Parenting Tips: एक शिशु के व्यक्तित्व को गढ़ने में माता-पिता का व्यवहार सबसे अहम होता है. पेडियाट्रिशियन रवि मलिक ने हाल ही में एक पोस्ट के जरिए इस बात पर जोर दिया है कि एक बेटा अपने पिता को देखकर ही सीखता है कि स्त्रीओं का सम्मान कैसे करना है, गुस्से को कैसे संभालना है और परिवार की अहमियत क्या होती है. पिता का रोजमर्रा का आचरण ही भविष्य में शिशु के बर्ताव और उसकी सोच की नींव रखता है.
स्त्रीओं के प्रति नजरिया
बेटा अपने पिता को देखकर ही समझता है कि स्त्रीओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए. पिता अपनी पत्नी से किस तरह बात करते हैं, क्या वे उनकी बातों को महत्व देते हैं और उन्हें कितना सम्मान देते हैं. ये छोटी-छोटी चीजें शिशु के दिमाग में दर्ज हो जाती हैं. अगर घर में पिता मां का सम्मान करते हैं, तो बेटा स्वाभाविक रूप से स्त्रीओं का आदर करना सीख जाता है.
गुस्से को संभालने का तरीका
मुश्किल स्थितियों में पिता का व्यवहार शिशु के लिए एक बड़ी सीख बन सकता है. अगर पिता गुस्से में चिल्लाते हैं या गलत तरीके से अपनी बात रखते हैं, तो बच्चा भी इसी व्यवहार को अपना सकता है. इसके विपरीत, यदि पिता गुस्से के समय खुद को शांत रखते हैं और संयम से समस्या का समाधान निकालते हैं, तो बच्चा भी अपनी भावनाओं पर काबू पाना और विपरीत परिस्थितियों को संभालना सीखता है.
परिवार की अहमियत और जिम्मेदारी
जब पिता अपने शिशु के साथ वक्त बिताते हैं, उसकी बातें सुनते हैं और परिवार के अन्य सदस्यों का ख्याल रखते हैं, तो बेटा परिवार की एकजुटता और महत्व को समझता है. पिता का केवल आर्थिक जरूरतें पूरी करना ही काफी नहीं है; उनके साथ जुड़ाव और परिवार के प्रति उनकी जिम्मेदारी शिशु के लिए एक जीवनभर का सबक बन जाती है.
एक ‘अच्छा इंसान’ बनने का असली मतलब
रवि मलिक के अनुसार, बेटा अपने पिता से यह भी सीखता है कि एक पुरुष का व्यवहार कैसा होना चाहिए. अक्सर मजबूती का मतलब सिर्फ सख्त होना समझ लिया जाता है, लेकिन असली ताकत दूसरों को समझने, परिवार से जुड़ाव रखने और जरूरत के वक्त उनके साथ खड़े होने में है. जब पिता अपनी भावनाओं को समझते हुए व्यवहार करते हैं, तो बेटा भी एक संवेदनशील इंसान बनना सीखता है.
भविष्य की परवरिश की सीख
बच्चा अपने पिता को एक आईने की तरह देखता है. वह यह भी सीखता है कि आगे चलकर उसे अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करना है. अगर पिता आज शिशु की बात सुनते हैं और उसे प्यार व सम्मान देते हैं, तो बच्चा भी भविष्य में यही संस्कार अपनाएगा.
सिर्फ पैसा कमाना ही जिम्मेदारी नहीं
पेडियाट्रिशियन रवि का मानना है कि पिता की भूमिका सिर्फ परिवार के लिए पैसा कमाने तक सीमित नहीं है. उनका रोज का व्यवहार, चाहे वह दूसरों से बात करने का तरीका हो या गुस्से पर नियंत्रण, शिशु के लिए सबसे बड़ी पाठशाला है. इसलिए, पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने व्यवहार से अपने शिशु के सामने एक सकारात्मक उदाहरण पेश करें.
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