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जुलाई के जंतर-मंतर प्रोटेस्ट से दिल्ली पुलिस ने क्या सीखा ? जानें यहां

Jantar Mantar Protest : आइए पहले बात करते हैं जुलाई में प्रदर्शन के दौरान क्या देखने को मिला था? इस महीने जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने बुलाया तो यहां हजारों युवा जुटे, आंदोलन ने रफ्तार पकड़ी और देखते ही देखते प्रदर्शन दिल्ली की सड़कों तक फैल गया. हालांकि अक्टूबर में तस्वीर अलग थी. प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में एक जगह जमा हो पाते, उससे पहले ही पुलिस ने इलाके की घेराबंदी शुरू कर दी, रास्ते बंद किए और लोगों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया.

सवाल यही है कि इन दो तस्वीरों के बीच ऐसा क्या बदला? इसका जवाब जुलाई के बाद हुई पुलिस की समीक्षा में छिपा है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई के प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने करीब दो महीने तक अपनी तैयारियों की समीक्षा की. अधिकारियों ने माना कि जंतर-मंतर तक लोगों की आसान पहुंच, खाने-पानी की व्यवस्था और आसपास की कुछ खास जगहों ने आंदोलन को लंबे समय तक टिकने में मदद की. पुलिस ने आसपास की सड़कों, टूटे फुटपाथों और दूसरी जगहों को भी सुरक्षा जोखिम के तौर पर पोइंट आउट किया.

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जुलाई में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आंदोलन एक जगह से निकलकर एक व्यापक जन-आंदोलन जैसा रूप लेने लगा था. प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से संसद की तरफ बढ़े और कई जगहों पर पुलिस से टकराव हुआ. पुलिस की कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैले और इससे आंदोलन पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया. बाद में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल भी उठे और दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित पुलिस ज्यादती से जुड़े मामलों पर केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा.

अक्टूबर में पुलिस ने शायद इसी अनुभव को ध्यान में रखकर भीड़ बनने के बाद संभालने के बजाय ‘भीड़ बनने से पहले रोकने’  पर जोर दिया.

2 और 4 अक्टूबर को जंतर-मंतर के आसपास भारी सुरक्षा लगाई गई. रिपोर्टों के मुताबिक, पुलिस ने इलाके को पहले ही बैरिकेड कर दिया था. अलग-अलग रास्तों से आने वाले प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोका गया और कई लोगों को हिरासत में लेकर अलग-अलग थानों में भेजा गया. 2 अक्टूबर के दोपहर तक पुलिस ने 700 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी.

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हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, इस बार दिल्ली पुलिस और केंद्रीय बलों की करीब 4,000 जवानों की तैनाती की गई थी और 20 से ज्यादा CAPF कंपनियों को बुलाया गया था. पुलिस ने यह भी कहा कि अक्टूबर के प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी गई थी. यानी जुलाई में जहां पुलिस को बढ़ती भीड़ और बदलते हालात के बीच रिएक्शन देना पड़ा, वहीं अक्टूबर में रणनीति का जोर शुरुआत से ही इंट्री रोकने, भीड़ को छोटे ग्रुप में बांटने और बड़े जमावड़े को बनने से रोकने पर दिखा. यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू है.

आंदोलन को रोकने की रणनीति अब सिर्फ लाठी या बल प्रयोग तक सीमित नहीं दिखती. असली बदलाव यह है कि पुलिस भीड़ को उस प्रदर्शन की जगह तक पहुंचने ही नहीं देना चाहती, जहां वह बड़ी संख्या में जमा हो सकें.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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