Saudi-Pakistan Secret Defense Pact: ‘ड्रॉप साइट न्यूज’ के हाथ लगे दस्तावेजों के मुताबिक, इस समझौते में एक ‘कलेक्टिव डिफेंस क्लॉज’ जोड़ा गया है. इसका मतलब है कि अगर सऊदी अरब पर कोई हमला होता है, तो पाकिस्तान उसे अपने ऊपर हमला मानेगा. रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी सार्वजनिक रूप से ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि वह सऊदी के साथ हमारे इस समझौते का ध्यान रखे. यह समझौता 1982 के पुराने सैन्य सहयोग का एक बहुत बड़ा और गंभीर विस्तार है.
यह 1982 का ‘प्रोटोकॉल ऑन डिफेंस कोऑपरेशन’ समझौता है, जो सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ था. इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब की आंतरिक सुरक्षा और रक्षा के लिए अपने लगभग 10,000 सैनिकों को वहां तैनात किया था, जिसका मुख्य उद्देश्य सऊदी राजघराने और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था.
पाकिस्तान की मजबूरी
हैरानी की बात यह है कि इस समझौते में पाकिस्तान की तरफ से तो सऊदी की रक्षा करने की पूरी गारंटी दी गई है, लेकिन सऊदी अरब पर ऐसी कोई सैन्य मजबूरी नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, यह डील पूरी तरह एकतरफा है. पाकिस्तान अपनी खराब आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए सऊदी से मिलने वाली आर्थिक मदद के बदले अपनी सेना देने को तैयार हुआ है. पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसी वजह से इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया था, लेकिन 2025 में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच यह डील फाइनल हो गई.
शांति वार्ता के बीच सेना की तैनाती
जिस वक्त पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए हाई-लेवल बातचीत चल रही थी, ठीक उसी समय सऊदी अरब ने किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों और सैनिकों के पहुंचने का ऐलान कर दिया. इस समाचार ने पाकिस्तान की ‘न्यूट्रल’ छवि को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसके तुरंत बाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच हो रही बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई और अमेरिकी दल वापस लौट गया.
इस्लामाबाद में फिर हो सकती है बातचीत
एबीसी न्यूज से बातचीत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह मौजूदा दो हफ्ते के युद्धविराम को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी. ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगले दो दिनों में कुछ बड़ा हो सकता है. ‘न्यूयॉर्क पोस्ट’ और ‘सीएनएन’ की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत के लिए ‘इस्लामाबाद’ को सबसे मुफीद जगह माना जा रहा है. इस वार्ता का नेतृत्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर सकते हैं, जिसमें स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर भी शामिल हो सकते हैं.
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पाकिस्तान के लिए घरेलू खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान इस जंग में सीधे शामिल होता है, तो उसे देश के अंदर भारी विरोध झेलना पड़ सकता है. पाकिस्तान की जनता में ईरान के प्रति सहानुभूति है, ऐसे में अमेरिका और इजरायल के ब्लॉक के साथ खड़े होना पाकिस्तान के लिए आंतरिक संकट पैदा कर सकता है. हालांकि, ‘ड्रॉप साइट न्यूज’ का कहना है कि फिलहाल यह तैनाती प्रतीकात्मक है, लेकिन समझौते की शर्तों ने पाकिस्तान के हाथ बांध दिए हैं.
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