Hot News

Author name: Vinod Jha

nayavichar.com पर संपादक हैं। पटना स्थित स्वतंत्र पत्रकार और लेखक व एक दशक से अधिक का व्यापक अनुभव है। पत्रकारिता, प्रकाशन और विज्ञापन में अनुभव सभी प्रकार की सामग्री के साथ काम करने में सक्षम बनाता है: ब्लॉग पोस्ट, सोशल मीडिया सामग्री अच्छी तरह से शोध किए गए लेख और साथ ही प्रेस विज्ञप्तियाँ। यदि आप उच्च-गुणवत्ता वाली सामग्री की तलाश में हैं, तो nayavicharnews@gmail.com पर संपर्क करें। विशेषताएँ: रिपोर्टिंग, पत्रकारिता, लेखन और संचार, सोशल मीडिया

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

बंगाल चुनाव: आरएसएस के फिडबैक से आसान हुई भाजपा की राह, परिणाम में दिखा असर

मुख्य बातें जमीनी स्तर पर दिन-रात काम किया निर्भीक होकर मतदान करने के लिए प्रोत्साहित किया हिंसा के पीड़ितों के साथ खड़े रहे West Bengal Election Result: कोलकाता. आरएसएस के स्वयंसेवकों ने जमीनी स्तर पर लोगों की नब्ज पर भी नजर रखी और भाजपा को ‘जनता के मिजाज’ और ‘प्रतिद्वंद्वियों की चाल’ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी, जिससे पार्टी को अपनी चुनावी रणनीति को बेहतर बनाने में मदद मिली. आरएसएस के फिडबैक ने भाजपा की राह आसान की और परिणाम में असर दिखा. बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का किला ढहाने में हिंदुस्तानीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिली सफलता में आरएसएस स्वयंसेवकों के योगदान को स्वीकार करते हुए एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने बताया- उन्होंने वास्तव में बहुत मेहनत की. जमीनी स्तर पर दिन-रात काम किया आरएसएस ने भी राज्य में 2021 के विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद भाजपा के अगले चुनावी अभियान के लिए जमीन तैयार करनी शुरू कर दी थी. स्वंय सेवकों ने कहा कि हमने जमीनी स्तर पर दिन-रात काम किया और लोगों तक अपना संदेश पहुंचाया. भाजपा ने भी इस सफलता को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत की. उन्होंने बताया कि पार्टी और संघ के स्वयंसेवकों ने हर स्तर पर उपयुक्त समन्वय के साथ काम किया. सूत्रों के अनुसार, चुनावों के दौरान, आरएसएस स्वयंसेवकों ने बड़े पैमाने पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाये और राज्य भर में लोगों के छोटे समूहों के साथ लगभग दो लाख बैठकें कीं. निर्भीक होकर मतदान करने के लिए प्रोत्साहित किया एक सूत्र ने बताया कि इन बैठकों के दौरान, लोगों को चुनाव से जुड़े मुद्दों से अवगत कराया गया और निर्भीक होकर मतदान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया. उन्हें उनकी सुरक्षा का आश्वासन दिया गया. सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद अपना जनाधार मजबूत करते हुए उसका विस्तार करना शुरू कर दिया, जिसमें पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और 2016 की तीन सीटों से बढ़कर 77 सीटें जीत लीं. पश्चिम बंगाल की अन्य महत्वपूर्ण समाचारों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें हिंसा के पीड़ितों के साथ खड़े रहे संघ के एक अन्य सूत्र ने कहा कि 2021 में तृणमूल की जीत के बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा में कई (भाजपा) कार्यकर्ता मारे गये. लेकिन हम रुके नहीं. हमने अपना काम जारी रखा. उन्होंने कहा- हम चुनाव बाद की हिंसा के पीड़ितों के साथ खड़े रहे और उन्हें राहत दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किया. हमने उन्हें कानूनी सलाह, मुआवजा और उनके घरों के पुनर्निर्माण में मदद की, जिन्हें चुनाव बाद हुई हिंसा में आग के हवाले कर दिया गया था या क्षतिग्रस्त कर दिया गया था. हमने उनकी आजीविका का भी ध्यान रखा. Also Read: बंगाल में धीरे-धीरे खिसकती गयी ममता बनर्जी की जमीन, अबकी आखिरी दुर्ग भी ढह गया The post बंगाल चुनाव: आरएसएस के फिडबैक से आसान हुई भाजपा की राह, परिणाम में दिखा असर appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

बंगाल में धीरे-धीरे खिसकती गयी ममता बनर्जी की जमीन, इस बार आखिरी दुर्ग भी ढह गया

मुख्य बातें आंदोलन की नेतृत्व से जनाधार मजबूत 2019 में गिरावट का पहला बड़ा संकेत 2021 में खिसकने लगी जमीन 2026 में निर्णायक हार वोट शेयर का गणित यानी असली स्पोर्ट्स यहीं हुआ क्षेत्रीय आधार का टूटना एंटी-इनकंबेंसी – 15 साल की सत्ता का असर संगठनात्मक कमजोरी और दलबदल घोटाले और विवाद का असर West Bengal Election Result: अमित शर्मा, कोलकाता. 1998 में ममता बनर्जी ने करीब 26 वर्षों के कांग्रेस के नाते को तोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया. तृणमूल ने 1998 में सात लोकसभा सीटों से शुरुआत की और कुछ ही वर्षों में बंगाल की मुख्य ताकत बन गयी. एक वर्ष बाद ही यानी 1999 में आठ सीटें जीतकर उसने मजबूत वापसी की. 2011 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर 184 सीट जीतकर करीब 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर दिया. 2016 में 211 सीटों के साथ यह चरम पर पहुंच गयी. 2014 लोकसभा में 42 में से 34 सीट जीतना इसका राष्ट्रीय स्तर पर सबसे उम्दा प्रदर्शन रहा. इस दौर में पार्टी का वोट शेयर करीब 45 प्रतिशत तक पहुंचा और यहां विपक्ष यानी वाममोर्चा और कांग्रेस का वर्चस्व लगभग खत्म हो गया. आंदोलन की नेतृत्व से जनाधार मजबूत सिंगूर (997 एकड़ भूमि विवाद) और नंदीग्राम (2007 में हुए भूमि आंदोलन के दौरान फायरिंग से 14 मौतें) आंदोलन तृणमूल के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुए. इन आंदोलनों ने ममता बनर्जी को ‘गरीब और किसानों की नेता’ के रूप में स्थापित किया. इसका सीधा असर 2009 और 2011 के चुनावों में दिखा, जहां ग्रामीण वोट पूरी तरह तृणमूल के पक्ष में गया. 2019 में गिरावट का पहला बड़ा संकेत 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में 34 सीट जीतने वाली तृणमूल 2019 में 22 सीटों पर आ गयी और वोट प्रतिशत 43.28 प्रतिशत रहा. वहीं, भाजपा का उत्थान शुरू हुआ. भगवा दल दो से बढ़कर 18 सीट पर पहुंच गयी और भाजपा का वोट शेयर 10 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 40.25 प्रतिशत हो गया. इसका मतलब था कि लगभग 25 से 30 प्रतिशत वोट शिफ्ट हुआ और विपक्ष पहली बार मजबूत हुआ. 2021 में खिसकने लगी जमीन 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने 215 सीट जीत कर प्रशासन बनायी, लेकिन भाजपा 77 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बन गयी. तृणमूल का वोट प्रतिशत 48.02 प्रतिशत रहा, जबकि भाजपा का 38.15 प्रतिशत रहा. पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2016 में तृणमूल ने 211 सीटें जीतीं थी, जबकि वोट प्रतिशत 44.91 प्रतिशत रहा. भाजपा ने तीन सीटें जीती थीं, जबकि वोट प्रतिशत 10.16 प्रतिशत रहा था. यानी 2021 के चुनाव में भगवा दल काफी तेजी से मजबूत हुआ और चुनाव में तृणमूल व भाजपा के वोट शेयर में अंतर सिर्फ करीब 10 प्रतिशत था. इस चुनाव में तृणमूल के अर्श से फर्श आने का सबसे बड़ा संकेत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का खुद नंदीग्राम में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से 1956 वोटों से हारना था. यानी सत्ता बची, लेकिन नेतृत्वक जमीन खिसकने लगी थी. 2026 में निर्णायक हार 2026 के विधानसभा चुनाव में मतगणना के अंतिम दौर में तृणमूल लगभग 90 सीटों तक सिमट गयी, जबकि भाजपा 190 से ज्यादा सीटों के साथ आगे निकल गयी. 2021 के 215 सीट से गिरकर 90 सीट पर आना मतलब करीब 55 प्रतिशत से ज्यादा सीटों का नुकसान. यह सीधे तौर पर ‘अर्श से फर्श’ की स्थिति है. वोट शेयर का गणित यानी असली स्पोर्ट्स यहीं हुआ 2016 विधानसभा चुनाव में तृणमूल 44.91 प्रतिशत, भाजपा 10.16 प्रतिशत 2019 लोकसभा चुनाव में तृणमूल 43.28 प्रतिशत, भाजपा 40.25 प्रतिशत 2021 विधानसभा चुनाव में तृणमूल 48.02 प्रतिशत, भाजपा 38.15 प्रतिशत आंकड़ों से स्पष्ट है कि गत कुछ चुनावों में तृणमूल का वोट ज्यादा नहीं गिरा, लेकिन भाजपा का वोट तेजी से बढ़ा. यही कारण है कि कम वोट अंतर ने सीटों में बड़ा अंतर पैदा कर दिया. 2011 और 2016 में मुकाबला ‘वन-साइडेड’ था. 2019 के बाद मुकाबला सीधा ‘तृणमूल बनाम भाजपा’ हो गया. जैसे ही वोट एकतरफा भाजपा के पास गया, सीटों का संतुलन टूट गया. क्षेत्रीय आधार का टूटना नेतृत्व के पंडितों का मानना है कि राज्य में तृणमूल के कमजोर होने के कारणों में एक अहम वजह क्षेत्रीय आधार का टूटना भी है. मसलन गत कुछ वर्षों में उत्तर बंगाल भाजपा का गढ़ बन गया. दक्षिण बंगाल में तृणमूल की सांगठनिक पकड़ का कमजोर होना. शहरी क्षेत्रों में युवा और मध्यम वर्ग के भाजपा की ओर रुझान और ग्रामीण क्षेत्र में योजनाओं के बावजूद असंतोष. पहले जहां तृणमूल हर क्षेत्र में मजबूत थी, अब उसका आधार बिखर गया. एंटी-इनकंबेंसी – 15 साल की सत्ता का असर नेतृत्वक विश्लेषकों का मानना है कि 2011 से 2021 तक लगातार सत्ता में रहने से स्वाभाविक नाराजगी बढ़ी. आमतौर पर पांच से 10 प्रतिशत वोट सत्ता विरोध में चला जाता है और यही वोट भाजपा के पक्ष में कंसोलिडेट हो गया. संगठनात्मक कमजोरी और दलबदल तृणमूल की सांगठनिक कमजोरी के कारणों में से एक नेताओं का दलबदल भी माना जा रहा है. तृणमूल के कभी ‘चाणक्य’ माने जाने वाले मुकुल राय के बाद शुभेंदु अधिकारी जैसे बड़े नेताओं का पार्टी छोड़ना बड़ा झटका था. भाजपा को मजबूत कैडर और जमीनी नेटवर्क मिला और तृणमूल की संगठनात्मक पकड़ कमजोर हुई. पश्चिम बंगाल की अन्य महत्वपूर्ण समाचारों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें घोटाले और विवाद का असर सारधा चिटफंड, राज्य के स्कूलों, नगर निकायों में नियुक्तियों के घोटाले, अवैध कोयला व बालू खनन व तस्करी, राशन वितरण घोटाला, अम्फन राहत घोटाला, संदेशखाली और आरजी कर कांड जैसे मुद्दों ने खासकर ग्रामीण और गरीब वोटरों में तृणमूल पर भरोसा कमजोर किया. नेतृत्व के जानकारों का यह भी मानना है कि लक्खी भंडार, स्वास्थ्य साथी, कन्याश्री जैसी योजनाओं से लाभ जरूर मिला, लेकिन ये योजनाएं ‘एंटी-इनकंबेंसी’ को पूरी तरह रोक नहीं सकीं. वोट स्थायी रूप से नहीं जुड़ पाया. Also Read: बंगाल चुनाव: पहाड़ से समुद्र तक खिला कमल, उत्तर बंगाल में खाता भी नहीं खोल पायी तृणमूल कांग्रेस The post बंगाल में धीरे-धीरे खिसकती गयी ममता बनर्जी की जमीन, इस बार आखिरी दुर्ग भी ढह गया appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

Video: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने की पीएम मोदी और अमित शाह की तारीफ

Video : शशि थरूर ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तारीफ करते हुए कहा कि बंगाल और असम में उनकी सफलता उनकी मजबूत संगठन क्षमता और प्रोफेशनल चुनाव मैनेजमेंट की वजह से है. उन्होंने कहा कि उनके पास संसाधनों की कमी नहीं होती और वे अभियान में पूरा जोर लगाते हैं. थरूर ने यह भी कहा कि इससे बाकी पार्टियों को सीखने की जरूरत है, लेकिन उम्मीद है कि उनका मैसेज देश को जोड़ने वाला होगा, न कि बांटने वाला. देखें शशि थरूर का ये वीडियो. #WATCH | Thiruvananthapuram, Kerala | Congress MP Shashi Tharoor says, “They (PM Modi and HM Amit Shah) have done a good job in Bengal and Assam and that’s partially because they are very good at conducting elections. They are professionally organised. They have strong… pic.twitter.com/VSP5s9VWDh — ANI (@ANI) May 5, 2026 शशि थरूर ने ने चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव नतीजों पर कहा कि पार्टी को अब गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि पहले भी ये बात उठी है, लेकिन अब सीखने का सही मौका है. अगर केरल में पार्टी चीजें सही कर सकती है, तो बाकी राज्यों में क्यों नहीं? थरूर ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस को समझना होगा कि कहां कमी रह गई और उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए.  #WATCH | Thiruvananthapuram, Kerala | On election results in four states and one UT, Congress MP Shashi Tharoor says, “I think the party will have to do some very serious introspection, no doubt about it. We’ve said this before, and today we have a very good example of what… pic.twitter.com/G1tZ1uCmky — ANI (@ANI) May 5, 2026 यह भी पढ़ें : Assam Election Results : कांग्रेस को बड़ा झटका, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे चुनाव हारे पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के नतीजे विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के लिए बड़ा झटका है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसके दो प्रमुक क्षेत्रीय घटक तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के किले ध्वस्त हो गए, हालांकि केरल की जीत कांग्रेस के लिये उम्मीद की नई किरण लेकर आई है. The post Video: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने की पीएम मोदी और अमित शाह की तारीफ appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

गढ़वा में बिना डॉक्टर हो रहे थे ऑपरेशन, पैसों के लालच में मरीजों की जान से खिलवाड़ 

गढ़वा से अविनाश की रिपोर्ट  Garhwa News: झारखंड के गढ़वा जिले के चिनिया रोड स्थित आशा किरण अस्पताल में जो चल रहा था, वह इलाज नहीं बल्कि मरीजों की जिंदगी के साथ सरेआम खिलवाड़ है. सदर एसडीएम संजय कुमार की छापेमारी में एक ऐसी डरावनी हकीकत सामने आई, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर से सवालिया निशान लगा दिया हैं. अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर चालू था, मरीज भर्ती थे, लेकिन उन्हें भगवान भरोसे छोड़कर पूरा डॉक्टर स्टाफ मौजूद नहीं थे.  एसडीएम की जांच में हुआ खुलासा  एसडीएम की जांच में खुलासा हुआ कि अस्पताल केवल कागजों पर चल रहा है. जिस डॉक्टर के नाम पर अस्पताल का रजिस्ट्रेशन है, वे श्री वंशीधर नगर उंटारी ट्रॉमा सेंटर में प्रशासनी सेवा दे रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि बिना किसी विशेषज्ञ चिकित्सक के ही अस्पताल में सर्जरी की जा रही थी. कुछ रुपए  के लालच में मरीजों को ऐसी स्थिति में रखा गया था जहां उनकी जान को खतरा हो सकता था. अस्पताल में भारी अनियमितताएं एसडीएम को जांच के दौरान अस्पताल में भारी अनियमितताएं मिलीं, जो इस प्रकार हैं लेटर पैड पर ‘बी. कुमार’ और ‘एम. सिंह’ जैसे संदिग्ध नाम लिखे थे, जिनकी डिग्रियों का कोई अता-पता नहीं है. फरवरी के बाद से अस्पताल ने कोई रिकॉर्ड ही नहीं रखा कि कितने मरीज आए और उनका क्या हुआ. अस्पताल के भीतर चल रही दवा दुकान के पास भी कोई वैध लाइसेंस नहीं था. बिना डॉक्टर सर्जरी, अस्पताल में भारी लापरवाही, कार्रवाई के निर्देश  अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर पूरी तरह अव्यवस्थित था और वहां कोई जिम्मेदार व्यक्ति मौजूद नहीं था. सर्जरी करा चुके मरीज वहां भर्ती थे, लेकिन उनकी देखभाल के लिए कोई योग्य चिकित्सक मौजूद नहीं था. एसडीएम ने कहा कि यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि आपराधिक लापरवाही है. मरीजों की सुरक्षा के साथ ऐसा खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट के तहत इस अस्पताल पर कठोरतम कार्रवाई के लिए सिविल सर्जन को निर्देशित किया गया है. एसडीएम की इस कार्रवाई के बाद गढ़वा के उन निजी अस्पतालों में खलबली मच गई है जो नियमों को तोड़कर क्लिनिक चला रहे हैं. प्रशासन के इस खुलासे के बाद अब शहर के लोग भी निजी अस्पतालों की कार्यशैली को लेकर आक्रोशित हैं. यह भी पढ़ें: चतरा में दर्दनाक हादसा: नवादा गांव में कुएं में गिरने से स्त्री की मौत, पटवन के दौरान फिसला था पैर यह भी पढ़ें: जमशेदपुर में गैंगवार की आहट: धातकीडीह के गामा होटल पर ताबड़तोड़ फायरिंग, भाग रहे दो हमलावर गिरफ्तार The post गढ़वा में बिना डॉक्टर हो रहे थे ऑपरेशन, पैसों के लालच में मरीजों की जान से खिलवाड़  appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

केरल में यूडीएफ ने लेफ्ट के गढ़ों में सेंध लगाकर जीत हासिल की

केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं. कांग्रेस 63 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है. यूडीएफ गठबंधन को भी साफ बहुमत मिल गया है, जिससे प्रशासन बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है. यूडीएफ की जीत पर पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार प्रथापन केंद्रथिल का लेख. विधानसभा चुनाव के परिणाम केरल की नेतृत्व में एक निर्णायक मोड़ साबित हुए हैं. माकपा के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के दस वर्षों के शासन के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की है. भाजपा ने भी राज्य में वापसी दर्ज की, और नेमम, चथन्नूर और कझाकूट्टम जैसे तीन निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की. यूडीएफ ने सभी क्षेत्रों में बढ़त बनाई, पारंपरिक एलडीएफ के गढ़ों में सेंध लगायी और मध्य व उत्तरी केरल में अपने वोट आधार को मजबूत किया. इस चुनाव का एक प्रमुख निष्कर्ष मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की ‘कैप्टन’ वाली छवि का टूटना है. एलडीएफ के अधिकांश मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. पिनराई विजयन का मजबूत गढ़ धर्मदम भी डगमगाता दिखा. कन्नूर जैसे माकपा के पारंपरिक गढ़ में भी दरार दिखाई पड़ी, जो पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष को दर्शाती हैं. यूडीएफ की जीत का सबसे महत्वपूर्ण कारण उसके पारंपरिक आधार-ईसाई और मुस्लिम समुदाय-की वापसी करना रहा. वर्ष 2026 से पहले एलडीएफ ने इन समुदायों को आकर्षित करने के लिए काफी प्रयास किये, पर यह रणनीति उलटी पड़ गयी. खासकर ईसाई समुदाय, जो पहले एलडीएफ के साथ था, बड़ी संख्या में यूडीएफ की ओर लौट आया. मध्य केरल में यूडीएफ ने ईसाई वोटों का बड़ा हिस्सा वापस हासिल किया. सबरीमाला मंदिर से जुड़े कथित सोना चोरी/प्लेटिंग विवाद ने भी खासकर हिंदू मतदाताओं को प्रभावित किया. स्वास्थ्य क्षेत्र में गिरावट, मानव-वन्यजीव संघर्ष और महंगाई जैसे मुद्दों ने भी एलडीएफ की लोकप्रियता घटाई. भाजपा ने तीन सीटें जीतकर वोट काटने वाली पार्टी की छवि से आगे बढ़कर नयी पहचान बनायी. एलडीएफ की सबसे बड़ी ताकत उसकी मजबूत कल्याणकारी योजनाएं रही हैं. यूडीएफ ने इन्हें और बेहतर बनाने का वादा किया. यूडीएफ के सामने कई चुनौतियां हैं. सबसे पहले, विभिन्न गुटों के बीच सहमति से नया मुख्यमंत्री चुनना होगा. फिर खाली खजाने के बीच अपने वादे पूरा करना बड़ी परीक्षा होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.) The post केरल में यूडीएफ ने लेफ्ट के गढ़ों में सेंध लगाकर जीत हासिल की appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

धरती के नक्शे से उसका नामोनिशान मिटा देंगे, अगर… अब ट्रंप ने ईरान को क्यों धमकाया?

Iran obliterated trump: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कड़ा बयान दिया. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे जहाजों की सुरक्षा कर रहे अमेरिकी जहाजों पर हमला करता है, तो ‘धरती के नक्शे से उसका नामोनिशान मिटा दिया जाएगा.’ एक इंटरव्यू में ट्रंप का यह बयान  ऐसे समय आया है जब ईरान पर आरोप है कि उसने कुछ जहाजों को निशाना बनाया, जिन्हें अमेरिकी केंद्रीय कमान द्वारा ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के तहत सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजारा जा रहा था. राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया कि इन हमलों में एक दक्षिण कोरियाई मालवाहक जहाज भी शामिल था. उन्होंने कहा कि ईरान ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के तहत जहाजों की आवाजाही से जुड़े अन्य देशों को भी निशाना बनाया है. अमेरिकी सेना ने भी कार्रवाई करते हुए सात छोटी नौकाओं को निशाना बनाने की बात कही है. ट्रंप ने दक्षिण कोरिया से इस मिशन में शामिल होने का आह्वान करते हुए कहा कि अब उसके लिए सक्रिय भूमिका निभाने का समय है. “Iran has taken some shots at unrelated Nations with respect to the Ship Movement, PROJECT FREEDOM, including a South Korean Cargo Ship… We’ve shot down seven small Boats or, as they like to call them, “fast” Boats. It’s all they have left.” – President Donald J. Trump 🇺🇸 pic.twitter.com/dRpde52oWB — The White House (@WhiteHouse) May 4, 2026 ट्रंप ने यूएस की सैन्य ताकत का किया जिक्र ट्रंप ने दोहराया कि अमेरिका के पास अत्याधुनिक हथियार और पर्याप्त सैन्य संसाधन मौजूद हैं. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास पहले से कहीं अधिक उन्नत हथियार और गोला-बारूद हैं. हमारे सैन्य अड्डे पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और वे सभी जरूरी साजो-सामान से लैस हैं. जरूरत पड़ने पर हम इनका इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेंगे.’ होर्मुज बंद होने से दुनिया में बढ़ा संकट होर्मुज स्ट्रेट  28 फरवरी को ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से प्रभावी रूप से बंद है. यहां से दुनिया के तेल और गैस के साथ साथ कई अहम कमोडिटीज का आवागमन होता था. इस स्थान से पूरे विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का यातायात होता था. इसकी वजह से हिंदुस्तान समेत पूरी दुनिया में तेल और गैस का संकट पैदा हो गया है. तेल की कमी हुई और कीमतें भी बढ़ीं. 28 फरवरी से पहले जो क्रूड ऑयल 73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, वह युद्ध शुरू होने के बाद 100 डॉलर के पार बना हुआ है.  ये भी पढ़ें:- रूस और यूक्रेन सीजफायर पर तैयार, विक्ट्री डे सेलीब्रेशन पर नहीं होगा कोई हमला ये भी पढ़ें:- ईरान तनाव के बीच इजराइल ने बढ़ाई अपनी ताकत, F-35 और F-15IA विमानों की खरीद पर मुहर ट्रंप ने शिपिंग कंपनियों को भी दी है चेतावनी ईरान और अमेरिका- दोनों ने 8 अप्रैल से इस युद्ध को सीमित करते हुए सीजफायर जरूर कर लिया है, लेकिन इस होर्मुज के इस संकरे समुद्री रास्ते पर नाकेबंदी बरकरार रखी है. इसकी वजह से अब भी दुनिया में तेल और गैस संकट जारी है. ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलना चाहता है, यह अमेरिका को स्वीकार नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने शिपिंग कंपनियों को भी चेतावनी दी है कि अगर जहाजों ने स्ट्रेट से गुजरने के लिए ईरान को किसी भी तरह का भुगतान किया, तो उन्हें प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा. The post धरती के नक्शे से उसका नामोनिशान मिटा देंगे, अगर… अब ट्रंप ने ईरान को क्यों धमकाया? appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

रिजल्ट के बाद बंगाल कई जिलों में उपद्रव, भाजपा ने अरूप बिश्वास के पार्टी कार्यालय पर किया कब्जा

मुख्य बातें टॉलीगंज में तृणमूल कार्यालय पर भाजपा का कब्जा भवानीपुर में तृणमूल पार्षद पर हमला West Bengal Election Result: कोलकाता: आखिरकार, भाजपा ने बंगाल में जीत हासिल कर ली है. तृणमूल का लगभग सफाया हो गया है. उत्तर से दक्षिण तक हर जगह यही हाल है. भाजपा ने 206 सीटें जीती हैं और तृणमूल के पास सिर्फ 81 सीटें बची हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में तृणमूल ने 215 सीटें जीती थीं और भाजपा को 77 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था. इस बार स्थिति बिल्कुल उलट है. नतीजे आते ही जिलों में अशांति की समाचारें फैल गईं. प्रधानमंत्री ने बार-बार कहा है कि बदला नहीं लिया जाएगा, बदलाव चाहिए. चुनाव आयोग ने भी कहा कि ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. टॉलीगंज में तृणमूल कार्यालय पर भाजपा का कब्जा ताजा मामला टॉलीगंज का है. यहां से तृणमूल उम्मीदवार अरूप बिश्वास चुनाव हार गए हैं. आरोप है कि उनकी हार के बाद भाजपा ने उनके पार्टी कार्यालय पर कब्जा कर लिया. पार्टी कार्यालय के सामने भगवा झंडे फहराए गए। तृणमूल का झंडा हटाकर भाजपा का झंडा लगा दिया गया. दूसरी ओर, डबग्राम-फुलबारी में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली है. भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के कार्यालय में आग लगा दी. भाजपा पर इस तरह के आरोप लगे हैं. बहरामपुर में भी चुनाव के बाद हिंसा भड़की. तृणमूल पंचायत के उप प्रमुख के घर में तोड़फोड़ के आरोप लगे हैं. बहरामपुर में तृणमूल के कई कार्यालयों में भी तोड़फोड़ की समाचारें आई हैं. ये आरोप भाजपा समर्थित उपद्रवियों के हैं. पश्चिम बंगाल की अन्य महत्वपूर्ण समाचारों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें भवानीपुर में तृणमूल पार्षद पर हमला चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा समर्थित उपद्रवियों ने रात के अंधेरे में जमकर उत्पात मचाया. भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में भी तनाव फैल गया है. विधानसभा क्षेत्र के वार्ड नंबर 70 के नॉर्दर्न पार्क में तृणमूल पार्षद के कार्यालय पर हमले की समाचारें आईं. आरोप है कि हाल ही में कुछ युवकों ने वार्ड नंबर 70 के तृणमूल पार्षद असीम कुमार बोस के कार्यालय पर हमला किया, जो पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी हैं. बताया जाता है कि उन्होंने ताला तोड़कर कार्यालय में प्रवेश किया और तोड़फोड़ की. यहां तक ​​कि कार्यालय में रखी वस्तुओं को सड़क पर निकालकर आग लगाने की भी समाचारें आईं. बाद में पुलिस ने आकर स्थिति को नियंत्रण में किया. Also Read: टारगेट अचीवर बने शुभेंदु अधिकारी, बंगाल जीतने के बाद आयी पहली प्रतिक्रिया The post रिजल्ट के बाद बंगाल कई जिलों में उपद्रव, भाजपा ने अरूप बिश्वास के पार्टी कार्यालय पर किया कब्जा appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

सम्राट कैबिनेट का विस्तार 7 मई को, शामिल हो सकते हैं पीएम मोदी और अमित शाह

Bihar Cabinet Expansion: बिहार में नई प्रशासन बनने के बाद अब कैबिनेट का विस्तार होना है. सीएम सम्राट चौधरी सोमवार को दिल्ली से लौटे, जिसके बाद से चर्चा तेज है. इस बीच अब सम्राट कैबिनेट का पहला विस्तार 7 मई को होने वाला है. ऐतिहासिक गांधी मैदान में कैबिनेट विस्तार का आयोजन होगा. पीएम मोदी और अमित शाह के आने की चर्चा कैबिनेट विस्तार के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भी आने की संभावना है. इसको लेकर पटना जिला प्रशासन की ओर से गांधी मैदान में जोर-शोर से तैयारी की जा रही है. पीएम के आगमन को देखते हुए गांधी मैदान में हेलीपैड भी बनाए जा रहे हैं. सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण के दौरान भी थी चर्चा 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. उनके साथ दो उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने भी शपथ लिया था. शपथ ग्रहण से पहले संभावना जताई जा रही थी कि पीएम मोदी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे. लेकिन किसी कारणवश पीएम मोदी शपथ ग्रहण में शामिल नहीं हुए थे. ऐसे में अब कैबिनेट विस्तार को लेकर भी चर्चा है कि समारोह में पीएम मोदी आ सकते हैं. उनके साथ गृह मंत्री अमित शाह भी आ सकते हैं. सम्राट चौधरी ने दिल्ली दौरे के दौरान दोनों से मुलाकात की थी. किस पार्टी से कितने बन सकते हैं मंत्री? सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट के विस्तार में भाजपा के 15 मंत्रियों को जगह मिलेगी. जबकि जदयू के 14 और मंत्री बनाए जायेंगे. जदयू के दो उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव प्रशासन में मौजूद हैं. उनको शामिल कर प्रशासन में जदयू के मंत्रियों की संख्या 16 हो जायेगी. सहयोगी दलों के लिए पहले का फॉर्मूला प्रभावी होगा. इसमें चिराग पासवान की पार्टी लोजपा आर से दो, जीतन राम मांझी की पार्टी हम और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से एक-एक मंत्री बनाए जायेंगे. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने दो दिवसीय दिल्ली प्रवास के दौरान गृह मंत्री अमित शाह के अलावा पार्टी के कई शीर्ष नेताओं से मुलाकात की. सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्री अमित शाह ने कैबिनेट विस्तार को हरी झंडी प्रदान कर दी है. पुराने चेहरे को मिलेगी जगह कैबिनेट विस्तार में जदयू और भाजपा के पुराने चेहरे को जगह मिलने की चर्चा है. जदयू से डॉ. अशोक चौधरी, श्रवण कुमार, लेशी सिंह, मदन सहनी, मो जमां खान आदि के नाम मंत्री पद के लिए तय माने जा रहे हैं. जबकि भाजपा में मंगल पांडेय, डॉ. दिलीप जायसवाल, नीतीश मिश्रा, प्रमोद कुमार आदि के नाम प्रमुखता लिस्ट में शामिल है. मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ नये मंत्रियों को भी शामिल किया जा सकता है. आज मुंगेर में सीएम सम्राट का कार्यक्रम जानकारी के मुताबिक, सीएम सम्राट चौधरी आज मुंगेर और खगड़िया जाने वाले हैं. इस दौरान वे धार्मिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे और इसके साथ ही विकास परियोजनाओं का निरीक्षण भी करेंगे. बताया जा रहा है कि 5 मई की शाम में पोलो मैदान में भव्य लेजर लाइट और ड्रोन शो भी आयोजित किया गया है. लेकिन इसमें सीएम सम्राट शामिल नहीं हो पायेंगे. Also Read: बिहार के 18 जिलों में आज गरज-चमक के साथ तेज बारिश का अलर्ट, IMD ने जारी की एडवाइजरी The post सम्राट कैबिनेट का विस्तार 7 मई को, शामिल हो सकते हैं पीएम मोदी और अमित शाह appeared first on Naya Vichar.

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

बंगाल में पहली बार हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण काफी प्रभावी साबित हुआ

मुझे वह दिन आज भी याद है. मैं अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कोलकाता जा रहा था, जहां भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. हम कालका मेल में थे. वाजपेयी के साथ पत्रकारों का एक समूह यात्रा कर रहा था. उस यात्रा के दौरान वाजपेयी ने मुझसे एक बात कही, जो आज तक मेरे मन में बसी हुई है. उन्होंने कहा कि वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव नहीं रहे, पर उन्हें इसका गहरा अफसोस रहा कि भाजपा लंबे समय तक केवल हिंदी पट्टी तक सीमित रही. उनका मानना था कि जब पार्टी खासकर पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में एक शक्ति बन जायेगी, तभी वह अफसोस दूर होगा. वर्षों बाद वह क्षण आ चुका है. भाजपा ने बंगाल में जीत हासिल की है. यह एक ऐतिहासिक बदलाव है. कोलकाता में भाजपा की शुरुआती सफलताएं प्रतीकात्मक थीं, पर महत्वपूर्ण भी. जब पार्टी ने कोलकाता नगर निगम चुनाव में केवल दो वार्ड जीते थे, तब ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे. लालकृष्ण आडवाणी ने तब दिल्ली से कहा था, ‘कोलकाता में भाजपा का खाता खुल गया है’. वह एक छोटा कदम था, पर दृढ़ इरादे का संकेत था. आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने वह कर दिखाया है, जो कभी असंभव लगता था. यह परिवर्तन रातोंरात नहीं हुआ. इसके पीछे निरंतर प्रयास, एकाग्रता और सावधानीपूर्वक बनी रणनीति थी. मोदी-शाह की जोड़ी ने बंगाल को महत्वपूर्ण परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों की तरह देखा-अनुशासन, सही समय और तीक्ष्ण रणनीति के साथ. वर्ष 2021 में भी भाजपा ने बड़ा उछाल दिखाया था, जब केवल तीन विधायकों से बढ़कर 77 तक पहुंची थी. वह एक बड़ी सफलता थी. पर 2021 से मिले सबक अहम थे. भाजपा ने अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किये. पार्टी ने अपनी मूल विचारधारा नहीं छोड़ी-‘जय श्री राम’ और हिंदुत्व जैसे मुद्दे पृष्ठभूमि में बने रहे. पर उसने समझ लिया था कि केवल इनके सहारे चुनावी सफलता संभव नहीं है. इस चुनाव में भाजपा ने अपना केंद्रीय संदेश ‘परिवर्तन’ पर केंद्रित किया. यह बदलाव जमीनी हकीकत की समझ पर आधारित था. ममता के 15 वर्षों के शासन के बाद भाजपा ने मजबूत एंटी-इनकंबेंसी महसूस की. शिक्षा व्यवस्था में गिरावट, भ्रष्टाचार के आरोप, जिलों में हिंसा, सिंडिकेट संस्कृति और उगाही ने व्यापक असंतोष पैदा किया था. एक ऐतिहासिक निरंतरता भी दिखाई दी. जिस तरह वाम शासन में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ हुई थी, वही तत्व तृणमूल व्यवस्था में भी जगह बना चुके थे. औद्योगिक ठहराव और छूटे हुए अवसरों ने जनता की निराशा और बढ़ाई. भाजपा ने इसका लाभ उठाया. उसने अपने अभियान को नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बंगाल के व्यापक रूपांतरण के रूप में पेश किया-यह वादा करते हुए, कि राज्य की खोई हुई बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान वापस दिलायी जायेगी. एक रैली में अमित शाह ने इसे स्पष्ट किया- लक्ष्य केवल मुख्यमंत्री बदलना नहीं, बल्कि पूरे बंगाल को बदलना है, और यह बदलाव जनता ही लायेगी. दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने इस एंटी-इनकंबेंसी की गहराई को कम आंका. नेतृत्वक इतिहास में इसका एक उदाहरण भी है. नंदीग्राम गोलीकांड के बाद जब तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को संभावित परिणामों को लेकर आगाह किया गया, तब उन्होंने हार की आशंका को नकार दिया था. कुछ ऐसा ही आत्मविश्वास तृणमूल नेतृत्व के कुछ हिस्सों में भी दिखाई दिया. आंतरिक मतभेद, टिकट वितरण के दौरान विवाद और सीबीआइ व प्रवर्तन निदेशालय की जांच ने असहज माहौल बनाया. मध्यवर्गीय बंगालियों में इससे निराशा की भावना बढ़ी. फिर भी, ममता बनर्जी को हराना आसान नहीं था. एक महत्वपूर्ण कारक मुस्लिम वोट था, जो करीब 30 फीसदी है. भाजपा ने समझ लिया था कि जब तक यह वोट विभाजित नहीं होगा, तृणमूल की बढ़त को पार करना मुश्किल है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची में सुधार जैसे कदमों से, खासकर सीमावर्ती जिलों में, अनियमितताओं में कमी आयी. चुनाव आयोग ने भी संकेत दिया कि एसआइआर प्रक्रिया के जरिये अवैध घुसपैठियों और फर्जी मतदाताओं को हटाया जायेगा, जिससे भाजपा को लाभ मिला. स्त्री मतदाता भी एक महत्वपूर्ण वर्ग थीं. पारंपरिक रूप से ममता का मजबूत आधार रही इस श्रेणी में कुछ बदलाव देखने को मिले. भाजपा ने स्त्री सुरक्षा का मुद्दा उठाकर और मोदी की छवि के जरिये इसमें सेंध लगाने की कोशिश की. इसके साथ ही हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ, जिसमें शुभेंदु अधिकारी की भूमिका अहम रही. पहले भी भाजपा को हिंदू वोट मिले थे, पर वे सीटों में परिवर्तित नहीं हो पाये थे. इस बार यह अधिक प्रभावी साबित हुआ. भाजपा ने बंगाली भद्रलोक के बीच अपनी छवि नरम करने की भी कोशिश की. शमीक भट्टाचार्य जैसों ने सांस्कृतिक रूप से जुड़ी बहुलतावादी बंगाली पहचान पेश की, जिससे यह धारणा कमजोर हुई कि भाजपा बंगाल की संस्कृति से अलग है. कल्याणकारी नेतृत्व में भी बड़ा बदलाव देखा गया. पहले भाजपा तृणमूल की योजनाओं की आलोचना करती थी, पर 2026 में उसने न केवल बराबरी की, बल्कि कई मामलों में उससे आगे बढ़कर वादे किये. मसलन, जहां राज्य प्रशासन स्त्रीओं को 1,500 रुपये दे रही थी, वहीं भाजपा ने 3,000 रुपये देने का वादा किया. बंगाली अस्मिता की नेतृत्व में भी बदलाव आया. ममता बनर्जी लंबे समय से ‘भीतरी बनाम बाहरी’ की नेतृत्व करती रही थीं. इस बार भाजपा ने इसका प्रभावी जवाब दिया. मोदी और शाह ने बांग्ला भाषा, संस्कृति और भावनाओं से जुड़ने के लिए विशेष प्रयास किये. वर्ष 1977 के बाद पहली बार किसी अखिल हिंदुस्तानीय पार्टी ने बंगाल की क्षेत्रीय पहचान के साथ सार्थक संवाद स्थापित किया. इससे पहले कम्युनिस्ट और तृणमूल, दोनों मूलतः क्षेत्रीय दल थे. यह भी याद रखने योग्य है कि ममता बनर्जी स्वयं कभी सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान असंतोष की नेतृत्व की प्रतीक थीं. पर 15 वर्षों के शासन के बाद वही असंतोष उनकी प्रशासन के खिलाफ हो गया. अंततः, यह परिणाम कई कारकों का सम्मिलित प्रभाव है-एंटी-इनकंबेंसी, भाजपा के रणनीतिक बदलाव, संगठनात्मक मजबूती और बूथ स्तर तक प्रभावी प्रबंधन. भाजपा के भीतर के मतभेदों को भी सावधानीपूर्वक संभाला गया. अमित शाह ने व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर नेताओं के बीच तालमेल सुनिश्चित किया और अभियान को एकजुट रखा. भाजपा ने बंगाल में वह हासिल कर लिया है, जो कभी दूर की बात लगता था. और

ताजा ख़बर, मुख्य खबर

Assam Election Results : कांग्रेस को बड़ा झटका, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे चुनाव हारे

Assam Election Results : असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा, क्योंकि तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे हार गए. इनमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई भी शामिल हैं. उनके पिता तरुण गोगोई 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे थे. गौरव जोरहाट सीट से भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी से 23,182 वोटों से हार गए. वे तीन बार के सांसद हैं और लोकसभा में जोरहाट का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसके अलावा विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया भी चुनाव हार गए, जिससे कांग्रेस की स्थिति और कमजोर नजर आई. दो बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत हितेश्वर सैकिया के पुत्र देबब्रत सैकिया नाजिरा के पारिवारिक गढ़ को बरकरार रखने में असफल रहे. पहले उनके पिता और बाद में उनकी मां हेमप्रभा सैकिया द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाली नाजिरा सीट पर देबब्रत 2011 से लगातार निर्वाचित होते रहे थे और 2016 से विपक्ष के नेता थे. हालांकि, इस बार देबब्रत भाजपा के मयूर बोरगोहेन से 46,000 से अधिक मतों के अंतर से हार गए. भाजपा के नारायण डेका ने दिगंता बर्मन को हराया हार का सामना करने वाले एक और पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र दिगंता बर्मन हैं, जिनके पिता दिवंगत भूमिधर बर्मन ने हितेश्वर सैकिया के निधन के बाद कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था. बर्मन बरखेत्री निर्वाचन क्षेत्र पर अपना कब्जा बरकरार रखने में असफल रहे और भाजपा के नारायण डेका से 84,000 से अधिक मतों के अंतर से हार गए. यह भी पढ़ें : जोरहाट विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हारे गौरव गोगोई बीजेपी ने पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल किया असम में सत्तारूढ़ एनडीए ने बड़ी जीत हासिल करते हुए लगातार तीसरी बार प्रशासन बनाने का रास्ता साफ कर लिया है. 126 सीटों वाली विधानसभा में गठबंधन ने 102 सीटें जीत ली हैं, जो दो-तिहाई बहुमत है. बीजेपी ने अकेले 82 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल किया. वहीं उसके सहयोगी बीपीएफ और एजीपी को 10-10 सीटें मिली हैं. इससे पहले 2016 और 2021 में बीजेपी को 60-60 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार पार्टी ने अपना प्रदर्शन काफी बेहतर किया है. The post Assam Election Results : कांग्रेस को बड़ा झटका, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे चुनाव हारे appeared first on Naya Vichar.

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

About Us

नयाविचार एक आधुनिक न्यूज़ पोर्टल है, जो निष्पक्ष, सटीक और प्रासंगिक समाचारों को प्रस्तुत करने के लिए समर्पित है। यहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, तकनीक, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। नयाविचार का उद्देश्य पाठकों को विश्वसनीय और गहन जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

Quick Links

Who Are We

Our Mission

Awards

Experience

Success Story

Recent news

No Posts Found!

© 2025 Developed By Socify

Scroll to Top