अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले लिंडसे ग्राहम एक्ट पर फिलहाल रोक लगा दी है. इस कानून के तहत रूस से तेल खरीदने वाले हिंदुस्तान जैसे देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुल सकता था. लेकिन ट्रम्प ने शुक्रवार को कानून पर रोक लगाते हुए कहा कि यह कदम अमेरिका के हित में है.
अब सवाल है कि हिंदुस्तान के रूस से तेल खरीदने पर जब ट्रंप खुद दबाव बनाने की बात कर रहे थे, तो फिर उन्होंने 100 फीसदी टैरिफ पर रोक क्यों लगाई? इसके पीछे अमेरिकी वित्तीय स्थिति का दबाव है या फिर कोई बड़ा रणनीतिक हित ? आइए, आसान भाषा में समझते हैं.
ट्रंप ने 100% टैरिफ पर रोक क्यों लगाई?
ट्रंप ने हिंदुस्तान पर 100% टैरिफ लगाने के मामले में सख्ती करने के बजाय सावधानी क्यों बरती? इसके पीछे चार बड़ी वजहें हो सकती हैं.
- रूस और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण दुनिया में तेल की सप्लाई पर असर पड़ रहा है. ऐसी स्थिति में अगर हिंदुस्तान पर रूसी तेल खरीदने को लेकर और सख्ती की जाती, तो बाजार में तेल की उपलब्धता कम हो सकती है. इसका असर अमेरिका पर भी पड़ सकता है और वहां पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है.
- रूस से तेल और ईंधन खरीदने को लेकर अमेरिका की नीति दोहरे मापदंड की ओर इशारा करता है. क्योंकि एक तरफ अमेरिका खुद रूस से ईंधन खरीदता है और दूसरी तरफ दूसरे देशों को ऐसा करने पर टैरिफ लगता है.
- हिंदुस्तान अमेरिका के लिए एक बड़ा बाजार है. दोनों देश एक-दूसरे से कई तरह का सामान खरीदते और बेचते हैं. अगर हिंदुस्तानीय सामान पर 100% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया जाता, तो हिंदुस्तानीय सामान अमेरिकी बाजार में बहुत महंगा हो सकता है, इससे अमेरिकी कंपनियों और आम ग्राहकों को भी ज्यादा पैसे चुकाने पड़ सकते थे. साथ ही, हिंदुस्तान और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत भी बिगड़ सकती थी.
- अमेरिका में नवंबर 2026 में मध्यावधि चुनाव होने हैं. ऐसे समय में महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमतें प्रशासन के लिए बड़ा मुद्दा बन सकती हैं. अगर टैरिफ और अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण ईंधन महंगा होता है, तो आम अमेरिकी परिवारों का खर्च बढ़ सकता है. लोग प्रशासन से नाराज हो सकते हैं.
सबसे अहम बात यह है कि रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने की अमेरिकी कोशिश और अमेरिकी जनता को सस्ता ईंधन देने का लक्ष्य इस मामले में एक-दूसरे से टकरा रहे थे. इसलिए ऐसा हो सकता है कि ट्रंप ने फिलहाल 100% टैरिफ का रास्ता रोककर अमेरिकी ऊर्जा कीमतों, हिंदुस्तान के साथ व्यापार और घरेलू नेतृत्वक दबाव को प्राथमिकता दी हो. लेकिन इसे हिंदुस्तान की स्थायी जीत या रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति में पूर्ण बदलाव नहीं समझना चाहिए.
100% टैरिफ पर रोक से अमेरिका को क्या फायदा है?
अमेरिका की ओर से हिंदुस्तान पर अतिरिक्त प्रतिबंधों या टैरिफ से पीछे हटने के फैसले से अमेरिकी कारोबार और आम लोगों को राहत मिल सकती है. इसके बड़े फायदे समझिए.
- हिंदुस्तान अमेरिका को बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाइयां सप्लाई करता है. FDA के अनुसार अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं का करीब 40% हिंदुस्तान से आता है. अगर भारी टैरिफ लगता, तो दवाइयां बनाने और मंगाने का खर्च बढ़ सकता था.
- USTR के मुताबिक, 2025 में अमेरिका ने हिंदुस्तान से 103.8 अरब डॉलर का सामान खरीदा. अगर इन सामानों पर अतिरिक्त टैक्स लगता, तो अमेरिकी कंपनियों को ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते. इसका बोझ आखिरकार ग्राहकों पर भी पड़ सकता था.
- 2025 में हिंदुस्तान और अमेरिका के बीच सामान और सेवाओं का कुल व्यापार 239.6 अरब डॉलर रहा. ऐसे में टैरिफ को लेकर टकराव कम होने से दोनों देशों के कारोबारियों को राहत मिल सकती है.
- 100 टैरिफ के बदले अगर हिंदुस्तान भी अमेरिकी सामान पर जवाबी टैरिफ लगाता, तो अमेरिका के किसानों, कंपनियों और निर्यातकों को नुकसान हो सकता था. तनाव कम होने से इस खतरे को घटाने में मदद मिल सकती है.
- हिंदुस्तान और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है. हिंदुस्तान बेहतर बाजार पहुंच और टैरिफ में स्थिरता चाहता है. तनाव कम होने से समझौते का रास्ता आसान हो सकता है, लेकिन डील जल्द पूरी होगी, यह अभी तय नहीं है.
अमेरिका के नए फैसले पर क्या है एक्सपर्ट्स का कहना?
- ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने एक समाचार चैनल से बात करते हुए कहा कि अमेरिका के इस फैसले से हिंदुस्तान को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन आगे भी ऐसी राहत मिलेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है. उनका कहना है कि अमेरिका पहले टैरिफ लगाने की चेतावनी देता है, लेकिन जब ऐसा करना उसके अपने हितों के लिए मुश्किल होने लगता है, तो वह पीछे हट जाता है.
- अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिका की व्यापार नीति में उसके अपने फायदे सबसे ज्यादा मायने रखते हैं. उन्होंने बताया कि रूस से जुड़े प्रतिबंधों वाला कानून 18 सितंबर को बना था, लेकिन 9 अक्टूबर को अमेरिका और रूस के बीच रूसी डीजल खरीदने का समझौता होने के बाद दूसरे देशों पर सख्ती करने के फैसले पर सवाल उठने लगे तो इसमें बदलाव की गई.
- श्रीवास्तव के अनुसार, इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका हर देश के खिलाफ एक जैसी नीति नहीं अपनाता. वह अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को देखकर फैसले लेता है. जिन देशों के पास जवाबी कार्रवाई करने की ताकत होती है, वे अमेरिकी दबाव से कुछ हद तक राहत पाने की स्थिति में भी रहते हैं.
- हिंदुस्तान के बारे में बात करते हुए अजय श्रीवास्तव ने कहा कि फिलहाल मिली राहत सही समय पर आई है, लेकिन इससे भविष्य को लेकर चिंता खत्म नहीं होती. उनके मुताबिक, जुलाई में हिंदुस्तान के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51% थी, जो अगस्त में घटकर 44% रह गई. इस दौरान हिंदुस्तान ने ज्यादा कीमत होने के बावजूद अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से भी ज्यादा तेल खरीदा.
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किस देश से हिंदुस्तान ने कब कितना कच्चा तेल खरीदा?
हिंदुस्तान दुनिया के बड़े तेल आयातकों में से एक है. उसे ऐसा तेल चाहिए जो सस्ता पड़े, समय पर मिले और देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर ज्यादा दबाव न डाले. इसलिए हिंदुस्तान कच्चे तेल के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं है.
| वर्ष | रूस से तेल आया | इराक से तेल आया | सऊदी अरब से तेल आया | यूएई से तेल आया | अमेरिका से तेल आया |
| 2025 | 35.1% | 18.7% | 13.2% | 9.1% | 6.6% |
| 2024 | 37.7% | 20.0% | 13.6% | 8.2% | 4.2% |
| 2023 | 38.4% | 19.8% | 15.3% | 5.7% | 4.5% |
| 2022 | 15.4% | 22.7% | 17.3% | 10.2% | 6.7% |
| 2021 | 1.2% | 23.9% | 16.3% | 10.4% | 10.0% |
स्रोत: केप्लर (Kpler)
अब आगे क्या होगा
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि ट्रम्प के सामने रूस पर दबाव बढ़ाने और अमेरिका के आर्थिक हितों को बचाने, दोनों की चुनौती है. एक तरफ अमेरिका रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई रोकना चाहता है, ताकि यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखना उसके लिए मुश्किल हो. दूसरी तरफ, हिंदुस्तान जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने से अमेरिकी कंपनियों, ग्राहकों और व्यापार को भी नुकसान पहुंचने का खतरा है. ऐसे में ट्रम्प का प्रतिबंधों पर नरमी दिखाना बताता है कि रूस पर दबाव बनाने की रणनीति में अमेरिका अपने आर्थिक हितों को भी ध्यान में रख रहा है.
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