आज जब किसी दूसरे शहर में सस्ते और ठीक-ठाक होटल की जरूरत होती है, तो OYO का नाम शायद ही किसी से छूटा हो. लेकिन इस कंपनी की शुरुआत किसी बड़े बिजनेस स्कूल, करोड़ों रुपये या किसी बड़े शहर से नहीं हुई थी. इसके पीछे ओडिशा के एक छोटे से शहर का वह लड़का था, जिसे बचपन से ही कुछ अलग करने की धुन सवार थी.
इस लड़के का नाम है रितेश अग्रवाल. आज वह OYO के फाउंडर और चेयरमैन के तौर पर जाने जाते हैं, लेकिन उनकी कहानी को सिर्फ एक “कॉलेज ड्रॉपआउट से अरबपति” की कहानी कहना अधूरा होगा. क्योंकि रितेश के बिजनेस करने का तरीका उनके बचपन में ही दिखाई देने लगा था. ‘टेक टाइकून्स की कहानी’ की इस कड़ी में आइए जानते हैं रितेश अग्रवाल के बारे में, उनके बचपन से लेकर OYO के CEO बनने तक के सफर में छिपे उन किस्सों के बारे में, जिन्हें शायद बहुत कम लोग जानते हैं.
Peter Thiel से मिला मौका और बदल गई दिशा
रितेश की जिंदगी में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें Peter Thiel Fellowship मिली. यह फेलोशिप पेपाल के को-फाउंडर पीटर थील से जुड़ी थी और इसमें युवा एंटरप्रेन्योर्स को अपनी कंपनी पर काम करने के लिए आर्थिक मदद दी जाती थी. रितेश को करीब 1 लाख डॉलर का ग्रांट मिला. OYO के मुताबिक, वह थिल फेलोशिप के लिए चुने जाने वाले पहले रेजिडेंट एशियन थे.
दिलचस्प बात यह है कि उनके इस फैसले से परिवार शुरुआत में खुश नहीं था. रितेश ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके तीन बड़े भाई-बहन थे और परिवार चाहता था कि वह भी कोई अच्छी नौकरी करें. उनके लिए किसी IT कंपनी में एंट्री लेवल जॉब मिल जाना भी बड़ी सफलता होती. लेकिन रितेश कुछ और करना चाहते थे.
एक समय तो उनके पिता को यह पता ही नहीं था कि बेटा कॉलेज से ज्यादा स्टार्टअप में समय दे रहा है. रितेश ने बताया कि जब उनके पिता कोटा पहुंचे और डीन से बात की, तब उन्हें पता चला कि बेटा कॉलेज में ज्यादा आता ही नहीं था.
OYO के CEO थे, लेकिन खुद हाउसकीपिंग भी की
आज OYO का नाम सुनते ही बड़े ऑफिस और करोड़ों रुपये का बिजनेस याद आता है. लेकिन शुरुआती दिनों में रितेश खुद होटल में हाउसकीपिंग से लेकर सेल्स तक का काम करते थे. उन्होंने बताया था कि जब गुरुग्राम में OYO सिर्फ एक होटल के साथ काम कर रहा था, तब वह खुद OYO की यूनिफॉर्म पहनकर हाउसकीपिंग करते थे और कस्टमर्स को कमरे दिखाते थे.
कभी कस्टमर उन्हें कमरे से बाहर जाने को कह देता, तो वह चुपचाप बाहर आ जाते. एक बार तो एक परिवार ने उनसे अपने शिशु को संभालने के लिए भी कहा और इसके बदले उन्हें 50 रुपये टिप मिली.
परिवार को मनाने में भी लगा वक्त
रितेश के लिए बिजनेस शुरू करना जितना मुश्किल था, उतना ही मुश्किल परिवार को समझाना भी था. उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके माता-पिता को उनका स्टार्टअप करना समझ नहीं आता था. बाद में जब स्टार्टअप इकोसिस्टम को लेकर देश में माहौल बदला और OYO तेजी से आगे बढ़ा, तब परिवार का नजरिया भी बदला.
एक पुराने इंटरव्यू में रितेश ने मजाक में यह भी बताया था कि उनकी मां इस बात से परेशान थीं कि अगर बेटा ग्रेजुएट नहीं होगा तो उससे शादी कौन करेगा. उस समय उन्हें यह बात भी समझानी पड़ी कि कॉलेज छोड़ना उनके लिए पढ़ाई छोड़ना नहीं, बल्कि कुछ नया बनाने की कोशिश थी.
आज की कहानी की शुरुआत उन छोटे एक्सपेरिमेंट्स से हुई थी
रितेश की कहानी को अगर पीछे मुड़कर देखें तो OYO अचानक पैदा हुआ आइडिया नहीं था. पहले कंप्यूटर से छेड़छाड़, फिर प्रोग्रामिंग सीखना, 13 साल की उम्र में SIM बेचना, इंजीनियरिंग कॉलेजेस पर किताब लिखना, स्टार्टअप इवेंट्स में जाना, अलग-अलग होटल्स में रहना और आखिर में होटल की समस्या को बिजनेस में बदलना, ये सभी छोटे-छोटे कदम थे.
खुद रितेश ने एक पॉडकास्ट में अपने बचपन को याद करते हुए कहा था कि वह हमेशा कुछ अलग करने वाला बच्चा था. Thiel Fellowship के बाद उनके लिए सबसे बड़ी सीख यह थी कि “बड़ा सोचने के लिए रिसोर्सेज की जरूरत नहीं होती.” OYO की अपनी कहानी के मुताबिक, 2013 में गुरुग्राम में पहला OYO शुरू हुआ और इसके बाद कंपनी ने तेजी से विस्तार किया. आगे चलकर OYO कई देशों तक पहुंचा.
नोट: यह लेख नया विचार की ‘टेक टायकून्स की कहानी’ सीरीज का हिस्सा है. इस सीरीज के जरिए हम टेक जगत की अलग-अलग दिग्गज हस्तियों की कहानी आपके सामने ला रहे हैं. इस सीरीज में हम जानेंगे कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की, किन चुनौतियों का सामना किया और किस तरह अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे. इस सीरीज की अगली कड़ी में हम 7 अक्टूबर को टेक इंडस्ट्री के एक और बड़े नाम की कहानी आपके सामने लेकर आएंगे. तब तक जुड़े रहिए हमारे साथ.
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