमर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक प्रमुख दवा की कीमत ब्रांडेड कंपनियों में जहां 20,693 रुपये है, वहीं जनऔषधि केंद्र पर यह दवा मात्र 2,517.19 रुपये में उपलब्ध है. इसी प्रकार स्तन कैंसर (Breast Cancer) के इलाज में प्रयुक्त होने वाली लेस्ट्रोजोल (Letrozole 2.5mg) की 10 गोलियों की कीमत ब्रांडेड बाजार में 313 रुपये से अधिक है, जबकि जनऔषधि केंद्र पर यह महज 31.88 रुपये में मिल जाती है. इसके बावजूद केंद्रों पर स्टॉक न होने से गरीब मरीज महंगे दामों पर दवाएं खरीदने को मजबूर हैं.

ये भी पढ़ें: Jharkhand Weather: 4 अक्टूबर को 24 जिलों में कैसा रहेगा मौसम, रांची समेत जानें अपने जिले का हाल

रिम्स जनऔषधि केंद्र पर सप्लाई ठप, स्टॉकिस्ट ने बयां किया दर्द

राजधानी रांची स्थित रिम्स (RIMS) के जनऔषधि केंद्र के स्टॉकिस्ट का कहना है कि काफी समय पहले कैंसर की एकाध दवाएं आई थीं, जिसके बाद से उनकी नियमित उपलब्धता बंद हो गई. सप्लाई नहीं मिलने के कारण कैंसर मरीजों और उनके परिजनों ने केंद्र का चक्कर काटना ही छोड़ दिया है. राज्य भर में लगभग 110 जनऔषधि केंद्र संचालित हैं, लेकिन मांग के अनुरूप लाइफ-सेविंग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं का कोटा नहीं मिलने से इस महत्वाकांक्षी प्रशासनी योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो रहा है.

डॉक्टरों पर ब्रांडेड दवा लिखने का दबाव

दवाओं की अनुपलब्धता के अलावा एक बड़ी समस्या डॉक्टरों की मानसिकता भी है. मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि जब वे डॉक्टरों से जेनेरिक या जनऔषधि की दवाएं लिखने का अनुरोध करते हैं, तो डॉक्टर भड़क जाते हैं. परिजनों के अनुसार, कई डॉक्टर यह कहकर डरा देते हैं कि “जनऔषधि में कैंसर की गुणवत्तापूर्ण दवाएं नहीं मिलतीं, सस्ते के चक्कर में न पड़ें, यदि मरीज की स्थिति बिगड़ी तो पूरी जिम्मेदारी आपकी होगी.” इस तरह के दबाव के कारण मरीज महंगे ब्रांडेड सॉल्ट खरीदने को मजबूर हो जाते हैं.

विशेषज्ञों की राय: केंद्रों की संख्या और नियमित कोटा बढ़ाना जरूरी

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि जब तक झारखंड में जनऔषधि केंद्रों की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी और सीधे केंद्र प्रशासन के फार्मास्युटिकल विभाग से कैंसर दवाओं का नियमित कोटा निर्धारित नहीं होगा, तब तक इस समस्या का स्थाई समाधान संभव नहीं है. यदि रिम्स, एमजीएम और अन्य बड़े मेडिकल कॉलेजों के जनऔषधि केंद्रों पर कैंसर की दवाओं की 24×7 उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, तो राज्य के लाखों गरीब व मध्यमवर्गीय कैंसर पीड़ितों को हर महीने हजारों रुपये की सीधी बचत हो सकती है.

ये भी पढ़ें: नया विचार स्टिंग ऑपरेशन : झारखंड के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में कैंसर मरीजों से लूट, दवाइयों पर 4 गुना वसूली

The post दवा नहीं सांसों का सौदा: झारखंड में ब्रांडेड के चक्कर में जेब हो रही खाली, जनऔषधि में 90 प्रतिशत तक सस्ती दवाएं appeared first on Naya Vichar.

Spread the love

विनोद झा
संपादक नया विचार

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

About Us

नयाविचार एक आधुनिक न्यूज़ पोर्टल है, जो निष्पक्ष, सटीक और प्रासंगिक समाचारों को प्रस्तुत करने के लिए समर्पित है। यहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, तकनीक, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। नयाविचार का उद्देश्य पाठकों को विश्वसनीय और गहन जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

Quick Links

Who Are We

Our Mission

Awards

Experience

Success Story

© 2025 Developed By Socify

Scroll to Top