Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष में पूर्णिमा श्राद्ध का विशेष महत्व है. यह भाद्रपद मास की आखिरी तिथि (पूर्णिमा) के दिन किया जाता है. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन ऋषि तर्पण का विधान है. मान्यता है कि ऋषि तर्पण के बिना पूर्वजों के लिए किया गया श्राद्ध (तर्पण, पिंडदान) पूरा नहीं होता है.
क्यों जरूरी है पूर्णिमा श्राद्ध?
धर्मशास्त्र के जानकार पं. धर्मनाथ झा ने बताया कि पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए किया गया श्राद्ध (तर्पण और पिंडदान) तभी स्वीकार होता है, जब पूर्णिमा श्राद्ध के दिन ऋषि तर्पण (अगस्त्य ऋषि के लिए) किया जाता है. शास्त्रों में अगस्त्य ऋषि को पितृ पक्ष का अधिकारी बताया गया है यानी उनको साक्षी मानकर भी पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए श्राद्ध (तर्पण और पिंडदान) किए जाते हैं. इसलिए पूर्णिमा श्राद्ध जरूरी माना गया है. पूर्णिमा श्राद्ध के दिन अगस्त्य ऋषि के अलावा वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज इन 7 ऋषियों का तर्पण भी किया जाता है.
कब है पूर्णिमा श्राद्ध?
मिथिला, महावीर और द्रिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर 2026, शनिवार को है. चूंकि पूर्णिमा श्राद्ध भाद्रपद मास की आखिरी तिथि (पूर्णिमा) को करने का विधान है.
पूर्णिमा श्राद्ध 2026 मुहूर्त
पूर्णिमा श्राद्ध के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त शुभ माने गए हैं. इस दौरान ऋषि तर्पण करना शुभ माना गया. कुतुप मुहूर्त सुबह 11 बजकर 16 मिनट से दोपहर 12 बजकर 04 मिनट तक रहेगा. रौहिण मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 04 मिनट से 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगा. इसके अलावा अपराह्न काल का मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 52 मिनट से 3 बजकर 17 मिनट तक रहेगा.
| मुहूर्त | समय |
| कुतुप मुहूर्त | सुबह 11:16 बजे से दोपहर 12:04 बजे तक |
| रौहिण मुहूर्त | दोपहर 12:04 बजे से 12:52 बजे तक |
| अपराह्न काल मुहूर्त | दोपहर 12:52 बजे से 3:17 बजे तक |
नोट- स्थानीय समय के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है.
पूर्णिमा श्राद्ध पर किन-किन पितरों का तर्पण किया जाता है
जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि में हुई हो- शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा श्राद्ध के दिन परिवार के उन सदस्यों के लिए तर्पण किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी महीने की पूर्णिमा तिथि में हुई हो. इसके साथ ही इस दिन कहीं-कहीं सन्यासियों के लिए भी तर्पण करने की परंपरा है.
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन ऋषि तर्पण का महत्व
सनातन धर्म शास्त्रों में देव, पितृ और ऋषि ऋण का उल्लेख किया गया है. धर्मशास्त्र और कर्मकांड के अनुसार, जिस तरह श्राद्ध (तर्पण, पिंडदान) से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है उसी तरह पूर्णिमा श्राद्ध के दिन ऋषि तर्पण (जल, कुश और अक्षत से) करने पर ऋषि ऋण से मुक्ति है. साथ ही उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.
मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से ऋषि और परिवार के दिवंगत व्यक्ति (पितर) के लिए श्राद्ध (तर्पण, पिंडदान) करने पर उनकी आत्मा तृप्त होती है जिससे उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु जीवन, यश और वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है. कहा जाता है कि जब पितर प्रसन्न होते हैं,तो घर-परिवार समृद्ध और खुशहाल रहता है.
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पूर्णिमा श्राद्ध की विधि
- पूर्णिमा के दिन सुबह उठकर स्नान करें. इसके बाद साफ सफेद कपड़े पहनें.
- कुतुप या रौहिण मुहूर्त में दक्षिण दिशा की ओर मुंह करें.
- दाहिने हाथ की अनामिका उंगली (रिंग फिंगर) में कुश से बनी पवित्री (अंगूठीनुमा) धारण करें.
- तांबे या कांसे के बर्तन में शुद्ध जल, कच्चा दूध, काले तिल, सफेद फूल और अक्षत मिलाएं.
- दोनों हाथों में कुश रखें और जल लेकर ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ बोलते हुए अपने गोत्र का नाम लेकर अंगूठे के सहारे जल को किसी बर्तन में धीरे से गिराएं.
- तर्पण के बाद बिना लहसुन-प्याज के बनाए गए भोजन या खीर को छोटे-छोटे हिस्सों में गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवता के लिए अलग-अलग करके रख दें. इसे पंचबलि कहा जाता है.
- संभव हो, तो ब्राह्मण को भोजन कराएं. अगर ऐसा नहीं कर सकते हैं, तो मंदिर में या किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चावल, आटा, दाल, सब्जी फल इत्यादि श्राद्धापूर्वक दें. ब्राह्मण को भोजन कराने के अलावा अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा, वस्त्र (नया कपड़ा), जनेऊ देकर आदरपूर्वक विदा करें.
- श्राद्ध कर्म के अंत में अगस्त्य ऋषि सहित अपने पूर्वजों से प्रार्थना कर भूल-चूक के लिए क्षमा मांगे.
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन किन चीजों का दान करें
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन दान करने की परंपरा भी है. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन अनाज, कपड़े, छाता, जूता, काले तिल, घी, और फल का दान करना चाहिए. मान्यतानुसार, ऐसा करने से पूर्वज खुश होते हैं जिससे परिवार घर-परिवार खुशहाल रहता है और पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है.
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