‘हां, हम रिजीम चेंज चाहते हैं. इसमें गलत क्या है?’
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के इस बयान ने हिंदुस्तानीय नेतृत्व में एक पुरानी बहस को फिर तेज कर दिया है. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि मोदी प्रशासन को बदलने की मांग की जा सकती है या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र में प्रशासन बदलने की इच्छा को कब सामान्य नेतृत्वक असहमति और कब देश को अस्थिर करने की कथित साजिश के रूप में पेश किया जाता है?
भाजपा के नेता इसे विपक्ष के छिपे नेतृत्वक एजेंडे और बांग्लादेश जैसे घटनाक्रम से जोड़ रहे हैं. दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि विपक्ष का काम प्रशासन का विरोध करना और चुनाव के रास्ते उसे सत्ता से हटाने का प्रयास करना है.
इस नेतृत्वक टकराव के बीच सोशल मीडिया पर भी एक शब्द अपनी मूल परिभाषा से आगे बढ़कर नेतृत्वक पहचान का प्रतीक बन रहा है, ‘रिजीम चेंज’.
अब यह समझना जरूरी है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है, इसे लेकर विवाद क्यों है और किसी शब्द को बार-बार षड्यंत्र से जोड़कर पेश करने का आम लोगों की नेतृत्वक समझ पर क्या असर पड़ता है.
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भाजपा को आपत्ति क्यों है?
15 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रशांत भूषण ने कहा कि आंदोलन अब ‘रिजीम चेंज’ की लड़ाई बन चुका है. उन्होंने दलील दी कि लोकतंत्र में प्रशासन बदलने की मांग करना अपने-आप में अपराध नहीं है.
भाजपा ने इसे विपक्ष की मंशा का खुलासा बताते हुए आरोप लगाया कि आंदोलन का उद्देश्य केवल चुनावी सुधार नहीं, बल्कि चुनी हुई प्रशासन को सत्ता से हटाना है.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 16 अक्टूबर को विपक्ष पर बांग्लादेश जैसे घटनाक्रम से प्रेरित होकर हिंदुस्तान में सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश करने का आरोप लगाया.
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भूषण पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘गद्दार’ कहने वाला संदेश साझा किया. इस तरह नेतृत्वक बहस में प्रशासन बदलने की मांग का विरोध करने से आगे बढ़कर मांग करने वालों की निष्ठा पर भी सवाल उठने लगे.
प्रशांत भूषण के बयान से ये बात समझ में आती है कि विपक्ष प्रशासन बदलना चाहता है. पर क्या वह प्रशासन बदलने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाना चाहता है? या किसी गैर-संवैधानिक तरीके का समर्थन कर रहा है? इसे समझते है.
‘रिजीम चेंज’: दक्षिणपंथी यूट्यूब विमर्श
यूट्यूबर आदि अचिंत और सुरक्षा मामलों के विश्लेषक पथिकृत राय की साझा चर्चा में एक प्रमुख तर्क उभरता है: ‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्दों को बार-बार सामान्य नेतृत्वक मांग की तरह प्रस्तुत करने से जनता, विशेषकर युवाओं के बीच उनके अर्थ को लेकर धारणा बदल सकती है. चर्चा में वक्ताओं ने तीन तरह के दावे किए:
- शब्द को सामान्य बनाने का आरोप: उनका तर्क है कि ‘रिजीम चेंज’ को सहज और स्वीकार्य बताने से लोग चुनावी सत्ता परिवर्तन और गैर-संवैधानिक तरीके से प्रशासन गिराने के बीच का अंतर भूल सकते हैं.
- बांग्लादेश से प्रेरणा का सवाल: उन्होंने बांग्लादेश के छात्र आंदोलन, नेहा बोरा के कथित बयानों और हिंदुस्तान के विरोध प्रदर्शनों के बीच वैचारिक संबंध होने की आशंका जताई.
- हिंसा और बाहरी हस्तक्षेप का संदेह: चर्चा में माओवादी संगठनों, विदेशी वित्तपोषण, सैन्य तख्तापलट और गृहयुद्ध जैसी संभावनाओं का उल्लेख किया गया. यह विमर्श केवल प्रशासन के समर्थन या विपक्ष के विरोध तक सीमित नहीं है. यह एक व्यापक नेतृत्वक नैरेटिव तैयार करता है, जिसमें विरोध प्रदर्शन को संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के रूप में देखा जाता है.
लेकिन यहां एक जरूरी पत्रकारिता संबंधी अंतर समझना होगा: किसी आंदोलन को लेकर संदेह जताना और उसके पीछे साजिश होने का प्रमाण प्रस्तुत करना दो अलग बातें हैं. चर्चा में लगाए गए विदेशी वित्तपोषण, हिंसक मंशा और सैन्य तख्तापलट से संबंधित आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है. उपलब्ध बातचीत मात्र से उन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता.
क्या ‘रिजीम चेंज’ शब्द को सामान्य बनाना ही खतरा है?
दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों की चिंता का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि नेतृत्वक भाषा केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि जनता की सोच को भी प्रभावित करती है.
यदि कोई आंदोलन बार-बार कहता है कि मौजूदा व्यवस्था बदलनी चाहिए, तो उसके समर्थकों में यह विचार मजबूत हो सकता है कि सत्ता परिवर्तन तत्काल नेतृत्वक लक्ष्य होना चाहिए. सोशल मीडिया पर छोटे वीडियो, तीखी सुर्खियां और प्रभावशाली वक्ताओं के बयान इस संदेश को और व्यापक बना सकते हैं.
लेकिन यही तर्क दूसरे पक्ष पर भी लागू होता है.
जब हर प्रशासन-विरोधी आंदोलन को विदेशी साजिश, माओवादी एजेंडा या लोकतंत्र को नष्ट करने की योजना कहा जाता है, तो वैध असहमति के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है. इससे लोकतंत्र में विरोध की जगह संकुचित होने का खतरा है.
इसलिए ‘रिजीम चेंज’ शब्द के सामान्यीकरण पर चर्चा करते समय दो प्रश्न जरूरी हैं:
- क्या आंदोलन के नेता चुनाव के जरिए प्रशासन बदलने की बात कर रहे हैं या गैर-संवैधानिक तरीकों की वकालत कर रहे हैं?
- क्या साजिश के आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण हैं, या नेतृत्वक विरोधियों को एक ही वैचारिक श्रेणी में रखने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा रहा है?
Delegitimization: जब जनता प्रशासन पर भरोसा खो दे
किसी प्रशासन का ‘वैधता-ह्रास’ (Delegitimization) का मतलब है कि लोग धीरे-धीरे यह मानने लगते हैं कि उस प्रशासन को शासन करने का अधिकार नहीं है. यह सिर्फ यह नहीं कि प्रशासन अलोकप्रिय हो गई है, इसका मतलब यह है कि लोगों का उस पर भरोसा टूटने लगा है.
इसे रोजमर्रा की जिंदगी से समझा जा सकता है. मान लीजिए किसी मोहल्ले में एक समिति सफाई, पानी और बिजली का ध्यान रखती है. शुरू में लोग उस पर भरोसा करते हैं. लेकिन धीरे-धीरे गंदगी बढ़ जाती है, पानी की सप्लाई ठीक नहीं रहती और समिति के लोग अपने रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाते हैं. शुरू में लोग शिकायत करते हैं, फिर उन्हें लगने लगता है कि यह समिति हमारी बात नहीं सुनती और सिर्फ अपना हित देखती है. अब लोग उसके फैसले मानने को तैयार नहीं रहते. यही स्थिति बड़े स्तर पर प्रशासन के साथ होती है, तो उसे वैधता-ह्रास कहते हैं.
प्रशासन की वैधता तब कमजोर होती है जब चुनाव में अनियमितता का आरोप लगे, भ्रष्टाचार बढ़े, संस्थाओं पर सवाल उठें, या लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज किया जाए. महंगाई, बेरोजगारी, स्कूल-अस्पताल की खराब व्यवस्था और वादों का पूरा न होना भी इस भरोसे को तोड़ते हैं.
ध्यान रहे कि प्रशासन की आलोचना करना गलत नहीं है. लोकतंत्र में लोगों का सवाल उठाना, प्रदर्शन करना और जवाब मांगना उनका अधिकार है. समस्या तब होती है जब लोग सिर्फ किसी नीति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी प्रशासन को ही गलत और बेकार मानने लगते हैं.
इसका असर गंभीर होता है. लोग प्रशासनी निर्देशों का पालन कम करते हैं, प्रदर्शन बढ़ते हैं और चुनाव में सत्ता बदल सकती है. इसलिए किसी प्रशासन के लिए सबसे जरूरी है कि वह ईमानदारी, पारदर्शिता और जनता की सुनवाई के जरिए जन-भरोसा बनाए रखे. सत्ता चुनाव से मिलती है, लेकिन उसकी असली ताकत जनता के भरोसे से आती है.
भाजपा का प्रतिवाद भी क्यों महत्वपूर्ण है?
भाजपा की आपत्ति को केवल शब्दों की नेतृत्व कहकर खारिज करना भी पर्याप्त नहीं होगा.
किसी आंदोलन के घोषित उद्देश्य और वास्तविक नेतृत्वक रणनीति में अंतर हो सकता है. यदि कोई आंदोलन केवल चुनावी सुधार की मांग से आगे बढ़कर प्रशासन बदलने को अपना लक्ष्य घोषित करता है, तो उसकी नेतृत्वक मंशा पर सवाल उठाना वैध है.
इसी तरह, यदि आंदोलनकारी बांग्लादेश जैसे घटनाक्रम का उदाहरण देते हैं, तो यह पूछना भी उचित है कि वे वहां के किस पहलू से प्रेरणा ले रहे हैं- युवाओं की लामबंदी से, व्यापक जन-आंदोलन से, प्रशासन के इस्तीफे से या सत्ता परिवर्तन की किसी गैर-संवैधानिक प्रक्रिया से?
हिंदुस्तान में प्रशासन बदलने की मांग क्या असंवैधानिक है?
नहीं. केवल प्रशासन बदलने की मांग करना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है.
हिंदुस्तानीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है. इन अधिकारों पर संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत निर्धारित उचित प्रतिबंध भी लागू होते हैं.
इसका अर्थ है कि नागरिक प्रशासन की आलोचना कर सकते हैं, उसके इस्तीफे की मांग कर सकते हैं, प्रदर्शन कर सकते हैं और चुनाव में उसे हराने के लिए अभियान चला सकते हैं.
मगर शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार हिंसा, धमकी या अन्य गैरकानूनी गतिविधियों की स्वतः अनुमति नहीं देता.
निष्कर्ष
हिंदुस्तान में किसी प्रशासन को बदलने की बात करना अपने-आप में गलत नहीं है. लोग प्रशासन की आलोचना कर सकते हैं, उसके इस्तीफे की मांग कर सकते हैं, प्रदर्शन कर सकते हैं और चुनाव में उसे हराने की कोशिश कर सकते हैं. यह लोकतंत्र का हिस्सा है.
लेकिन फर्क तरीके में है. अगर कोई कहे कि प्रशासन को चुनाव के जरिए हराया जाए, तो यह लोकतांत्रिक रास्ता है. लेकिन अगर कोई हिंसा, धमकी, गैरकानूनी काम या बाहरी ताकतों के सहारे प्रशासन गिराने की बात करे, तो वह लोकतंत्र के खिलाफ है.
इसलिए ‘रिजीम चेंज’ शब्द को सुनकर ही किसी को दोषी नहीं मान लेना चाहिए. यह देखना होगा कि मांग किस तरह की है और उसके पीछे कोई ठोस सबूत है या नहीं.
दूसरी तरफ, हर विरोध को ‘विदेशी साजिश’ या ‘देशद्रोह’ कहना भी ठीक नहीं. इससे लोगों का प्रशासन से सवाल पूछने का अधिकार कमजोर होता है. जब जनता की समस्याओं को नहीं सुना जाता, भ्रष्टाचार बढ़ता है और वादे पूरे नहीं होते, तो लोगों का भरोसा टूटता है. यही भरोसे का टूटना प्रशासन के लिए सबसे बड़ा खतरा है.
सीधी बात यह है कि प्रशासन बदलना चाहना गलत नहीं, पर उसका रास्ता संविधान और शांति के भीतर होना चाहिए. साथ ही, प्रशासन को भी जनता की सुनवाई करनी होगी, क्योंकि चुनाव से सत्ता मिलती है, लेकिन उसे टिकाए रखता है जनता का भरोसा.
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