Meerut Blue Drum Case: उत्तर प्रदेश के मेरठ में सौरभ राजपूत हत्याकांड ने एक बार फिर देश का ध्यान खींचा है. 14 अक्टूबर 2026 को जिला अदालत ने सौरभ की हत्या और सबूत मिटाने के मामले में दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड सुनाया. अदालत की कार्यवाही के दौरान न्यायाधीश की टिप्पणी और पेन को कूड़ेदान में फेंकने का घटनाक्रम भी सुर्खियों में रहा.
महाहिंदुस्तान का जिक्र कर जज ने क्या कहा?
आजतक और इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने फैसला सुनाने से पहले महाहिंदुस्तान का उल्लेख किया. उन्होंने अपराध की गंभीरता के अनुरूप दंड देना न्यायिक कर्तव्य बताया. अदालत में बाघ और जंगल का उदाहरण देते हुए कानून, समाज की सुरक्षा और व्यवस्था के बीच संबंध पर भी टिप्पणी की गई. फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश द्वारा इस्तेमाल किया गया पेन कूड़ेदान में फेंकने की घटना चर्चा का विषय बनी. हालांकि, इस घटनाक्रम को न्यायाधीश की व्यक्तिगत प्रतीकात्मक कार्रवाई के रूप में ही समझना चाहिए; इसे किसी औपचारिक न्यायिक नियम का हिस्सा नहीं माना जा सकता.
मुस्कान बनी कैदी नंबर 396, साहिल को मिला 395
सजा सुनाए जाने के बाद जेल के रिकॉर्ड में साहिल शुक्ला को कैदी नंबर 395 और मुस्कान रस्तोगी को कैदी नंबर 396 आवंटित किए गए. आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, सजा के बाद दोनों की निगरानी बढ़ाई गई है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दोनों ने उच्च न्यायालय में अपील करने की प्रक्रिया के बारे में जेल प्रशासन से जानकारी मांगी.
क्या था मेरठ का नीला ड्रम हत्याकांड?
यह मामला मर्चेंट नेवी से जुड़े रहे सौरभ राजपूत की हत्या से जुड़ा है. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, मार्च 2025 में सौरभ की हत्या के बाद उनके शव के टुकड़े कर सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिए गए थे. जांच के बाद मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया गया. अदालत ने 30 सितंबर 2026 को दोनों को दोषी ठहराया था और 14 अक्टूबर को सजा सुनाई.
126 पेशियां और 22 गवाहों के बाद आया फैसला
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, मुकदमे की सुनवाई के दौरान 126 पेशियां हुईं और 22 गवाहों के बयान दर्ज किए गए. अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी. अदालत ने दोषसिद्धि के बाद सजा सुनाते हुए दोनों को मौत की सजा दी.
क्या अब फांसी की सजा पर अमल होगा?
मृत्युदंड सुनाए जाने का मतलब यह नहीं है कि सजा पर तुरंत अमल हो जाएगा. कानून के अनुसार, सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को संबंधित उच्च न्यायालय की पुष्टि की जरूरत होती है. इसके बाद उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत अपील और अन्य कार्यवाही हो सकती है. इसलिए इस मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी.
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