Asian Games Opinion: हिंदुस्तान ने एशियन गेम्स 2026 में 85 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया. 21 गोल्ड, 27 सिल्वर और 37 ब्रॉन्ज के साथ यह प्रदर्शन हिंदुस्तानीय खिलाड़ियों की मेहनत और उपलब्धि को दिखाता है. आखिरी दिनों में जिस तरह हिंदुस्तानीय खिलाड़ियों ने एक के बाद एक पदक जीते, उससे पूरे देश को जश्न मनाने का मौका मिला.
लेकिन अब जब एशियन गेम्स का शोर थम चुका है और पदक तालिका सामने है, तो जश्न के साथ एक जरूरी सवाल भी खड़ा होता है. क्या हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम उस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, जिस रफ्तार से उससे उम्मीद की जा रही है?
सवाल खिलाड़ियों की मेहनत पर नहीं है. जिन्होंने मैदान पर उतरकर देश के लिए पदक जीता, उनकी उपलब्धि का सम्मान होना ही चाहिए. सवाल उस सिस्टम पर है, जो इन खिलाड़ियों को तैयार करता है, उन्हें ट्रेनिंग देता है, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर दिलाता है और बड़े मंच तक पहुंचाता है.
107 से 85 मेडल पर पहुंचा हिंदुस्तान
हांगझोउ
एक स्टार खिलाड़ी मिलना सिस्टम की सफलता नहीं है
प्रशासन पैसा और सुविधाएं दे सकती है, लेकिन मैदान पर खिलाड़ी तैयार करने की जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी होती है. स्पोर्ट्स महासंघ, कोचिंग सिस्टम, हाई परफॉर्मेंस सेंटर, विशेषज्ञ, सपोर्ट स्टाफ और खुद खिलाड़ी, सभी इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं.
इसलिए किसी बड़े आयोजन के बाद सिर्फ खिलाड़ियों की सफलता का जश्न मनाना और असफलता की स्थिति में खिलाड़ी की परफॉर्मेंस पर सवाल उठाना सही तरीका नहीं हो सकता. जहां पदक नहीं आया, वहां यह पता लगाना भी जरूरी है कि कमी खिलाड़ी में थी या तैयारी में.
अगर किसी खिलाड़ी को पर्याप्त ट्रेनिंग, बेहतर कोचिंग, स्पोर्ट्स विज्ञान या अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों का एक्सपोजर नहीं मिला, तो उसकी असफलता को सिर्फ उसके प्रदर्शन के खाते में डाल देना सबसे आसान रास्ता है. वहीं अगर सिस्टम ने पूरी तैयारी दी थी और फिर भी किसी स्पोर्ट्स में प्रदर्शन गिरा, तो यह जानना जरूरी है कि कमी कहां रह गई. यही फर्क एक गंभीर स्पोर्ट्स व्यवस्था और सिर्फ प्रतियोगिता-दर-प्रतियोगिता तैयारी करने वाली व्यवस्था के बीच होता है.
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तो क्या हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम सही दिशा में बढ़ रहा है?
अब शुरुआत में उठाए गए सवाल पर लौटते हैं. क्या हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम उस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, जिसकी उससे उम्मीद की जा रही है? मौजूदा आंकड़े इसका पूरी तरह हां में जवाब नहीं देते.
हिंदुस्तान का स्पोर्ट्स सिस्टम पहले से मजबूत हुआ है. कई स्पोर्ट्सों में विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार हुए हैं और 21 गोल्ड इसकी बड़ी मिसाल हैं. लेकिन 107 से 85 पदकों तक की गिरावट, गोल्ड की संख्या में कमी और लगातार दो एशियन गेम्स में चौथे स्थान पर बने रहना यह बताता है कि अभी हिंदुस्तान को लंबी छलांग लगाने के लिए काफी काम करना बाकी है.
यानी समस्या प्रतिभा की कमी से ज्यादा प्रतिभा को लगातार चैंपियन बनाने, अलग-अलग स्पोर्ट्सों में गहराई तैयार करने और तैयारी को ज्यादा प्रभावी बनाने की है.
अब अगला लक्ष्य सिर्फ 85 से 86 पदक करना नहीं होना चाहिए
एशियन गेम्स 2026 का सबसे बड़ा सबक यही है कि हिंदुस्तान को पदकों के जश्न और प्रदर्शन की समीक्षा, दोनों को साथ लेकर चलना होगा.
85 पदक शानदार उपलब्धि हैं. 21 गोल्ड के लिए खिलाड़ियों को बधाई मिलनी ही चाहिए. लेकिन हांगझोउ के 107 पदकों से इस बार के 85 तक पहुंचने का आंकड़ा भी उतना ही महत्वपूर्ण है. खासकर तब, जब पिछले तीन वर्षों में एशियन गेम्स की तैयारी पर करीब ₹800 करोड़ खर्च हुए हैं.
अगला लक्ष्य सिर्फ 85 से 86 पदक करना नहीं होना चाहिए. लक्ष्य ऐसा सिस्टम तैयार करना होना चाहिए, जिसमें एक खिलाड़ी के अनुपलब्ध होने पर उसकी जिम्मेदारी संभालने वाला दूसरा खिलाड़ी तैयार हो, एक पीढ़ी के बाद अगली पीढ़ी पहले से मजबूत हो और हर बड़े टूर्नामेंट के बाद सिर्फ पदकों की संख्या नहीं, बल्कि तैयारी की गुणवत्ता भी बेहतर दिखाई दे.
85 पदकों पर जश्न मनाइए. खिलाड़ियों को सलाम कीजिए. उनकी मेहनत का सम्मान कीजिए. लेकिन इसी जश्न के बीच सिस्टम से यह सवाल भी पूछिए. 107 से 85 तक आने के बाद हमने क्या सीखा और अगली बार 85 से आगे जाने के लिए अभी से क्या बदल रहा है?
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