Bihar Political Analysis जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने मोकामा विधायक अनंत सिंह को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है. इस फैसले के बाद उनके समर्थकों ने जमकर जश्न मनाया. वहीं, बिहार की नेतृत्व में इस कार्रवाई के सियासी मायने तलाशे जाने लगे हैं. सवाल उठने लगा है कि क्या अनंत सिंह पर कार्रवाई से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के परंपरागत सवर्ण वोट बैंक में दरार पड़ सकती है? जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं की लगातार हो रही बैठकों ने भी इन चर्चाओं को हवा दी है.
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब पटना में बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में भूमिहार समाज के बड़ी संख्या में लोग जुटे. भूमिहार समाज को लंबे समय से एनडीए का परंपरागत समर्थक माना जाता रहा है. हालांकि, देवेश कुमार के बाद अनंत सिंह के खिलाफ हुई कार्रवाई ने इस समाज के एक वर्ग में नाराजगी बढ़ा दी है. नया विचार से बातचीत में समाज के कुछ लोगों ने एनडीए के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि एनडीए गठबंधन की नेतृत्व में लोगों का इस्तेमाल कर उन्हें छोड़ दिया जाता है.
बिहार में भूमिहारों की कितनी अहमियत?
बिहार के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में सवर्ण आबादी करीब 15.52 प्रतिशत है. इसमें भूमिहारों की हिस्सेदारी 2.87 प्रतिशत, ब्राह्मणों की 3.65 प्रतिशत, राजपूतों की 3.45 प्रतिशत और कायस्थों की 0.60 प्रतिशत है. संख्या के लिहाज से सवर्ण आबादी भले ही 15 से 16 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन राज्य की नेतृत्व, सामाजिक संरचना और आर्थिक गतिविधियों में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है.
भूमिहार मतदाताओं का प्रभाव मोकामा, मुंगेर, लखीसराय और बेगूसराय जैसे क्षेत्रों में खास तौर पर देखा जाता है. इसके साथ ही कई विधानसभा सीटों पर इनकी भूमिका निर्णायक हो जाती है. यही वजह है कि अनंत सिंह के खिलाफ जेडीयू की कार्रवाई को केवल एक विधायक पर की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जा रहा है. इसके व्यापक नेतृत्वक असर को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है.
इस मामले में जेडीयू के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह तथा पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच बातचीत की समाचारों ने भी नेतृत्वक हलकों का ध्यान खींचा. कार्रवाई के बाद ललन सिंह की मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और फिर नीतीश कुमार से मुलाकात को भी इसी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि, इन मुलाकातों के आधार पर किसी खास नेतृत्वक रणनीति का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.
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सवर्ण वोट बैंक के समीकरण पर कितना असर?
भूमिहारों को बिहार में लंबे समय से भाजपा और एनडीए का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है. हालांकि, टिकट वितरण, नेतृत्वक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर सवर्ण समाज के कुछ वर्गों में असंतोष की चर्चा समय-समय पर होती रही है. बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी सवर्ण मतदाताओं के रुख को लेकर नेतृत्वक चर्चाएं सामने आई थीं. अनंत सिंह के निष्कासन ने इस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है. इसकी एक वजह यह भी है कि उनके खिलाफ कार्रवाई की पृष्ठभूमि में जिस विवाद का जिक्र किया जा रहा है, उससे जुड़े दूसरे पक्ष का संबंध भी भूमिहार समाज से है. अनंत सिंह ने जिस मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ रुख अपनाया, उसमें भी इसी समाज के लोगों की भूमिका बताई जा रही है. इसके बावजूद उनके निष्कासन से समाज के कुछ लोगों में नाराजगी दिखाई दे रही है.
दरअसल, अनंत सिंह की पहचान केवल मोकामा के एक बाहुबली नेता के रूप में नहीं है. अपने क्षेत्र में वह भूमिहार समाज के एक प्रभावशाली नेतृत्वक चेहरे भी माने जाते हैं. ऐसे में उनके जेडीयू से बाहर होने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या इसका असर एनडीए के परंपरागत मतदाताओं के बीच भी दिखाई देगा? हालांकि, किसी एक नेता के खिलाफ कार्रवाई के आधार पर पूरे समाज के वोटिंग पैटर्न में बदलाव का दावा करना सही नहीं होगा. इसका वास्तविक असर आगामी चुनावों में उम्मीदवारों, स्थानीय समीकरणों और नेतृत्वक दलों की रणनीति पर निर्भर करेगा.
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कांग्रेस से मिला ऑफर
अनंत सिंह के जेडीयू से निष्कासन के बाद कांग्रेस नेता अजीत शर्मा ने उन्हें पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है. हालांकि, अनंत सिंह ने किसी नेतृत्वक दल में जाने के बजाय अपनी पार्टी बनाने का ऐलान किया है. ऐसे में फिलहाल कांग्रेस के प्रस्ताव को स्वीकार करने की अटकलों पर विराम लगता दिख रहा है. फिर भी इस घटनाक्रम ने महागठबंधन के संभावित सामाजिक समीकरणों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है.
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव पहले से ही ‘माई’ यानी मुस्लिम-यादव समीकरण से आगे बढ़कर ‘BAAP’ और ‘ए टू जेड’ की नेतृत्व की बात करते रहे हैं. BAAP का अर्थ बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पुअर यानी गरीब वर्ग से है. इस रणनीति के तहत राजद अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ अन्य सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश करता रहा है.
बिहार के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों में मुस्लिम आबादी करीब 17.7 प्रतिशत और यादव आबादी 14.26 प्रतिशत बताई गई है. ये दोनों वर्ग राजद के पारंपरिक सामाजिक आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. ऐसे में यदि महागठबंधन सवर्ण समाज के किसी हिस्से, खासकर भूमिहार मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में सफल होता है, तो उसे कुछ सीटों पर चुनावी फायदा मिल सकता है.सवर्ण मतदाताओं के दो से तीन प्रतिशत वोट का भी किसी दूसरे गठबंधन की ओर झुकाव कई करीबी मुकाबलों में असर डाल सकता है.
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क्या बिहार में बन सकता है नया समीकरण?
बिहार की नेतृत्व में पारंपरिक जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं. वर्ष 2005 के फरवरी विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने 29 सीटें जीतकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था और लोजपा के फैसले को प्रशासन गठन के लिहाज से अहम माना गया था.
अब अनंत सिंह के अपनी पार्टी बनाने के ऐलान के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह किस तरह की नेतृत्वक रणनीति अपनाते हैं. क्या वह अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों तक सीमित रहते हैं या व्यापक सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश करते हैं? क्या उनकी नई पार्टी एनडीए के वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी या महागठबंधन के लिए भी चुनौती बनेगी?
फिलहाल इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं. लेकिन इतना तय है कि अनंत सिंह के निष्कासन ने बिहार में भूमिहार समाज की नेतृत्वक भूमिका, एनडीए के सामाजिक आधार और तेजस्वी यादव के व्यापक गठबंधन वाले फॉर्मूले को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है. अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि अनंत सिंह की नई नेतृत्वक पारी बिहार के चुनावी समीकरणों को किस हद तक प्रभावित करती है.
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