25 जुलाई 2026 को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने CJP के प्रदर्शन के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. अब करीब 69 दिन बाद, 2 अक्टूबर की शाम 4 बजे CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क में आंदोलन शुरू कर दिया है.
मुंबई पुलिस से अनुमति नहीं मिलने के बावजूद दीपके के समर्थकों के शिवाजी पार्क पहुंचने की उम्मीद है. ऐसे में जानते हैं कि दीपके ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे समेत किन मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं और क्या दीपके और उनकी पार्टी दूसरी बार मोदी प्रशासन को झुका पाएंगे?
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किन मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे दीपके?
CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में चार बड़ी मांगें रखी हैं-
1-CEC ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें.
2-ज्ञानेश कुमार के खिलाफ FIR दर्ज हो.
3-CEC और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति वाले कानून में बदलाव हो.
4- SIR से से जुड़े दस्तावेजों और फैसलों की जांच होनी चाहिए.
क्या CEC ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना पड़ सकता है?
किसी आंदोलन के कारण देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है. इसके लिए एक तय संवैधानिक प्रक्रिया होती है. संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधार पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है. इस प्रक्रिया को महाभियोग के नाम से जानते हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए सबसे पहले संसद के किसी एक सदन में प्रस्ताव का नोटिस देना होगा. लोकसभा में ऐसे नोटिस पर कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं. नोटिस लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को सौंपा जाता है. मार्च 2026 में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षर वाला ऐसा नोटिस दिया भी गया था, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया था.
नोटिस मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति उपलब्ध सामग्री और लगाए गए आरोपों को देखते हैं. उनके पास प्रस्ताव को स्वीकार करने या खारिज करने का अधिकार होता है. अगर प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाता, तो प्रक्रिया वहीं खत्म हो जाती है.
प्रस्ताव मंजूर हुआ तो बनेगी जांच समिति
अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, किसी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होता है. समिति आरोपों, दस्तावेजों और सबूतों की जांच करती है और संबंधित पक्ष को अपना बचाव रखने का मौका भी मिलता है.
अगर जांच समिति आरोपों को सही नहीं पाती, तो आगे की कार्रवाई खत्म हो जाती है. लेकिन अगर समिति साबित कदाचार या अक्षमता का निष्कर्ष देती है, तो हटाने का प्रस्ताव संसद में चर्चा और मतदान के लिए लिया जा सकता है. CEC को हटाने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी है. प्रस्ताव को हर सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उस दिन उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन से पास होना होता है.
अगर लोकसभा और राज्यसभा दोनों जरूरी बहुमत से प्रस्ताव पास कर देते हैं, तो मामला राष्ट्रपति के पास जाता है. इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं. तभी मुख्य चुनाव आयुक्त औपचारिक रूप से पद से हटेंगे.
दीपके के लिए प्रशासन को दूसरी बार झुकाना क्यों मुश्किल?
दीपके के लिए इस बार प्रशासन को झुकानना दो वजहों से बेहद मुश्किल लगता है-
पहला- नंबर गेम : लोकसभा में कुल 540 सदस्य हैं. अगर सभी सदस्य मतदान करते हैं तो दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 वोट चाहिए होंगे. मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक NDA के पास 318, INDIA ब्लॉक के पास 184 और अन्य दलों के पास 38 सांसद हैं. INDIA और अन्य को जोड़ दें तो संख्या 222 होती है, जो 360 से काफी कम है. वहीं राज्यसभा में कुल 243 सदस्य हैं. अगर सभी सदस्य वोट करें तो दो-तिहाई के लिए 162 वोट चाहिए होंगे. यहां NDA के पास 147, INDIA ब्लॉक के पास 67 और अन्य के पास 29 सदस्य हैं. INDIA और अन्य को मिलाकर संख्या 96 होती है. हालांकि वास्तविक जरूरी संख्या उस दिन सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों पर निर्भर करेगी.
दूसरा- प्रशासन खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहेगी: CJP के आंदोलन के बीच केंद्र प्रशासन किसी जल्दबाजी वाले फैसले नहीं ले सकती है. नेतृत्वक तौर पर विपक्ष ऐसे किसी कदम को प्रशासन के दबाव में झुकने के रूप में पेश कर सकता है. इस कारण CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे या हटाने का फैसला सीधे प्रशासन नहीं लेगी.
धर्मेंद्र प्रधान का मामला इससे अलग क्यों था?
सीजेपी के करीब एक महीने के आंदोलन के बाद 25 जुलाई को केंद्रीय मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया था. लेकिन मौजूदा मांग और धर्मेद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग में काफी फर्क है. धर्मेंद्र प्रधान केंद्रीय मंत्री थे. केंद्रीय मंत्री राष्ट्रपति के अधीन पद पर रहते हैं और व्यवहारिक रूप में प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद में बने रहते हैं. लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त संवैधानिक पद पर हैं और उन्हें विशेष सुरक्षा मिली हुई है. इसलिए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे वाले घटनाक्रम को CEC के मामले पर सीधे लागू नहीं हो सकता है. ज्ञानेश कुमार स्वेच्छा से इस्तीफा दे सकते हैं, लेकिन उन्हें पद से पटाने के लिए एक संवेधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा.
क्या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ FIR हो सकती है?
CJP ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग कर रही है. यह हिस्सा कानूनी तौर पर सबसे पेचीदा है. 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16 CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़ी कार्रवाई के मामले में कानूनी सुरक्षा देती है. कानून के मुताबिक मौजूदा या पूर्व CEC अथवा इलेक्शन कमिश्नर द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए किए गए काम, बोले गए शब्द या लिए गए फैसले से संबंधित सिविल या क्रिमिनल सुनवाई पर विशेष संरक्षण लागू होता है.
क्या सीईसी पर FIR दर्ज ही नहीं हो सकती? इसे इतना सीधा कहना सही नहीं हो सकता है. कानून की धारा 16 का असली सवाल यह है कि जिस कथित कार्रवाई को लेकर शिकायत की जा रही है, वह CEC के आधिकारिक कामकाज के दायरे में आती है या नहीं. अगर आरोप सीधे चुनाव आयोग में लिए गए आधिकारिक फैसलों से जुड़ा है, तो यह प्रावधान बड़ी कानूनी बाधा बन सकता है. इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि ज्ञानेश कुमार को पहले पद से हटाना जरूरी है और उसके बाद ही FIR हो सकती है. FIR, जांच और अदालत में आगे की आपराधिक प्रक्रिया अलग-अलग कानूनी चरण हैं.
नियुक्ति प्रक्रिया बदलना कितना आसान है?
CJP मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भी बदलाव चाहता है. मौजूदा प्रक्रिया 2023 के कानून में तय है. इसमें CEC और चुनाव आयुक्त (Election Commissioners) के नाम की सिफारिश तीन सदस्यीय चयन समिति करती है. इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं. इसके बाद राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और हिंदुस्तान के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने वाली समिति का मॉडल दिया था. वह व्यवस्था संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक के लिए थी. संसद ने बाद में 2023 का कानून बनाया.
प्रशासन कानून बदलने का प्रस्ताव ला सकती है, लेकिन विधेयक को संसद से पारित कराना होगा. इसलिए CJP की यह मांग न तो CEC अकेले पूरी कर सकते हैं और न केंद्र प्रशासन किसी सामान्य प्रशासनिक आदेश से इसे बदल सकती है. इसके अलावा कानून के किसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता अदालत में चुनौती दी जा सकती है. ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
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