Chhath Puja Train Ticket Crisis: अक्टूबर का महीना शुरू होते ही देश भर में त्योहारों का मौसम दस्तक दे चुका है. दुर्गा पूजा के बाद हर किसी की निगाहें दिवाली और लोकआस्था के महापर्व छठ पर टिकी रहती है. दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरु और पंजाब जैसे शहरों में पसीना बहा रहे लाखों बिहारियों के लिए यह सिर्फ एक छुट्टी का समय नहीं होता. यह वह वक्त होता है जब वे अपने घर, परिवार, मिट्टी और संस्कृति से दोबारा जुड़ते हैं.
लेकिन हर साल की तरह इस बार भी बिहार लौटने का यह सफर किसी महा-सर्कस से कम साबित नहीं हो रहा है. जैसे-जैसे त्योहारों की तारीखें नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे बिहारियों की धड़कनें तेज होती जा रही हैं. घर जाने की खुशी पर टिकट न मिलने का तनाव पूरी तरह हावी हो चुका है.
ट्रेनों में 3 महीने पहले से नो-रूम
अगर आप आज दिल्ली से पटना, दरभंगा, मुजफ्फरपुर या भागलपुर के लिए ट्रेन का कन्फर्म टिकट तलाश रहे हैं, तो आपको सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी. देश के प्रमुख रेल मार्गों पर चलने वाली प्रीमियम और सुपरफास्ट ट्रेनों का हाल बेहद बुरा है.
संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, श्रमजीवी एक्सप्रेस, विक्रमशिला एक्सप्रेस, वैशाली एक्सप्रेस और सप्त क्रांति एक्सप्रेस जैसी चर्चित ट्रेनों में बुकिंग खुलते ही महज कुछ ही मिनटों में सभी सीटें भर गईं. स्थिति यह है कि इन ट्रेनों में अक्टूबर के दूसरे हफ्ते से लेकर नवंबर तक रिग्रेट और नो-रूम के बोर्ड लग चुके हैं.
कई मुख्य रूटों पर 200 से 300 से भी ज्यादा की वेटिंग लिस्ट चल रही है. ऐसे में आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर लॉग इन करते ही यात्रियों के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है. जो लोग तत्काल टिकट के भरोसे बैठे हैं, उनके लिए भी एक-एक सीट के लिए हजार लोग कतार में खड़े हैं.
पूजा स्पेशल ट्रेनों की जमीनी हकीकत क्या है
यात्रियों की इस भारी भीड़ और हाहाकार को देखते हुए हिंदुस्तानीय रेलवे हर साल सैकड़ों पूजा स्पेशल ट्रेनें चलाने का ढिंढोरा पीटता है. दावे किए जाते हैं कि अतिरिक्त ट्रेनें चलाकर हर यात्री को उसके गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाया जाएगा. लेकिन क्या वास्तव में यह व्यवस्था कारगर साबित होती है?
जमीनी हकीकत यह है कि इन पूजा स्पेशल ट्रेनों का कोई भरोसा नहीं होता. इन ट्रेनों को अक्सर नियमित ट्रेनों को रास्ता देने के लिए आउटर सिग्नलों पर घंटों खड़ा रख दिया जाता है. 12 से 15 घंटे का सफर तय करने वाली स्पेशल ट्रेनें 24 से 30 घंटे में पटना या मुजफ्फरपुर पहुंचती हैं.
इसके अलावा, इन ट्रेनों के जनरल और स्लीपर कोचों की स्थिति तो और भी डरावनी होती है. डिब्बों में क्षमता से चार गुना ज्यादा लोग ठुंसे रहते हैं. शौचालय के पास, गलियारों में और यहां तक कि दो डिब्बों के जोड़ पर बैठकर लोग हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर करने को मजबूर हैं. यह सफर आरामदायक तो दूर, बुनियादी मानवीय सुविधाओं से भी परे होता है.
फ्लाइट के किराए में भयंकर उछाल
जब ट्रेनों के सभी दरवाजे बंद दिखते हैं, तो मध्यमवर्गीय और कामकाजी लोग मजबूरी में हवाई जहाज यानी फ्लाइट का रुख करते हैं. लेकिन विमानन कंपनियों ने भी इस मजबूरी का पूरा फायदा उठाना शुरू कर दिया है. त्योहारों के सीजन में डायनेमिक फेयर के नाम पर हवाई किराए में आग लगी हुई है.
सामान्य दिनों में दिल्ली से पटना का हवाई किराया 4000 से 5000 रुपये के बीच होता है. लेकिन दिवाली और छठ के ठीक 2-3 दिन पहले का किराया 15000 से लेकर 22000 रुपये प्रति व्यक्ति तक पहुंच चुका है. यदि परिवार में 4 सदस्य हैं, तो सिर्फ एक तरफ का हवाई किराया 80000 रुपये के पार जा रहा है.
यही हाल दिल्ली से दरभंगा, मुंबई से पटना और बेंगलुरु से पटना जाने वाली फ्लाइट्स का भी है. एक आम नौकरीपेशा इंसान के लिए अपनी पूरी महीने की कमाई सिर्फ घर जाने के टिकट पर खर्च कर देना कतई मुमकिन नहीं है.
बसों का किराया भी बढ़ा दिया जाता है
ट्रेन और फ्लाइट से निराश होने के बाद प्रवासियों का अंतिम सहारा बनती हैं प्राइवेट बसें. दिल्ली के आनंद विहार, कश्मीरी गेट या सूरत और मुंबई से बिहार के विभिन्न जिलों के लिए चलने वाली प्राइवेट स्लीपर बसों का किराया भी तीन से चार गुना बढ़ा दिया जाता है.
जो बसें आम दिनों में 1500 से 2000 रुपये लेती थीं, वे अब 5000 से 7000 रुपये प्रति सीट वसूलती हैं. इसके बावजूद, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लंबे ट्रैफिक जाम के बीच लोग किसी तरह अपने घर पहुंचने की उम्मीद में यह भारी रकम चुकाने को विवश रहते हैं.
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स्थायी समाधान की दरकार और प्रशासनी व्यवस्था पर सवाल
हर साल अक्टूबर और नवंबर के महीने में बिहार जाने वाले रेल और सड़क मार्गों पर यही संकट देखने को मिलता है. यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही है. इसके बावजूद अब तक इसका कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है.
केवल कुछ स्पेशल ट्रेनें चला देना या अतिरिक्त बोगियां जोड़ देना इस विशाल जनसैलाब के आगे ऊंट के मुंह में जीरा साबित होता है. आवश्यकता इस बात की है कि उत्तर हिंदुस्तान से बिहार को जोड़ने वाले रेल कॉरिडोर का स्थायी विस्तार किया जाए. नई नियमित ट्रेनें चलाई जाएं और हवाई किराए की ऊपरी सीमा तय की जाए ताकि त्यौहार के समय बिहारियों का शोषण न हो सके.
बिहार की वित्तीय स्थिति को बाहर से पैसा भेजकर मजबूत करने वाले इन लाखों लोगों को हर साल अपनी ही सरजमीं पर वापस लौटने के लिए इतनी बड़ी जद्दोजहद और अपमान सहना पड़े, यह व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है.
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