कभी किसी फिल्म में मां-बेटी की विदाई देखकर आंखें भर आईं, तो कभी किसी किरदार का दर्द देखकर खुद को रोने से रोक नहीं पाए? अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो जरूरी नहीं कि आप भावनात्मक रूप से कमजोर हों. कई बार दूसरों के दुख को महसूस करना और उनकी कहानी से जुड़ जाना हमारी संवेदनशीलता को दिखाता है. मनोविज्ञान में भावनाओं को समझने और दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने की क्षमता को अहम माना जाता है. आइए जानते हैं कि इमोशनल फिल्म देखकर रोने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं और इसका मन पर क्या असर पड़ता है.
इमोशनल फिल्म देखकर रोना कमजोरी नहीं
नीदरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन में हुए शोध में फिल्मों के दौरान रोने और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया गया। इस विषय पर हुई रिसर्च से पता चलता है कि फिल्म देखकर रोने का अनुभव हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है. कई बार कहानी से जुड़ाव और किरदारों के प्रति सहानुभूति आंसुओं की वजह बनती है. इसलिए किसी का भावुक होना उसे कमजोर समझने का आधार नहीं है.
रोने के बाद क्यों हल्का लगता है मन?
कई बार मन में दुख, तनाव या किसी बात की परेशानी जमा होती रहती है. जब हम किसी भावुक कहानी को देखते हैं, तो वही भावनाएं आंसुओं के रूप में बाहर आ सकती हैं. रोने के बाद कुछ लोगों को राहत महसूस होती है और उनका मूड भी बेहतर हो जाता है. हालांकि, यह असर हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता. मनोविज्ञान के अनुसार, भावनाओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना मानसिक सेहत के लिए मददगार हो सकता है.
दिमाग कैसे करता है भावनाओं को नियंत्रित?
निमहंस, बेंगलुरु के मनोवैज्ञानिक डॉ. टीएस जयसूर्या के अनुसार, हाइपोथैलेमस मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम से जुड़ा एक अहम हिस्सा है. यह शरीर की तनाव प्रतिक्रिया और भावनाओं से जुड़े कई कामों में भूमिका निभाता है. जब हम दुख, खुशी या डर जैसी भावनाएं महसूस करते हैं, तो मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्से सक्रिय होते हैं. इनमें एमिग्डाला भी शामिल है, जो भावनाओं को समझने और उनसे जुड़ी प्रतिक्रियाओं में भूमिका निभाता है. इसके बाद शरीर में आंसू आने जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं.
भावनाओं को दबाना जरूरी नहीं
कभी फिल्म का कोई दृश्य हमें अपनी जिंदगी की याद दिला देता है, तो कभी किसी अनजान किरदार का दर्द भी अपना लगने लगता है. ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. रोना हर बार तनाव दूर करने का तरीका नहीं होता, लेकिन अपनी भावनाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना मन को संभालने में मदद कर सकता है. इसलिए अगली बार किसी फिल्म को देखकर आंसू आएं, तो खुद को कमजोर समझने के बजाय अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश करें.
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