चंदवा से सुमित कुमार की रिपोर्ट
Maa Ugratara Temple: लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड के नगर गांव में मां उग्रतारा का करीब एक हजार वर्ष पुराना मंदिर स्थित है. सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर में झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं. मान्यता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है. यहां पूजा के दौरान मां के आसन से फूल गिरने को मनोकामना पूरी होने का संकेत माना जाता है.
राजा के पूर्वजों ने बनवाया था मंदिर
लोककथा के अनुसार, टोरी परगना के अंतिम राजा दिग्विजय नाथ शाही के पूर्वज आखेट के दौरान लातेहार के मनकरी नामक स्थान पर पहुंचे थे. रात में विश्राम करने के दौरान देवी ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिया और कहा, ‘सुबह स्नान करने तालाब में जाना. वहां तुम्हें मैं मिलूंगी.’
अगली सुबह राजा तालाब में स्नान करने पहुंचे, तो उन्हें वहां अंगुष्ठ प्रमाण यानी अंगूठे के आकार की देवी की प्रतिमा मिली. राजा प्रतिमा को लेकर नगर गांव पहुंचे और अपने राज्य के गढ़ के बीचों-बीच स्थापित कर दिया. तभी से यहां मां उग्रतारा की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है.
बाद में देव मारकंडेय (वर्तमान बिहार के रोहतास क्षेत्र) के निवासी पंचानन मिश्र अपने परिवार के साथ भिक्षाटन करते हुए नगर गांव पहुंचे. राजा ने उन्हें मां की पूजा की जिम्मेदारी सौंपी और अलौदिया गांव की जमींदारी भी दी. वर्ष 1804 में अंतिम राजा दिग्विजय नाथ शाही का निःसंतान निधन हो गया. इसके बाद से आज तक पंचानन मिश्र के वंशज ही मंदिर की व्यवस्था और पूजा-पाठ की जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं.
टुडामू स्थित मिश्र परिवार के घर में रखी है विशेष पोथी
मंदिर के सेवायत सह मुत्जिमकार श्री मिश्र ने बताया कि टुडामू स्थित मिश्र परिवार के घर में देवी की कृपा से एक अद्भुत पोथी रखी हुई है. इसी पोथी के आधार पर ऐतिहासिक नगर मंदिर में दशहरा पूजा संपन्न कराई जाती है. उन्होंने बताया कि इस पुस्तक में कई पुराणों का सार है. इसे मिश्र परिवार के पूर्वजों ने कैथी लिपि में लिखा था. परिवार इस पोथी को साल भर देवी के समान श्रद्धा के साथ अपने घर में रखता है. साल में 16 दिवसीय शारदीय नवरात्र के दौरान ही इसे बाहर निकाला जाता है. मंदिर में विशेष पूजा इसी पोथी के आधार पर संपन्न होती है.
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16 दिन तक चलती है शारदीय पूजा
नगर गांव स्थित मां उग्रतारा नगर भगवती मंदिर में 16 दिवसीय शारदीय पूजा की विशेष परंपरा है. झारखंड समेत कई राज्यों में आस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर में रविवार, 4 अक्टूबर से शारदीय पूजन शुरू हुआ. जिउतिया व्रत के पारण के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मां अष्टादशभुजा की कलश स्थापना की गई.
मंदिर के सेवायत सह मुत्जिमकार पंडित गोविंद बल्लभ मिश्र ने बताया कि नगर भगवती मंदिर में 16 दिनों तक शारदीय पूजा करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. क्षेत्र में यह अपनी तरह का प्रमुख मंदिर है, जहां इस विशेष परंपरा का आज भी पालन किया जाता है. दुर्गापूजा, नववर्ष और अन्य प्रमुख हिंदू त्योहारों के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
आसन से फूल गिरने पर पूरी होती है मनोकामना
मां उग्रतारा के दरबार में मनोकामना पूरी होने की आस लेकर श्रद्धालु पहुंचते हैं. यहां मन्नत मांगने के लिए मां के आसन पर फूल चढ़ाने की परंपरा है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, पूजा के दौरान यदि मां के आसन से फूल गिरता है, तो इसे भक्त की मनोकामना पूरी होने का संकेत माना जाता है. इसी आस्था के कारण दूर-दूर से श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना करने नगर गांव पहुंचते हैं.
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