Jharkhand Farmer Story, रामगढ़ (मनोज सिंह की रिपोर्ट): रामगढ़ जिले के पतरातू प्रखंड में आदिवासी समुदाय की आजीविका को सशक्त बनाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा है. विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से यहां के ग्रामीण व आदिवासी परिवारों के जीवन में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है. यह सकारात्मक परिवर्तन राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा संचालित ट्राइबल डेवलपमेंट प्रोग्राम (टीडीपी), वाटरशेड विकास तथा किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के प्रोत्साहन से संभव हुआ है. नाबार्ड की इन पहलों के तहत झारखंड के सभी 24 जिलों में 64 परियोजनाओं के माध्यम से लगभग 39,000 आदिवासी परिवारों को लाभ पहुंचाया गया है. वहीं, पतरातू की सांकी पंचायत में लगभग 1,000 ग्रामीण एकजुट होकर 1,000 एकड़ से अधिक भूमि पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. इससे न केवल उनके पोषण स्तर में सुधार हुआ है, बल्कि आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है.
चुनौतियां बनीं संभावनाएं
पतरातू प्रखंड में वर्ष 2013-14 के दौरान नाबार्ड ने ग्रामीण सेवा संघ के साथ मिलकर 1,000 आदिवासी परिवारों को इस परियोजना से जोड़ा था. उस समय क्षेत्र में वर्षा आधारित खेती, कम उत्पादन, मिट्टी की खराब गुणवत्ता और सिंचाई की कमी जैसी कई समस्याएं थीं. अधिकांश किसान केवल धान की एक फसल पर निर्भर थे, जिससे उनकी वार्षिक आय महज 25,000 से 30,000 रुपये तक सीमित थी. रोजगार के अभाव में युवा पलायन करने को मजबूर थे.

बंजर भूमि से उपजाऊ बागान तक का सफर
परियोजना के तहत बंजर और परती भूमि को विकसित कर आम और अमरूद के बाग लगाए गए. इन बागानों के बीच सब्जियों की ‘अंतरफसली खेती’ (Intercropping) को बढ़ावा दिया गया. सिंचाई सुविधाओं, उन्नत कृषि तकनीक और बाड़बंदी की व्यवस्था ने इस मॉडल को सफल बना दिया. परिणामस्वरूप, अब किसानों की वार्षिक आय बढ़कर 80,000 से 1,20,000 रुपये तक हो गई है, जो पहले की तुलना में दो से तीन गुना अधिक है.
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बाजार से जुड़ाव और आय में वृद्धि
नाबार्ड ने किसानों को बाजार से जोड़ने और उनके उत्पादों के ‘वैल्यू एडिशन’ पर विशेष ध्यान दिया है. ग्रेडिंग और सॉर्टिंग सुविधाओं के साथ कलेक्टिव मार्केटिंग सिस्टम लागू की गई, जिससे किसानों को उनके उत्पादों का 15 से 25 प्रतिशत तक अधिक मूल्य मिलने लगा है. इससे बिचौलियों पर उनकी निर्भरता भी कम हुई है.
भूमिहीनों को रोजगार, पलायन में 60% की कमी
भूमिहीन परिवारों के लिए पोल्ट्री, बतख पालन, मत्स्य पालन और वर्मी कंपोस्ट जैसे वैकल्पिक आजीविका के साधन विकसित किए गए. इससे उनकी आय के स्रोतों में विविधता आई और आर्थिक स्थिति मजबूत हुई. इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि क्षेत्र से होने वाले मौसमी पलायन में 50 से 60 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है.
एफपीओ और नई परियोजनाओं से मिली मजबूती
वर्ष 2015-16 में “स्नेहलता एग्रो फूड प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड” नामक किसान उत्पादक संगठन (FPO) का गठन किया गया, जिससे वर्तमान में लगभग 1,200 किसान जुड़े हैं. यह संगठन उत्पादों के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन में अहम भूमिका निभा रहा है. इसके अलावा, वर्ष 2023-24 में नाबार्ड ने जीआईजेड (GIZ) के सहयोग से ‘जीवा’ परियोजना शुरू की, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और जलवायु अनुकूल कृषि को प्रोत्साहित करना है.

जैविक खेती से लागत में भारी कटौती
‘जीवा’ परियोजना में किसानों को आसान तरीके से खेती सिखाई जा रही है, जिसमें जीवामृत और बीजामृत जैसे जैविक खाद, अलग-अलग फसल उगाना और पुराने (पारंपरिक) बीजों का इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है. इससे किसानों की कृषि लागत में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आई है. कोड़ी गांव के किसान देवलाल मुंडा ने बताया कि पहले एक फसल में 20,000 से 22,000 रुपये खर्च होते थे, जो अब घटकर मात्र 1,500 रुपये के करीब रह गया है, जबकि उत्पादन पहले से बेहतर हुआ है.
तकनीकी नवाचार और सामूहिक प्रयास
पतरातू में स्थापित ‘जीवा बायोडाइजेस्टर’ की कुल क्षमता लगभग 3,000 लीटर है, जिससे प्रतिदिन 200 लीटर तक जीवामृत तैयार किया जा सकता है. देवलाल मुंडा के नेतृत्व में करीब 35 किसान इसका नियमित लाभ उठा रहे हैं और जैविक खेती के आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं.
स्त्री सशक्तिकरण को मिला बल
सांकी पंचायत की मुखिया एवं स्त्री किसान कोमिला देवी ने बताया कि नाबार्ड के सहयोग से किसानों को प्रशिक्षण, कृषि उपकरण और बाजार तक सीधी पहुंच मिल रही है. इससे स्त्रीएं भी खेती और पंचायत नेतृत्व में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.
समग्र विकास का सफल मॉडल
इस व्यापक पहल के परिणामस्वरूप क्षेत्र में आय वृद्धि, रोजगार सृजन और पलायन में कमी जैसे दूरगामी सकारात्मक बदलाव आए हैं. नाबार्ड की यह योजना न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी झारखंड के लिए एक सफल मॉडल के रूप में उभर रही है.

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