‘हाईकमान ने जो कहा, मैंने वह किया. मैंने कहा था कि जब हाईकमान कहेगा, मैं इस्तीफा दे दूंगा, और मैंने दे दिया.’ यह बात 28 मई 2026 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद सिद्धारमैया ने कही. जबतक उन्होंने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया था, तबतक डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना बहुत मुश्किल लग रहा था. फिर ऐसा क्या हुआ कि 78 साल के सीनियर नेता सिद्धारमैया आसानी से सत्ता हस्तांतरण के लिए राजी हो गये.
कांग्रेस पार्टी में सिद्धारमैया एकलौते नहीं हैं. केरल के.सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के अलावा पंजाब के राजा वडिंग जैसे सीनियर नेताओं ने भी अपनी नेतृत्वक महत्वाकांक्षा की कुर्बानी दी. ऐसे में अब सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी की स्ट्रेटजी के आगे ये नेता सरेंडर कर गये? पॉलिटिकल एक्सपर्ट के जरिए इन सवालों के जवाब जानते हैं…
बिना किसी बगवात और विरोध के बदल दिए गए पंजाब प्रदेश अध्यक्ष
पंजाब कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष परगट सिंह को 2 अक्टूबर 2026 को नियुक्त किया गया था. परगट सिंह ने 11 अक्टूबर को चंडीगढ़ स्थित कांग्रेस भवन में औपचारिक रूप से पदभार संभाला. उन्होंने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की जगह ली. उनकी नियुक्ति के बाद बड़े विरोध की समाचार नहीं है, लेकिन पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी और असंतोष पहले से था.
- चरणजीत सिंह चन्नी का खेमा: पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी और उनके समर्थक राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहे थे. चन्नी खुद भी इस पद के दावेदार माने जा रहे थे.
- राजा वड़िंग की नाराजगी: पद छोड़ने के बाद वड़िंग ने सचिन पायलट की भूमिका पर सवाल उठाये और कहा, “चन्नी साहब जीत गये.” हालांकि, उन्होंने परगट सिंह को बधाई भी दी.
- परगट सिंह की नियुक्ति पर प्रतिक्रिया: चन्नी, वड़िंग और प्रताप सिंह बाजवा समेत कई नेताओं ने परगट सिंह को बधाई दी. इससे पार्टी ने एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की.
केरल में दो सीनियर नेताओं ने सतीशन के लिए छोड़ी कुर्सी
केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन को 14 मई 2026 को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया था. उन्होंने 18 मई 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान हुई थी. सतीशन के अलावा के.सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला भी इस पद के दावेदार थे. कांग्रेस हाईकमान ने करीब 10 दिनों की बातचीत के बाद सतीशन के नाम पर मुहर लगाई.
- सतीशन के समर्थकों ने दबाव बनाया: पार्टी कार्यकर्ताओं ने सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किए. कांग्रेस लीडरशिप ने काफी सोचने-समझने के बाद उनके नाम पर हामी भरी.
- वेणुगोपाल के समर्थकों की नाराजगी: कुछ कांग्रेस कार्यकर्ता जो वेणुगोपाल के समर्थक माने जाते थे, उन्होंने अपने नेता को सीएम नहीं बनाने पर विरोध दर्ज करवाया था. हालांकि, राहुल गांधी वेणुगोपाल को मनाने में कामयाब रहे. इसके बाद धीरे-धीरे समर्थकों की नाराजगी भी दूर हो गई.
- गठबंधन के सहयोगी का समर्थन: सबसे बड़ी बात यह है कि कांग्रेस के इस फैसले पर सहयोगी दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने भी सतीशन का समर्थन किया.
‘’केरल में वी.डी. सतीशन को मुख्यमंत्री चुनने से पहले राहुल गांधी ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान पर नाराजगी जताई थी. 10 मई 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने साफ किया था कि मुख्यमंत्री चुनने का फैसला कांग्रेस हाईकमान करेगा. उन्होंने नेताओं के समर्थकों की नारेबाजी और सोशल मीडिया पर चल रहे अभियानों को पार्टी के फैसले को चुनौती देने वाला बताया था.’’
कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह शिवकुमार की ताजपोशी
डीके शिवकुमार को 30 मई 2026 को कर्नाटक कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया था. उन्होंने 3 जून 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और सिद्धारमैया की जगह ली.
मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस में लंबे समय तक खींचतान चली थी. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार, दोनों के समर्थक अपने-अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाए रखने या बनाने की मांग कर रहे थे.
- सिद्धारमैया और शिवकुमार के खेमों में खींचतान: 2023 में कांग्रेस की जीत के बाद से ही दोनों नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चर्चा और मतभेद बने हुए थे.
- शिवकुमार के समर्थन में नारेबाजी: जनवरी 2026 में कांग्रेस के एक कार्यक्रम के दौरान डीके शिवकुमार के समर्थन में नारे लगाए गए. इस पर सिद्धारमैया नाराज दिखे थे.
- हाईकमान का फैसला: आखिरकार कांग्रेस नेतृत्व ने सत्ता परिवर्तन का फैसला किया और 30 मई को शिवकुमार को विधायक दल का नेता चुना.
‘’कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सीएम पद को लेकर खींचतान के दौरान राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से किसी एक नेता के समर्थन में स्पष्ट बयान नहीं दिया था. हालांकि, जनवरी 2026 में उन्होंने दोनों नेताओं से मुलाकात की थी. इस मुलाकात में राहुल ने दोनों से अलग-अलग भी बातचीत की, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बदलाव को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की.’’
‘सिद्धारमैया को हटाना आसान नहीं था, राहुल ने इसे सही से हैंडल किया’
पॉलिटिकल एक्सपर्ट अनिल आनंद के मुताबिक, पंजाब में राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग उठ रही थी. इसे देखते हुए राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत की. इसके बाद लोगों की राय को ध्यान में रखते हुए परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.
एक्सपर्ट के मुताबिक, यह फैसला इसलिए अच्छा माना जा सकता है, क्योंकि परगट सिंह को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं रहा है. उन पर ऐसे आरोप भी नहीं हैं, जिन्हें लेकर विपक्ष कांग्रेस को घेर सके. उनकी छवि साफ-सुथरे नेता की रही है.
अनिल आनंद ने आगे कर्नाटक की नेतृत्वक घटनाक्रम पर कहा कि सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद से हटाना आसान नहीं था. राहुल गांधी ने उन्हें अच्छी तरह संभाला. एक्सपर्ट के मुताबिक, सिद्धारमैया पहले एचडी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) यानी JD(S) में थे. वहां देवगौड़ा से उनके मतभेद बढ़ गए थे. उन्हें लगने लगा था कि पार्टी में देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को ज्यादा महत्व मिल रहा है.
इससे उनके नेतृत्वक भविष्य पर असर पड़ सकता था. इसके बाद वह कांग्रेस में आ गए. अनिल आनंद ने कहा कि सिद्धारमैया की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी, जो JD(S) में रहते पूरी होती नहीं दिख रही थी. कांग्रेस में आने के बाद उनका यह सपना पूरा हुआ.
केरल के नेतृत्वक घटनाक्रम पर अनिल आनंद ने कहा कि राहुल गांधी पार्टी के पुराने और नए नेताओं को साथ लेकर चल रहे हैं. उन्होंने पंजाब से पहले केरल में लोगों की राय और पार्टी के भीतर की मांगों को ध्यान में रखा. अनिल आनंद के मुताबिक, राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले केसी वेणुगोपाल ने भी उनके फैसले का सम्मान किया.
वहीं, कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता वी डी सतीशन के समर्थन में थे. उनकी छवि भी साफ-सुथरी मानी जाती है. राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की राय को ध्यान में रखते हुए सतीशन को केरल का मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति दी. रमेश चेन्निथला भी नेतृत्व के फैसले के खिलाफ नहीं गए.
The post सिद्धारमैया से चेन्निथला तक, कांग्रेस में सत्ता का सहज हस्तांतरण; राहुल की स्ट्रेटजी का क्यों नहीं हुआ विरोध? appeared first on Naya Vichar.

