हिंदुस्तान के तीन सदस्यीय चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली इस हफ्ते चर्चा में है. 23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में कम से कम 14 बार अपनी असहमति दर्ज कराई. रिपोर्ट सामने आने के बाद आयोग ने सफाई दी कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं. आयोग के मुताबिक, बैठक के दौरान अलग-अलग राय रखना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे अंतिम फैसले से अलग देखा जाना चाहिए. इस समाचार के सामने आने के बाद CEC ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष लगातार हमलावर है. अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा पहली बार हुआ, या इससे पहले भी इस तरह की चीजें चुनाव आयोग में देखने को मिल चुकी है.
टीएन शेषन और चुनाव आयुक्त गिल और कृष्णमूर्ति के बीच मतभेद की समाचारें
1993 में चुनाव आयोग को स्थायी तौर पर एक सदस्य से बढ़ाकर तीन सदस्यीय संस्था बनाया गया. इसके बाद से आयोग के सदस्यों के बीच कई बार किसी मुद्दे पर राय अलग-अलग रही है. अलग-अलग दौर में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद के मामले सामने आते रहे हैं. उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और चुनाव आयुक्त एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति के बीच मतभेद की समाचारें सामने आई थीं. शेषन ने दोनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी. हालांकि, कोर्ट ने नियुक्तियों को सही माना और कहा कि आयोग के तीनों सदस्यों का दर्जा बराबर होगा.
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1995 में T.N. Seshan vs. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों की फैसले लेने में बराबर भूमिका होगी. यानी मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों के मुकाबले ज्यादा अधिकार नहीं दिए जा सकते. तीनों सदस्य मिलकर आयोग के फैसलों की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं.
जनवरी 2009 में चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग की गई थी
जनवरी 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग की थी. उन्होंने चावला पर “नेतृत्वक निष्पक्षता की कमी” का आरोप लगाया था. गोपालस्वामी ने इस संबंध में राष्ट्रपति को पत्र भी लिखा था. हालांकि, राष्ट्रपति भवन की ओर से चावला को हटाने की कोई कार्रवाई नहीं हुई और बाद में चावला खुद मुख्य चुनाव आयुक्त बने. चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक, चुनाव कराने या आयोग के प्रशासनिक कामकाज से जुड़े मुद्दों पर सदस्यों की राय अलग-अलग होना सामान्य बात है. हालांकि, अंतिम फैसला आयोग सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लेता है. आयोग लंबित मामलों पर चर्चा के लिए आमतौर पर हफ्ते में एक या दो बार बैठक करता है.
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा भी रहे चर्चा में
अगर किसी चुनाव आयुक्त की राय बहुमत के फैसले से अलग होती है, तो वह अपनी असहमति को लिखित रूप में दर्ज कर सकता है. इसके लिए वह फाइल पर अपनी अलग राय या डिसेंट नोट लिख सकता है. पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने 2019 में भी ऐसा ही किया था. उस समय उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों पर आयोग के बहुमत के फैसले से असहमति जताई थी. बहुमत ने दोनों को इन शिकायतों के मामले में क्लीन चिट दी थी, जबकि लवासा ने अपनी अलग राय दर्ज की थी.
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लवासा ने यह आपत्ति भी जताई थी कि उनकी असहमति वाली राय यानी डिसेंट नोट को आयोग के अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किया जा रहा है. वरिष्ठता के आधार पर उनके अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की संभावना थी. हालांकि, 2020 में उन्होंने चुनाव आयोग के पद से इस्तीफा दे दिया.
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